नई दिल्ली: मानसून का मौसम केवल बारिश और हरियाली ही नहीं लाता, बल्कि इसे पौधे लगाने के लिए भी सबसे अच्छा समय माना जाता है। इस दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी होती है और वातावरण में आर्द्रता अधिक रहती है, जिससे पौधों की वृद्धि तेजी से होती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ भी बारिश के मौसम में अधिक से अधिक वृक्षारोपण की सलाह देते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में भी पौधे और वृक्षों का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि कई पौधों का संबंध अलग-अलग ग्रहों और नक्षत्रों से होता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह कमजोर हो या उसका अशुभ प्रभाव चल रहा हो, तो उससे जुड़े पौधे लगाना और उनकी नियमित देखभाल करना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से ग्रहों की सकारात्मक ऊर्जा मिलने के साथ मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और जीवन में संतुलन आने की मान्यता है।
किस ग्रह के लिए कौन-सा पौधा लगाना माना जाता है शुभ?
ज्योतिष के अनुसार 27 नक्षत्रों और सभी प्रमुख ग्रहों का संबंध अलग-अलग पेड़-पौधों से माना गया है। इसलिए ग्रहों को मजबूत करने के लिए सही पौधा लगाना लाभकारी माना जाता है।
सूर्य ग्रह को मजबूत करने के लिए पीपल, बरगद और नीम जैसे मजबूत वृक्ष लगाने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इन पेड़ों की सेवा करने से आत्मविश्वास बढ़ता है, नेतृत्व क्षमता मजबूत होती है और स्वास्थ्य में भी सकारात्मक सुधार देखने को मिलता है।
चंद्रमा ग्रह के लिए पलाश जैसे पौधे शुभ माने जाते हैं। कहा जाता है कि ऐसे पौधों की देखभाल करने से मानसिक शांति मिलती है और भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है। जिन लोगों को तनाव या मानसिक अस्थिरता रहती है, उनके लिए यह उपाय लाभकारी माना जाता है।
मंगल ग्रह का शुभ प्रभाव पाने के लिए बबूल जैसे कांटेदार पेड़ या औषधीय गुणों वाले नीम का पौधा लगाया जा सकता है। इन पौधों की नियमित देखभाल करने से साहस, ऊर्जा और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ने की मान्यता है।
बुध ग्रह को मजबूत करने के लिए तुलसी का पौधा बेहद शुभ माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार बुध मजबूत होने पर बुद्धि, संवाद कौशल, शिक्षा और व्यापार में सफलता मिलने की संभावना बढ़ती है। तुलसी का धार्मिक महत्व भी काफी अधिक है।
इन ग्रहों के लिए भी पौधे लगाना माना जाता है लाभकारी
बृहस्पति ग्रह के लिए आम, अमरूद, आंवला या अन्य फलदार पेड़ लगाना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे ज्ञान, सद्गुण, परिवार में सुख और आर्थिक समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
शुक्र ग्रह को मजबूत करने के लिए फूल देने वाले पौधे और वृक्ष लगाने की सलाह दी जाती है। गुलाब, चमेली, मोगरा या अन्य सुगंधित फूलों वाले पौधे शुक्र से जुड़े माने जाते हैं। कहा जाता है कि इससे जीवन में सौंदर्य, आकर्षण, प्रेम और कला के प्रति रुचि बढ़ती है।
शनि ग्रह के लिए शमी का पौधा सबसे शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शमी का पौधा लगाने और उसकी नियमित सेवा करने से शनि के अशुभ प्रभाव कम हो सकते हैं। साथ ही व्यक्ति में धैर्य, अनुशासन और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता बढ़ती है।
हालांकि, ज्योतिष में बताए गए ये उपाय धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य सकारात्मक सोच, प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी है। यदि आप मानसून में पौधे लगाने की योजना बना रहे हैं, तो अपनी जगह और जलवायु के अनुसार पौधों का चयन करें और उनकी नियमित देखभाल करें। इससे न केवल पर्यावरण को लाभ मिलेगा, बल्कि आपके आसपास हरियाली और स्वच्छ वातावरण भी बना रहेगा।
धर्म: दीवाली के पांच दिन खत्म होने के बाद अब लोगों ने छठ पूजा की तैयारियां शुरु कर दी हैं। छठ पूजा की शुरुआत वैसे तो दीवाली के छठे दिन हो जाती है परंतु इस साल छठ पूजा दीवाली के छठे नहीं बल्कि सातवें दिन मनाई जाएगी। छठ पूजा हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक मानी जाती है। यह त्योहार खासतौर पर झारखंड और बिहार में धूमधाम के साथ मनाया जाता है। चार दिन तक चलने वाले छठ पर्व को महापर्व कहते हैं।
पंचागों के अनुसार, छठ का त्योहार कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से शुरु हो जाता है। ऐसा कहा जाता है कि छठ की शुरुआत दीवाली के छठे दिन होती है परंतु इस साल छठ की शुरुआत दीवाली के छठे नहीं बल्कि सातवें दिन से होगी।
इसलिए बढ़ा एक दिन
दीवाली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज और छठ पूजा की तिथि आगे पीछे होने का कारण कुछ नहीं बल्कि अमावस्या तिथि का संचरण है। अमावस्या तिथि आगे होने के कारण त्योहारों का तालमेल ही बिगड़ गया है। वैसे तो दीवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा मनाई जाती है लेकिन इस साल दीवाली के अगले दिन भी कुछ समय तक अमावस्या की तिथि थी। ऐसे में गोवर्धन पूजा 21 नहीं बल्कि 22 अक्टूबर को मनाई गई। इसी कारण आगे भी सभी त्योहारों का एक-एक दिन बढ़ गया। छठ पूजा वैसे तो चार दिनों का त्योहार है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है परंतु षष्ठी तिथि सबसे ज्यादा जरुरी होती है। इसी दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस साल षष्ठी तिथि 27 अक्टूबर को पड़ रही है।
इस दिन पड़ेगी नहाय-खाय की तिथि
कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि शनिवार 25 अक्टूबर को नहाय खाय के साथ छठ पर्व की शुरुआत होगी। 26 अक्टूबर को खरना होगा। यह छठ पर्व को दूसरा दिन होगा। षष्ठी तिथि को सूर्य षष्ठी भी कहा जाता है। इस दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। 27 अक्टूबर को शाम में अर्घ्य दिया जाएगा। 28 अक्टूबर को शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि वाले दिन व्रत रखने वाली महिलाएं उगते सूर्य को जल देकर पारण करेगी। इसी के साथ ही चार दिन का छठ महापर्व समाप्त हो जाएगा।
धर्म: भारत के सबसे मशहूर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों की यदि बात करें तो उसमें केदारनाथ भी शामिल है। अपनी लोकप्रियता के कारण यह बहुत ही खास स्थान रखता है। समुद्र तल से लगभग 11,000 फीट की ऊंचाई पर बसी हुई इस घाटी की अद्भूत और प्राकृतिक सुंदरता लोगों को बहुत पसंद आती है। दुनिया भर से लोग इस मंदिर की ओर आकर्षित होते हैं। हिमालय की बर्फ से ढकी हुई ऊंची चोटियों के बीच में स्थित केदारनाथ मंदिर इस घाटी का मुख्य आकर्षण है।
हिंदू धर्म में केदारनाथ मंदिर का खास महत्व है। यह मंदिर हजारों सालों से पूजनीय है। कई किवंदतियों, कथाओं और चमत्कारों से जुड़ी इस मंदिर की खासियत ही अलग है। बहुत से लोग इस मंदिर का इतिहास और इससे जुड़ी पौराणिक कथा नहीं जानते। तो चलिए आज आपको आझ इसी बारे में बताते हैं।
पांडवों ने करवाया था मंदिर का निर्माण
बारह ज्योतिर्लिंगों में से सबसे खास केदारनाथ धाम की कथा है। ऐसा कहा जाता है कि इस प्राचीन शिव मंदिर का निर्माण पांडवों ने करवाया था। धार्मिक ग्रंथों की मानें तो केदार का अर्थ है महिष यानी की भैंसे का पिछला भाग। यह वही स्थान है जहां पर भगवान शिव धरती में लीन हो गए थे। ऐसा माना जाता है कि जब महाभारत का युद्ध खत्म हुआ तो पांडवों ने अपने ही रिश्तेदारों और भाई-बंधुओं की मृत्यु का दुख और पाप महसूस किया था। इसलिए वे भगवान शिव से क्षमा मांगने और अपने कर्मों का प्रयाश्चित करने के लिए शिव के दर्शन करना चाहते थे परंतु युद्ध के विनाश को देखकर भगवान शिव उनसे नाराज हो गए और उनके दर्शन ही नहीं करना चाहते थे।
पर पांडवों ने हार नहीं मानी और वह शिव की खोज में हिमालय की ओर चल पड़े। इसी दौरान भगवान शिव ने बैल का रुप धारण कर लिया और अन्य पशुओं के साथ जाकर मिल गए परंतु पांडवों को संदेह हो गया। उस समय भीम ने विशाल रुप धारण किया और दो पहाड़ों पर अपने पैर फैला लिए। उन्होंने पैर इसलिए फैलाए ताकि सभी पशु निकल जाए और शिव रुपी बैल पहचान में आ जाए। इस दौरान सभी पशु निकल गए पर वह खास बैल जो स्वंय शिव थे वो जाने को तैयार नहीं हुआ और भीम ने जैसे ही उस बैल को पकड़ना चाहा तो वह धरती में समाने लग गया। तभी भीम ने उसकी त्रिकोणाकार पीठ का भाग पकड़ लिया।
पांडवों की ऐसी भक्ति, समर्पण और तपस्या देखकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें उनके पापों से मुक्ति का आशीर्वाद दे दिया। पांडवों ने प्रार्थना की कि शिव इसी रुप में सदैव इस स्थान पर विराजमान रहे। भगवान शिव ने तथास्तु कहा और तब से वे केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के तौर पर यहां पूजित हो रहे हैं।
एक अन्य मान्यता
एक अन्य कथा की मानें तो सप्तऋषियों में से दो ऋषि-नर और नारायण भगवान शिव की घोर तपस्या कर रहे थे। इसी दौरान जब भगवान शिव प्रकट हुए तो उन्होंने प्रार्थना की कि शिव जी इस स्थान पर हमेशा के लिए निवास करें। तभी से यह स्थान भगवान शिव का स्थायी निवास बन गया है।
मंदिर का इतिहास
यदि बात मंदिर के इतिहास की करें तो प्रागैतिहासिक काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। कहा जाता है कि इसका निर्माण मूल तौर पर पांडवों के द्वारा किया गया था। महाभारत युद्ध का समय करीबन 3100 ईसा पूर्व बताया जाता है लेकिन कई इतिहासकार इसको 8वीं से 10वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच में बताते हैं।
वर्तमान समय में मंदिर का पुनर्निमाण 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने करवाया था। उन्होंने भारत भर में कई हिंदू तीर्थ स्थलों को पुनर्जीवित किया जिसमें चार धाम भी शामिल हैं। कुछ दस्तावेजों की मानें तो 8वीं सदी में यह मंदिर पत्थर और लकड़ी के साथ बना हुआ था परंतु उसकी दुर्गम स्थिति के चलते वह खराब हालत में चला गया। बाद में 11वीं सदी में राजा भोज ने इसका पुनर्निमाण पत्थर और संगरमरमर के साथ करवाया है।