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  • Vastu Tips for Kitchen: सुबह खाना बनाने से पहले किचन में सबसे पहले क्या साफ करें? जानें सही क्रम और वास्तु नियम

    Vastu Tips for Kitchen: सुबह खाना बनाने से पहले किचन में सबसे पहले क्या साफ करें? जानें सही क्रम और वास्तु नियम

    नई दिल्ली: घर की रसोई केवल भोजन बनाने की जगह नहीं होती, बल्कि इसे सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र भी माना जाता है। वास्तु शास्त्र और ज्योतिष के अनुसार रसोई में की गई छोटी-छोटी आदतें भी घर के वातावरण पर असर डाल सकती हैं। यही वजह है कि सुबह खाना बनाने से पहले रसोई की साफ-सफाई का सही क्रम अपनाने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि यदि दिन की शुरुआत स्वच्छ और व्यवस्थित रसोई से की जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। वहीं गंदे चूल्हे या अव्यवस्थित किचन में भोजन बनाना वास्तु की दृष्टि से शुभ नहीं माना जाता।

    सुबह खाना बनाने से पहले गैस चूल्हा करें साफ

    वास्तु शास्त्र में गैस चूल्हे को अग्नि तत्व का प्रतीक माना गया है। अग्नि देव का संबंध ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि से जोड़ा जाता है। इसलिए सुबह रसोई में प्रवेश करने के बाद सबसे पहले गैस चूल्हे की सफाई करना शुभ माना जाता है। यदि चूल्हे पर पिछले दिन के दूध, चाय, तेल या भोजन के दाग लगे हों और बिना साफ किए उसी पर खाना बनाना शुरू कर दिया जाए, तो इसे वास्तु के अनुसार उचित नहीं माना जाता। साथ ही रातभर में धूल, कीटाणु और सूक्ष्म जीव भी जमा हो सकते हैं। इसलिए साफ कपड़े से चूल्हे को अच्छी तरह साफ करने के बाद ही चाय या भोजन बनाना बेहतर माना जाता है।

    इसके बाद किचन स्लैब की करें सफाई

    गैस चूल्हा साफ करने के बाद किचन स्लैब को साफ करना चाहिए। यही वह स्थान है जहां सब्जियां काटी जाती हैं, मसाले रखे जाते हैं और भोजन तैयार करने की अधिकांश प्रक्रिया होती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार गंदी और बिखरी हुई रसोई नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देती है। इसलिए स्लैब को रोज सुबह साफ और व्यवस्थित रखना शुभ माना जाता है। इससे न केवल स्वच्छता बनी रहती है, बल्कि रसोई का वातावरण भी सकारात्मक बना रहता है।

    सिंक की सफाई सबसे आखिर में करें

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार सिंक का संबंध जल तत्व से माना जाता है। इसलिए चूल्हे और स्लैब की सफाई के बाद अंत में सिंक को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। यदि रातभर गंदे बर्तन सिंक में पड़े रहें या वहां से बदबू आए, तो इसे वास्तु दोष माना जाता है। सुबह सिंक धोने और उसे साफ रखने से रसोई में स्वच्छता बनी रहती है और सकारात्मक वातावरण का संचार होता है।

    क्यों जरूरी है सही क्रम?

    वास्तु शास्त्र में सफाई का क्रम भी महत्वपूर्ण माना गया है। कई लोग बिना किसी क्रम के पहले सिंक, फिर स्लैब और बाद में गैस चूल्हा साफ करते हैं। हालांकि मान्यता है कि पहले अग्नि तत्व यानी गैस चूल्हे, फिर भोजन तैयार करने वाली जगह यानी स्लैब और अंत में जल तत्व यानी सिंक की सफाई करना अधिक शुभ होता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने और आर्थिक उन्नति के मार्ग खुलने की मान्यता है। हालांकि स्वच्छता के लिहाज से भी यह आदत उपयोगी मानी जाती है, क्योंकि साफ रसोई में भोजन बनाना स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है। Disclaimer: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिष और वास्तु शास्त्र में वर्णित मान्यताओं पर आधारित है। इन दावों की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं की जा सकती। किसी भी उपाय को अपनाने से पहले अपनी समझ और आवश्यकता के अनुसार निर्णय लें।
  • Sawan 2026: इस दिन शुरु होगी कांवड़ यात्रा, जलाभिषेक के लिए जानें सही समय

    Sawan 2026: इस दिन शुरु होगी कांवड़ यात्रा, जलाभिषेक के लिए जानें सही समय

    धर्म: सावन का पावन महीना जैसे ही शुरु होता है वैसे ही भोलेनाथ के भक्तों में खास उत्साह देखने को मिलता है। इसी महीने में भक्तों की सबसे बड़ी और पवित्र धार्मिक यात्रा यानी की कांवड़ यात्रा शुरु हो जाती है। पूरे उत्तर भारत में केसरिया कपड़े पहनकर लाखों कांवड़िए गंगाजल भरने के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश, गोमुख और बाकी पवित्र नदियों के तटों की ओर पैदल यात्रा पर निकलते हैं। भक्त कंधों पर कांवड़ लेकर बम बोले के जयकारों के साथ सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने स्थानीय शिव मंदिरों में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं।

    11 अगस्त को खत्म होगी कांवड़ यात्रा

    हिंदू पंचाग के अनुसार, पावन महीने सावन की शुरुआत के साथ ही कांवड़ यात्रा की अनौपचारिक और औपचारिक शुरुआत हो जाती है। कांवड़ यात्रा 30 जुलाई 2026 से शुरु होगी और इसका समापन 11 अगस्त 2026 मंगलवार को सावन शिवरात्रि वाले दिन होगा।

    इस दिन चढ़ाएं शिवजी पर जल

    कांवड़ यात्रा का सबसे मुख्य दिन सावन शिवरात्रि का होता है। हरिद्रार, ऋषिकेश और बाकी धामों से जल लेकर लौटने वाले कांवड़िए सावन शिवरात्रि की पावन तिथि पर ही शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करते हैं। इस बार जलाभिषेक सावन शिवरात्रि पर होगा जो कि 11 अगस्त को है। 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि पर ही जलाभिषेक के साथ ही इस भव्य यात्रा का समापन होगा। इसी दिन शिवभक्त अपना व्रत पूरा करेंगे।

    आखिर क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा?

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला था। उस समय सृष्टि की रक्षा करने के लिए उन्होंने उस विष को अपने गले में धारण कर लिया था। उसी विष के प्रभाव से भगवान शिव का गला नीला पड़ गया था और उनका शरीर का ताप अत्यंत बढ़ गया था। शिव जी के शरीर की जलन और विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं और उनके परमभक्त रावण ने पवित्र गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था। उसी समय से सावन के महीने में गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा को निकालने की परंपरा चली आ रही है।  
  • Rakshabandhan पर लगेगा साल का दूसरा चंद्रग्रहण, क्या भारत में भी दिखेगा असर?

    Rakshabandhan पर लगेगा साल का दूसरा चंद्रग्रहण, क्या भारत में भी दिखेगा असर?

    धर्म: साल 2026 में रक्षाबंधन एक बार फिर चर्चा में रहने वाला है। भाई बहन के इस पर्व वाले दिन चंद्रगहण की खबर के बाद काफी लोग असमंजस में पढ़ गई है। ऐसे में यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि क्या रक्षाबंधन वाले दिन ग्रहण के चलते राखी बांधने में कोई मुश्किल होगी क्या सूतक काल लगेगा और ग्रहों की दिशा का इस त्योहार पर क्या असर पड़ेगा?

    28 अगस्त को मनाया जाएगा रक्षाबंधन

    हिंदू पंचागों के अनुसार, रक्षाबंधन हर साल श्रावण की पूर्णिमा वाले दिन मनाया जाता है। इस बार 28 अगस्त को यह पवित्र त्योहार मनाया जाएगा। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर भी राखी बांधकर उसकी लंबी उम्र और सुख समृद्धि की कामना करती हैं। इस बार की खास बात यह होगी कि रक्षाबंधन वाले दिन चंद्रगहण भी पड़ रहा है। खगोलिय गणना के अनुसार, यह साल का दूसरा चंद्रग्रहण होने वाला है और यह आंशिक चंद्रगहण होगा। इसमें पृथ्वी की छाया चंद्रमा के एक हिस्से को ढक लेगी और इससे चंद्रमा का रंग बदलता हुआ दिखेगा। कई बार यह लाल या तांबे के जैसा भी दिखता है। इसको आम भाषा में ब्लड मून कहते हैं।

    इस समय लगेगा चंद्रग्रहण

    भारतीय समय के अनुसार, यह चंद्रगहण सुबह करीबन 6 बजकर 52 मिनट से शुरु होकर दोपहर लगभग 12 बजकर 32 बजे तक चलेगा। इसकी कुल अवधि 5 घंटे से ज्यादा रहने वाली है। इतनी लंबी अवधि के कारण लोग इस घटना को लेकर काफी उत्साहित हैं।

    भारत में नहीं मान्य होगा सूतक काल

    बता दें कि यह चंद्रग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भी सूतक काल वहीं मान्य होता है जहां ग्रहण प्रत्यक्ष रुप से दिखता है। इस कारण से भारत में इस ग्रहण का सूतक काल मान्य ही नहीं होगा। वहीं भारत में दिखाई नहीं देगा ऐसे में रक्षाबंधन के शुभ कामों में इसका कोई असर नहीं होगा। बहनें अपने भाई को राखी बांध सकती है। तिलक, पूजा-पाठ और बाकी सभी परंपराएं सामान्य तौर पर निभाई जा पाएंगी।

    राखी पर रहेगा भद्रा का साया

    ज्योतिषियों के अनुसार, ग्रहण से ज्यादा जरुरी भद्राकाल का ध्यान रखना है। हिंदू धर्म में भद्राकाल को शुभ कामों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है ऐसे में राखी बांधने का समय तय करते समय भद्राकाल से बचना जरुरी होगा।

    इन देशों में दिखने वाला है चंद्रग्रहण

    यह चंद्रग्रहण दुनिया के कई हिस्सों में दिखने वाला है। खासतौर पर अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और प्रशांत व अटलांटिक महासागर के आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले लोग इस खगोलीय घटना का आनंद ले पाएंगे। चंद्रमा का बदला हुआ रंग लोगों के लिए खास आकर्षण होगा।
  • सावन के पहले दिन बनेंगे ये खास संयोग, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

    सावन के पहले दिन बनेंगे ये खास संयोग, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

    धर्म: सावन का पावन महीना अब बस शुरु होनें वाला है। शिव भक्त हर साल इस महीने का बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। इस बार सावन की शुरुआत काफी खास और फलदायी होने वाली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस बार पहले ही दिन एक साथ 4 बड़े और दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। 30 जुलाई 2026 से शुरु होने वाले इस सावन के पहले ही दिन इन सभी संयोगों का निर्माण होने से इस दिन का धार्मिक महत्व और पूजा का फल कई गुना ज्यादा बढ़ चुका है। हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन महीने की शुरुआत 20 जुलाई 2026 गुरुवार को होने वाली है। इसका समापन 28 अगस्त 2026 को होगा। इस पूरे महीने में शिव जी का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और सावन सोमवार व्रत रखने का खास विधान है।

    आयुष्मान योग

    सावन के पहले दिन आयुष्मान योग का निर्माण हो रहा है। ज्योतिष शास्त्र में इस योग को उत्तम स्वास्थ्य और लंबी उम्र प्रदान करने वाला माना गया है। इस योग में भगावन शिव का जलाभिषेक करने और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना अत्यंत कल्याणकारी होता है।

    सौभाग्य योग

    पहले दिन सौभाग्य योग का भी संयोग बन रहा है। जैसे कि नाम से ही साफ है यह योग जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आता है। इस योग में की गई पूजा, भक्ति और दान-पुण्य का अक्षय फल प्राप्त होता है।

    श्रीहरि और महादेव का मिलेगा आशीर्वाद

    सावन महीने की शुरुआत गुरुवार के दिन होने वाली है। यह दिन सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित होता है। ऐसे में सावन के पहले दिन महादेव के साथ-साथ श्रीहरि विष्णु की पूजा करने से हरि-हर दोनों का अखंड आशीर्वाद मिलेगा। सावन की शुरुआत श्रवण नक्षत्र में होगी। श्रवण नक्षत्र को आध्यात्मिक उन्नति, ध्यान और शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए बहुत ही श्रेष्ठ माना गया है। इस नक्षत्र में शिव आराधना करने से मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती हैं।

    सावन के दिन शुभ मुहूर्त

    ब्रह्मा मुहूर्त

    इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजककर 18 मिनट से सुबह 4 बजकर 59 मिनट तक।

    प्रात: संध्या

    इस दिन प्रात संध्या का मुहूर्त 4 बजकर 39 मिनट से सुबह 5 बजकर 41 मिनट तक।

    अभिजीत मुहूर्त

    इस दिन दोपहर 12 बजे से 12 बजकर 54 मिनट तक रहेगा।

    ऐसे करें महादेव की पूजा

    . इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा के लिए संकल्प लें। . घर के मंदिर में या शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर शुद्ध जल और गंगाजल चढ़ाएं। इसके बाद दूध, दही, शहद और शर्करा से पंचामृत से अभिषेक करें। . शिवलिंग पर चंदन का तिलक लगाएं। इसके बाद उनका प्रिय बेलपत्र, धतूरा, भांग, आंकड़े का फूल और चावल अर्पित करें। . पूजा के दौरान ऊं नम: शिवाय या महामृत्युंजय मंत्र कम से कम 108 बार जाप करें। . इस दिन गुरुवार है ऐसे में भगवान विष्णु के सामने घी का दीया जलाएं। केले या पीली मिठाई का भी भोग लगाएं। इसके बाद जरुरतमंदों को अन्न या वस्त्र का दान करें।
  • Delayed Marriage Reasons: विवाह में देरी होने का क्या है कारण, जान लें ज्योतिषी ने बताई वजह और उपाय

    Delayed Marriage Reasons: विवाह में देरी होने का क्या है कारण, जान लें ज्योतिषी ने बताई वजह और उपाय

    Delayed Marriage Reasons: कई लोगों को शादी में देरी होने की वजह से चिंता और तनाव होने लगता है। कभी-कभी रिश्ता बनते-बनते रुक जाता है या बात आगे नहीं बढ़ पाती। ज्योतिष के अनुसार, इसके पीछे कुंडली में ग्रहों और भावों की स्थिति जिम्मेदार हो सकती है। ऐसे में परेशान होने के बजाय कारण समझना और सही उपाय करना ज्यादा फायदेमंद होता है। आइये इसे विस्तार से जानते हैं… विवाह में देरी के ज्योतिषीय कारण
    1. सातवां भाव कमजोर होना
    ज्योतिष में कुंडली का सातवां भाव विवाह का भाव माना जाता है।
    • अगर इस भाव में अशुभ (क्रूर) ग्रह जैसे शनि, मंगल, राहु या केतु बैठे हों
    • या इन ग्रहों की दृष्टि इस भाव पर पड़ रही हो
    तो शादी में देरी हो सकती है और रिश्ते बनते-बनते टूट भी सकते हैं।
    1. शनि का प्रभाव
    • अगर शनि ग्रह सातवें भाव में हो
    • या सातवें भाव के स्वामी पर शनि की दृष्टि हो
    तो विवाह में देर होने की संभावना बढ़ जाती है।
    1. शुक्र, गुरु और मंगल की खराब स्थिति
    • ये तीनों ग्रह विवाह में महत्वपूर्ण माने जाते हैं
    • अगर ये कमजोर या प्रतिकूल स्थिति में हों
    • या अस्त (कमजोर) अवस्था में हों
    तो शादी में देरी हो सकती है, खासकर पुरुषों के मामले में।
    1. मांगलिक दोष (मंगल दोष)
    अगर कुंडली में मंगल इन भावों में हो:
    • पहला
    • चौथा
    • सातवां
    • आठवां
    • बारहवां
    तो इसे मांगलिक दोष कहा जाता है। इससे शादी में देरी होती है। शादी के बाद झगड़े भी हो सकते हैं।  ऐसे लोगों को मांगलिक व्यक्ति से ही विवाह करने की सलाह दी जाती है, जिससे दोष का असर कम हो जाता है।
    1. सातवें भाव का स्वामी वक्री होना
    • अगर सातवें भाव का स्वामी ग्रह वक्री (retrograde) हो
    • तो विवाह में देरी होती है
    ऐसे लोगों की शादी अक्सर 30 साल के बाद होती है। विवाह में देरी के उपाय
    1. शनि से जुड़े उपाय
    अगर शनि के कारण देरी हो रही है:
    • शनिवार को सरसों के तेल का दीपक जलाएं
    • पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाएं
    • गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करें
    1. गुरु ग्रह को मजबूत करना
    गुरु मजबूत होने से विवाह के योग अच्छे बनते हैं।
    • पीली चीजों का दान करें जैसे:
    •  केला
    •  हल्दी
    • चना
    • पीले कपड़े
    1. सातवें भाव के अनुसार उपाय
    अगर सातवां भाव कमजोर है
    • उस भाव से जुड़े ग्रह की शांति के उपाय करें
    • जैसे जिस ग्रह का प्रभाव हो, उसके अनुसार पूजा या दान करें
    1. ज्योतिषाचार्य से सलाह लें
    अगर लंबे समय से शादी में बाधा आ रही है:
    • किसी अनुभवी ज्योतिषी से अपनी कुंडली दिखाएं
    • सही मार्गदर्शन से समस्या का समाधान मिल सकता है
     
  • स्नान पूर्णिमा के बाद बीमार होते हैं भगवान जगन्नाथ, ये है रथयात्रा से जुड़ी पौराणिक कथा

    स्नान पूर्णिमा के बाद बीमार होते हैं भगवान जगन्नाथ, ये है रथयात्रा से जुड़ी पौराणिक कथा

    धर्म: पूरी के जगन्नाथ मंदिर में होने वली रथ यात्रा का भक्तों को पूरे साल इंतजार रहता है। यह सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि आस्था परंपरा और भक्ति का अद्भूत मिलन है। हर साल लाखों भक्त जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं लेकिन रथ यात्रा से ठीक पहले भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए बीमार पड़ जाते हैं। इस दौरान भक्त उनके दर्शन नहीं कर पाते हैं।

    स्नान पूर्णिमा के बाद आखिर कब शुरु होगा अनसर काल

    रथ यात्रा से पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नान पूर्णिमा का आयोजन होता है। इस मौके पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को 108 पवित्र घड़ों के जल से विशेष स्नान कराया जाता है। धार्मिक मान्याओं के अनुसार, इतने भव्य स्नान के बाद भगवान को बुखार आ जाता है और वे अस्वस्थ हो जाते हैं। इसी कारण भगवान 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि को अनसर काल या अनवसर काल कहते हैं। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह के कपाट आम भक्तों के लिए बंद रहते हैं और भगवान का विशेष तौर पर उपचार किया जाता है।

    भगवान जगन्नाथ का पिघल गया था दिल

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के परम भक्त माधव दास काफी समय से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उन्होंने अपने आराध्य का कष्ट दूर करने के लिए प्रार्थना भी की। इसके उत्तर में भगवान ने बताया कि उनके पिछले जन्म के कर्मों के कारण अभी 15 दिनों की बीमारी और शेष है। इसके बाद ही उन्हें मुक्ति मिलेगी। अपने भक्त का कष्ट देखकर भगवान जगन्नाथ का हृदय पिघल गया है। माना जाता है कि उन्होंने माधव दास की बीमारी के वो आखिरी 15 दिन खुद अपने ऊपर ले लिए। परिणामस्वरुप माधव दास स्वस्थ हो गए और खुद भगवान अस्वस्थ हो गए। तब से यह परंपरा चली आ रही है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों तक बीमार रहते हैं।

    कई तरह की औषधियों से किया जाता है भगवान का उपचार

    अनसर काल के दौरान भगवान को सामान्य भोग अर्पित नहीं करते हैं। उनकी सेवा वैद्य परंपरा के अनुसार, ही की जाती है। भगवान को जल्द स्वस्थ करने के लिए उन्हें काढ़े, औषधियों और जड़ी-बूटियों से तैयार विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। जब भगवान पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं तो भक्त नवयौवन दर्शन के जरिए से उनके दर्शन कर पाते हैं। इसके बाद भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथ यात्रा पर निकलते हैं। भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की यह कथा सिर्फ एक धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि भगवान और भक्त के बीच में अटूट प्रेम का प्रतीक है। यह कहानी यह दर्शाती है कि सच्ची भक्ति के सामने भगवान खुद अपने भक्तों के कष्टों को सहने के लिए तैयार रहते हैं। यही कारण है कि जगन्नाथ रथ यात्रा करोड़ों भक्तों की भावनाओं और विश्वास एक महामिलन बन गई है।  
  • Bada Mangal 2026: जानें पूजा की सही विधि, महत्व, व्रत और किस विधि से करें हनुमत साधना

    Bada Mangal 2026: जानें पूजा की सही विधि, महत्व, व्रत और किस विधि से करें हनुमत साधना

    Bada Mangal 2026: सनातन धर्म में भगवान हनुमान को संकटमोचन कहा जाता है। मंगलवार का दिन उनकी पूजा के लिए सबसे शुभ माना जाता है। जेठ महीने में आने वाले मंगलवारों का महत्व और भी बढ़ जाता है, जिन्हें “बड़ा मंगल” कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से हनुमान जी की पूजा करने से सभी संकट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है। साल 2026 का सातवां बड़ा मंगल 16 जून को मनाया जाएगा। इस दिन भक्त विशेष पूजा, व्रत और सेवा कार्य करके बजरंगबली का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। बड़ा मंगल पर कैसे करें पूजा बड़ा मंगल के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और मन को शांत रखें। यदि संभव हो तो लाल रंग के वस्त्र पहनें, क्योंकि लाल रंग हनुमान जी को प्रिय माना जाता है। पूजा के दौरान भगवान हनुमान को लाल फूल, फल, धूप, दीपक, नारियल, सिंदूर और मोतीचूर के लड्डू अर्पित करें। इसके साथ ही चूरमा का भोग भी लगाया जा सकता है। पूजा के बाद हनुमान चालीसा, सुंदरकांड या मंगलवार व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा से हनुमान जी शीघ्र प्रसन्न होते हैं। पूजा में क्या-क्या अर्पित करें? बड़ा मंगल के अवसर पर हनुमान जी को निम्न वस्तुएं अर्पित करना शुभ माना गया है—
    • लाल रंग के वस्त्र
    • जनेऊ
    • केसरिया ध्वज
    • बूंदी या बूंदी के लड्डू
    • सिंदूर का चोला
    • नारियल
    • गेहूं के आटे और लाल गुड़ से बना चूरमा
    • मीठा पान
    • लाल फूल और फल
    इन वस्तुओं को श्रद्धा से अर्पित करने पर बजरंगबली की विशेष कृपा प्राप्त होती है। हवन और आरती का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बड़े मंगल की पूजा के बाद हवन करना भी शुभ माना जाता है। विशेष रूप से खैर की लकड़ी से हवन करने का महत्व बताया गया है। हवन के बाद भगवान हनुमान की आरती अवश्य करें। माना जाता है कि आरती के बिना पूजा अधूरी रहती है। यदि व्रत या पूजा न कर पाएं तो क्या करें कई बार परिस्थितियों के कारण लोग व्रत या पूजा नहीं कर पाते। ऐसे में निराश होने की जरूरत नहीं है। बड़ा मंगल के दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करना भी अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। इसके अलावा किसी भंडारे, प्रसाद वितरण या सेवा कार्य में सहयोग देकर भी हनुमान जी की कृपा प्राप्त की जा सकती है। बड़ा मंगल पर किन बातों का रखें ध्यान?
    • किसी से विवाद या झगड़ा न करें।
    • मन को भगवान हनुमान की भक्ति में लगाएं।
    • दान और सेवा बिना दिखावे के करें।
    • पूजा और व्रत पूरी श्रद्धा तथा पवित्रता के साथ करें।
    • ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करने का प्रयास करें।
    • जरूरतमंदों की मदद करें और सकारात्मक विचार रखें।
    बड़ा मंगल की पूजा से मिलने वाले लाभ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बड़ा मंगल का व्रत और पूजा बहुत जल्दी शुभ फल देने वाली मानी जाती है। जो भक्त सच्चे मन से हनुमान जी की आराधना करते हैं, उनके जीवन के कष्ट दूर होते हैं और उन्हें सुख, शांति तथा सफलता प्राप्त होती है। मान्यता है कि बजरंगबली अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, भय और बाधाओं को दूर करते हैं तथा उन्हें बल, बुद्धि और विद्या का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसलिए बड़ा मंगल का दिन हनुमान भक्ति, सेवा और पुण्य कार्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।    
  • Dharam News: कब से शुरू होगा सावन का पवित्र महीना, जानें इस बार कितने पड़ेंगे सोमवार

    Dharam News: कब से शुरू होगा सावन का पवित्र महीना, जानें इस बार कितने पड़ेंगे सोमवार

    Dharam News: हिंदू धर्म में सावन का महीना बेहद पवित्र और शुभ माना जाता है। यह पूरा महीना भगवान शिव की आराधना को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दौरान सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करने पर वे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। सावन के महीने में शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। श्रद्धालु शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं, व्रत रखते हैं और भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। क्यों किया जाता है सावन में जलाभिषेक पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकला विष संसार को नष्ट कर सकता था। दुनिया की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया। विष के प्रभाव से उनके शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न हो गई थी। तब देवताओं ने भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए उन पर जल अर्पित किया। यह घटना सावन महीने में हुई थी। तभी से सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने और जलाभिषेक करने की परंपरा चली आ रही है। सावन 2026 कब से शुरू होगा हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में सावन माह की शुरुआत 30 जुलाई 2026 से होगी। यह पवित्र महीना 28 अगस्त 2026 को समाप्त होगा। इस बार सावन में कुल चार सोमवार पड़ेंगे, जिनका विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। सावन 2026 के सोमवार की तारीखें पहला सावन सोमवार 3 अगस्त 2026 दूसरा सावन सोमवार 10 अगस्त 2026 तीसरा सावन सोमवार 17 अगस्त 2026 चौथा सावन सोमवार 24 अगस्त 2026 सावन सोमवार व्रत का महत्व सावन सोमवार का व्रत भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है। अविवाहित लड़कियां योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए और विवाहित महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए यह व्रत रखती हैं। वहीं पुरुष भी अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और भगवान शिव की कृपा पाने के लिए व्रत करते हैं। शिव जी के जलाभिषेक की आसान विधि
    1. स्नान कर पूजा की तैयारी करें
    सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री पहले से एकत्र कर लें।
    1. भगवान शिव का ध्यान करें
    शिवलिंग के सामने बैठकर हाथ जोड़ें और भगवान शिव का स्मरण करें। मन को शांत रखते हुए पूजा शुरू करें।
    1. पंचामृत से अभिषेक करें
    शिवलिंग पर दूध, दही, शहद, घी, शक्कर और गन्ने के रस से अभिषेक करें। इसके बाद साफ जल अर्पित करें।
    1. जल चढ़ाते समय मंत्र जाप करें
    शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाएं और लगातार “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते रहें।
    1. गंगाजल अर्पित करें
    गंगाजल में थोड़े से काले तिल मिलाकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें और फिर इसे शिवलिंग पर अर्पित करें।
    1. भगवान शिव को प्रिय वस्तुएं चढ़ाएं
    महादेव को बेलपत्र, फूल, शहद और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।
    1. दीपक जलाकर पाठ करें
    आटे का चौमुखी दीपक जलाएं और श्रद्धा भाव से शिव चालीसा का पाठ करें।
    1. आरती और दान करें
    पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती करें। अपनी क्षमता के अनुसार गरीब और जरूरतमंद लोगों को दान अवश्य दें।            
  • आखिर कब है परमा एकादशी, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

    आखिर कब है परमा एकादशी, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

    धर्म: एक साल में कुल 24 एकादशी आती हैं यानी हर महीने दो एकादशी होती है। यह बात हम सभी जानते हैं लेकिन इन सभी एकादशियों में एक ऐसी भी एकादशी होती है जो हर साल नहीं आती है। यह है परमा एकादशी जो सिर्फ अधिक महीने के दौरान और वह भी लगभग 3 साल में एक बार ही पड़ती है। यही कारण है कि इसे बेहद विशिष्ट और दुर्लभ एकादशी माना जाता है। यह बाकी 24 एकादशियों से अलग है क्योंकि इसका आगमन सिर्फ विशेष संयोग में ही होता है इसलिए इसका महत्व भी कई गुना अधिक माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सभी एकादशियों पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है और पापों से मुक्ति व पुण्य की प्राप्ति की कामना की जाती है लेकिन परमा एकादशी को परम यानी सर्वोच्च एकादशी कहा गया है क्योंकि यह मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है।

    परमा एकादशी की तिथि और समय

    इस बार परमा एकादशी को लेकर लोगों में तारीख को थोड़ा भ्रम है लेकिन स्पष्ट रुप से यह व्रत 11 जून 2026 को रखा जाएगा। एकादशी तिथि इस बार 10 जून की रात 12 बजकर 57 मिनट से शुरु होते ही 11 जून की रात 10 बजकर 36 मिनट पर समाप्त होगी इसलिए व्रत 11 जून को ही किया जाएगा।

    विशेष योग

    इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और शोभन योग बन रहे हैं जो बेहद शुभ माने जाते हैं। इस दिन किए गए कामों में सफलता मिलने की संभावना ज्यादा होती है खासकर व्यापार और करियर से जुड़े कामों में व्यक्ति सफल हो सकता है।

    पौराणिक महत्व

    पुराणों में वर्णन मिलता है कि धन के देवता कुबेर ने भी परमा एकादशी का व्रत किया था। जिसके प्रभाव से उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्राप्त हुआ था। वहीं सत्यवादी राजा हरिशचंद्र जिन्होंने अपना राज्य, परिवार और सब कुछ खो दिया था। उन्होंने भी इस व्रत का पालन किया था। इसके प्रभाव से उन्हें अपना खोया हुआ राज्य, परिवार और वैभव पुन प्राप्त हुआ था। इन उदाहरणों से साफ होता है कि यह एकादशी जीवन में सुख,समृद्धि और पुन स्थापना का मार्ग खोलने वाली मानी जाती है।

    अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य

    धार्मिक ग्रंथों में यह बताया गया है कि परमा एकादशी का व्रत रखने और भगवान विष्णु का पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से व्रत और पूजा करता है उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

    परमा एकादशी व्रत विधि

    व्रत से एक दिन पहले रात में भारी भोजन न करें। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठे और स्नान करें। घर के मंदिर की सफाई कर दीपक जलाएं। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पीले पुष्ण विष्णु जी को और लाल पुष्प लक्ष्मी जी को अर्पित करें। गंगाजल से स्नान, तिलक और अक्षत अर्पित करें। फल, मिष्ठान और तुलसी दल के साथ भोग लगाएं।

    मंत्र जाप

    ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का 108 बार जाप करें। शाम को पुन पूजा करें। भजन-कीर्तन करें और भगवान से अपनी मनोकामना प्रार्थना करें। परमा एकादशी का व्रत रखने से मानसिक शांति और स्थिरता मिलती है। जीवन में पॉजिटिव एनर्जी आती है। धन और समृद्धि के मार्ग खुलते हैं। कष्ट और बाधाएं दूर होती है। आध्यात्मिक उन्नति होती है।    
  • आज का दिन चांद होगा Blue, जानें भारत में कब दिखेगा?

    आज का दिन चांद होगा Blue, जानें भारत में कब दिखेगा?

    धर्म: आज 31 मई 2026 की शाम आस-मान में एक बहुत ही खास और दुर्लभ खगोलीय नजारा देखने को मिलेगा। इसको ब्लू मून कहते हैं। यदि आप इन अनोखी घटना को देखने को लिए उत्साहित है। यहां इससे जुड़ी पूरी जानकारी जरुरी है।

    ब्लू मून क्या होता है?

    अक्सर लोगों को लगता है कि इस दिन चांद का रंग ब्लू दिखाई देगा लेकिन यह सिर्फ एक खगोलिय घटना है। जब एक ही कैलेंडर महीने में दो पूर्णिमा पड़ती है। दूसरी पूर्णिमा को ब्लू मून कहते हैं। चूंकि मई 2026 में 1 मई और 31 मई को दो पूर्णिमा पड़ी है इसलिए आज की पूर्णिमा को ब्लू माना जा रहा है। इसको माइक्रो मून भी कहा जा रहा है क्योंकि यह अपनी कक्षा में पृथ्वी से दूर होने के कारण आकार में सामान्य से थोड़ा छोटा प्रतीत हो सकता है।

    चांद लाल और विशाल क्यों दिखेगा

    जब चांद क्षितिज के पास होता है तो उसकी रोशनी को हम तक पहुंचने के लिए पृथ्वी के वायुमंडल की एक मोटी परत को पार करना पड़ता है। इस सफर में नीले रंग की छोटी तरंगें बिखरे जाती हैं और सिर्फ लाल और नारंगी रंग की लंबी तरंगें ही हमारी आंखों तक पहुंच पाती है। चांद का बहुत बड़ा दिखना वास्तव में एक ऑप्टिकल इल्यूजन यानी आंखों को धोखा है। जब चांद पेड़ों, पहाड़ों या इमारतों जैसी वस्तुओं के पास होता है तो हमारा दिमाग संदर्भ के कारण उसे बहुत बड़ा समझने लगता है। इसके आकार में कोई भौतिक बदलाव नहीं होता है।

    भारत में कब और कैसे देखें

    भारत में आज शाम सूर्यास्त के बाद लगभग 6:30 बजे से 7:30 बजे के बीच इसे दक्षिण पूर्वी आकाश में देखना सबसे अच्छा रहेगा। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए किसी महंगे टेलीस्कोप या विशेष उपकरण की जरुरत नहीं है। आप इसे अपनी खुली आंखों से घर की छत या किसी खुले स्थान से देख सकते हैं। ज्योतिष और लोक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा का दिन ऊर्जा से भरपूर माना जाता है। इस दिन शांति और समृद्धि के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देना और ऊं सोमाय नम: मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। मन की शांति के लिए ध्यान करना, दान करना और माता लक्ष्मी की पूजा कर उन्हें खीर को भोग लगाना अत्यंत फलदायी माना जाता है।