Home Lifestyle इस वजह से मशहूर हुआ Momos का Trend, 600 साल पुराना है इतिहास

इस वजह से मशहूर हुआ Momos का Trend, 600 साल पुराना है इतिहास

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इस वजह से मशहूर हुआ Momos का Trend, 600 साल पुराना है इतिहास
नई दिल्ली: शाम होते ही गली नुक्कड़ पर मोमोज के स्टॉल पर काफी भीड़ होती है। वैसे तो मोमोज को पूरे भारत में खाया जाता है परंतु दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में उसकी ज्यादा दीवानगी देखी जाती है। अब चाहे वो रेहड़ी हो, मेट्रो के बाहर का मार्केट हो या फिर कोई इलाका। हर जगह आपको मोमोज के स्टॉल दिख ही जाएंगे। जहां पर अलग-अलग वैरायटी केे मोमोज खाने को मिलेंगे। अक्सर कुछ लोगों का यह लगता है कि यह कोई मॉर्डन फास्ट फूड है लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे आप सिर्फ एक स्नैक समझ रहे हैं कि वो असल में बहुत मुश्किल समय में पेट भरने की मजबूरी के कारण हुआ था।

600 साल पहले हुआ था आविष्कार

मोमोज का आविष्कार करीबन 600 पहले तिब्बत में हुआ था। आज लाल चटनी और मेयोनीज के साथ परोसा जाने वाला यह जायका कभी सर्वाइव करने के लिए खाया जाता था। मोमोज का इतिहास बहुत ही पुराना है और इसका सीधा संबंध तिब्बत की भौगोलिक परिस्थितियों से है। माना जाता है कि मोमोज की शुरुआत 14वीं-15वीं सदी के आस-पास तिब्बत में हुई थी। उस समय ये खासतौर पर ठंडे इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए एनर्जी फूड था। रिपोर्ट्स के अनुसार, तिब्बत में हड्डियां गलाने वाली ठंड पड़ती थी और खेती बाड़ी करना लगभग असंभव हो जाता था और लोगों के पास खाने-पाने के संसाधन काफी कम थे। ऐसे में मैदे की एक पतली परत के अंदर मांस को भरकर भाप में पकाने की तकनीक इजाद की गई। इसे तिब्बती भाषा में मोग-मोग कहते थे। कम संसाधनों में लोगों का पेट भरने और शरीर को गर्मी देने के लिए यह सबसे सुरक्षित और आसान तरीका था। धीरे-धीरे यह तिब्बती संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई और मोमोज का जन्म हो गया था। मोमोज को तिब्बत की सीमाओं से बाहर निकालने का श्रेय नेवारी व्यापारियों को ही जाता है। रिपोर्ट् के अनुसार, 1960 के दशक के आस-पास जब काठमांडू के व्यापारी बिजनेस के सिलसिले में ल्हासा जाते थे और वो इस डिश के फैन हो गए थे। वो व्यापारी इस रेसिपी को नेपाल में लाए और वहां पर इसे ममो के नाम से जाना जाने लगा। इसके बाद वहां के मामलों में अपने सफर दक्षिण एशिया की ओर शुरु किया। धीरे-धीरे पहाड़ी रास्तों में होते हुए भारत में दाखिल हुआ।

ऐसे पहुंचे मोमोज

भारत में मोमोज की एंट्री मुख्य तौर पर 1959 के बाद हुई। इस दौरान बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी दलाई लामा के साथ भारत में आए। रिपोर्ट्स के अनुसार, धर्मशाला, दार्जिलिंग, सिक्किम और दिल्ली के मजनू का टीला जैसे इलाकों में बसे लोगों ने इसका खूब इस्तेमाल किया है। शुरुआती दौर में यह सिर्फ तिब्बती समुदायों तक ही सीमित था परंतु 90 के दशक के आखिर में इसने दिल्ली की गलियों में अपनी जगह बनाना शुरु की। भारत के लोगों को इसका स्टीम्ड टेक्सचर और तीखी मिर्च वाली चटनी इतनी अच्छी लगी कि आज यह समोसे की टक्कर देने वाला सबसे बड़ा स्ट्रीट फूड बन गया है।

मजबूरी से मॉर्डन स्नैक का बना सफर

आज मोमोज सिर्फ एक स्टीम्ड नहीं रही बल्कि भारतीय स्वाद के अनुसार, इसमें तंदूरी, फ्राइड, कुरकुरे और यहां तक कि पनीर और सोया मोमोज जैसे नगिनत एक्सपेरिमेंट हो गए हैं। जिस खाने को लोग अनाज की कमी के कारण मजबूरी में खाते थे वो आज युवाओं के बीच में कंफर्ट फूड बन चुका है।      

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