बैठक के दौरान जनस्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग ने ट्रीटेड वेस्ट वाटर के दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए चरणबद्ध योजना बनाई है। पहले चरण में 21 जिलों के 35 एसटीपी को शामिल करते हुए 500 करोड़ रुपये की परियोजना तैयार की गई, जिसे नाबार्ड के तहत मंजूरी मिली। इनमें 27 एसटीपी को माइक्रो इरिगेशन के जरिए ट्रीटेड वेस्ट वाटर के दोबारा इस्तेमाल के लिए अंतिम रूप दिया गया है। 19 एसटीपी का काम पूरा हो चुका है, जबकि 8 पर काम चल रहा है। इस परियोजना से करीब 40 हजार एकड़ खेती की जमीन को सिंचाई जल मिलेगा।
अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को बताया कि दूसरे चरण में 57 एसटीपी को शामिल किया गया है। इनमें 13 एसटीपी की क्षमता 157.50 एमएलडी और 44 एसटीपी की क्षमता 370.75 एमएलडी है। फिलहाल राज्य में 207 एसटीपी/सीईटीपी हैं और बाकी प्लांट्स को भी चरणबद्ध तरीके से इस योजना से जोड़ा जाएगा।
विभाग ने पहले चरण की परियोजनाएं समय पर पूरी करने, दूसरे चरण के व्यवहारिक एसटीपी विकसित करने और बाकी एसटीपी को भी इस योजना से जोड़ने की तैयारी की है। लक्ष्य है कि विजन@2047 के तहत मार्च 2031 तक राज्य में 100 फीसदी ट्रीटेड वेस्ट वाटर का दोबारा इस्तेमाल किया जाए।
एसटीपी और सीटीपी की मैपिंग की जाएं
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने निर्देश देते हुए कहा कि प्रदेश में जहां-जहां एसटीपी और सीटीपी स्थापित हैं, उनकी विस्तृत मैपिंग की जाए। प्रत्येक प्लांट की क्षमता, वहां से निकलने वाले ट्रीटेड पानी की मात्रा, उसके संभावित उपयोग और आसपास के क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था का पूरा खाका तैयार किया जाए। उन्होंने कहा कि सही योजना और बेहतर समन्वय के साथ ट्रीटेड पानी का व्यापक स्तर पर उपयोग किया जा सकता है, जिससे भूजल और पेयजल स्रोतों पर दबाव भी कम होगा। उन्होंने निर्देश दिए कि ट्रीटेड पानी के उपयोग में सबसे पहले थर्मल पावर प्लांटों को प्राथमिकता दी जाए। इसके बाद ग्रीन बेल्ट, पार्कों, पौधारोपण और कृषि कार्यों में इसका अधिक से अधिक उपयोग सुनिश्चित किया जाए। साथ ही औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी अलग से योजना तैयार की जाए, ताकि उद्योगों में भी ताजे पानी की जगह ट्रीटेड पानी का उपयोग बढ़ाया जा सके।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को इस पूरी व्यवस्था को स्ट्रीमलाइन करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि यह कार्य केवल एक विभाग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग, सिंचाई विभाग, शहरी स्थानीय निकाय, उद्योग विभाग, ऊर्जा विभाग और हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित सभी संबंधित विभाग संयुक्त रूप से कार्ययोजना तैयार करें। इसके लिए विभागों के वरिष्ठ अधिकारी नियमित रूप से बैठक करें और पूरे कार्य की क्लोज मॉनिटरिंग सुनिश्चित करें।
कॉलोनियों के एसटीपी की होगी जांच
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश की सोसायटी कॉलोनियों में स्थापित एसटीपी की भी विशेष जांच की जाएगी। इसके लिए हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ-साथ संबंधित नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं के अधिकारी संयुक्त रूप से निरीक्षण करेंगे। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाए कि निजी कॉलोनियों के एसटीपी से निकलने वाले ट्रीटेड पानी का उपयोग कॉलोनियों की ग्रीन बेल्ट, पार्कों और पौधारोपण में हो। यदि वहां इसकी आवश्यकता नहीं है, तो पाइपलाइन अथवा अन्य उपयुक्त नेटवर्क के माध्यम से इस पानी को खेतों या अन्य जरूरत वाले क्षेत्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाए। प्रदेश में लगभग 678 सोसायटी कॉलोनी हैं, जहां इस व्यवस्था की चरणबद्ध समीक्षा की जाएगी।
क्लस्टर बनाकर होगी ट्रीटेड पानी की सप्लाई
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सिंचाई विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे क्लस्टर आधारित व्यवस्था विकसित कर ट्रीटेड पानी की सप्लाई सुनिश्चित करें। जहां एक से अधिक एसटीपी हैं, वहां उन्हें आपस में जोड़कर प्रभावी वितरण प्रणाली विकसित की जाए, ताकि अधिक से अधिक क्षेत्रों तक इस पानी का लाभ पहुंच सके।कुसुम योजना के तहत लगाए जाएंगे सोलर सिस्टम
बैठक में एसटीपी के संचालन पर आने वाले बिजली खर्च पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि कुसुम योजना के तहत अधिक से अधिक एसटीपी पर सोलर सिस्टम लगाए जाएं, ताकि बिजली की लागत कम हो और किसी भी परिस्थिति में प्लांटों का संचालन प्रभावित न हो। इसके अलावा उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि 24 घंटे यह प्लांट चलने चाहिए, जिसे भी मैटेंस इत्यादि की जिम्मेवारी दी जाएं तो यह सुनिश्चित किया जाएं कि किसी प्रकार की लापरवाही ना हो।हर प्लांट की तैयार होगी विस्तृत बुकलेट
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि पूरे प्रदेश के सभी एसटीपी और सीटीपी की एक विस्तृत बुकलेट तैयार की जाए। इसमें प्रत्येक प्लांट का पता, लोकेशन, क्षमता, प्रतिदिन ट्रीट होने वाले पानी की मात्रा, ट्रीटेड पानी की उपलब्धता, संबंधित अधिकारियों के संपर्क विवरण तथा पानी के उपयोग की वर्तमान एवं प्रस्तावित व्यवस्था का पूरा विवरण शामिल किया जाएगा। इससे भविष्य की योजनाएं बनाने और उनकी निगरानी करने में सुविधा होगी।