धौम्येश्वर महादेव मंदिर: पांडवों के गुरू धौम्य ऋषि ने किया था तप, शिव ने दिए थे दर्शन

श्रद्धालुओं की सुविधा के साथ-साथ गरीब और असहाय लोगों की मदद भी की जा रही है

ऊना/ सुशील पंडित : हिमाचल प्रदेश देवी देवताओं की पवित्र धरती है और यहां अनेकों पौराणिक मंदिर स्थापित हैं। इन्ही में से एक है ऊना जिला के तलमेहड़ा गांव का सदाशिव धौम्येश्वर महादेव मंदिर। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पांडवों के राज पुरोहित धौम्य ऋषि ने इसी स्थान पर भगवान शिव की अराधना की थी। भगवान ने तपस्या से प्रसन्न होकर धौम्य ऋषि द्वारा स्थापित शिव लिंग की सच्चे मन से पूजा अर्चना करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूरी करने का वरदान दिया था। महाशिवरात्रि और सावन के माह के अलावा रोजाना दूर दराज से श्रद्धालु धौम्येश्वर शिव मंदिर पहुंचते हैं। शिवरात्रि के सप्ताह में श्रद्धालुओं का सैलाब भोलेनाथ के दर्शनों के लिए उमड़ रहा है। देश विदेश से शिव भक्त ध्यूंसर पर्वत पर विराजमान इस दिव्य स्थान के दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं।

ऊना से बड़ूही-जोल और खुरवाईं-जोल मार्ग से इस मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। मंदिर को सदाशिव मंदिर या ध्यूंसर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय लोग तो अपने अराध्य के इस दिव्य स्थान को मात्र शिवां के नाम से जानते हैं। दक्षिणी भारत से आए एक संत ने लगभग 50 वर्ष पूर्व यहां मंदिर बनाने का सुझाव दिया था। उससे पहले श्रद्धालु नीले गगन के तले शिवलिंग की पूजा किया करते थे। 

ऊंचाई से दिखता है पूरा जिला
सदाशिव मंदिर की विशेष धार्मिक मान्यता है। प्रकृति के अपार सौंदर्य को समेटे यह दिव्य स्थान तलमेहड़ा के बही गांव में स्थित है। चीड़ और चौड़े पत्तों के विशाल जंगल से घिरा यह स्थान शिव भक्तों को भावविभोर कर देता है। जो भी एक बार यहां आता है यहीं का होकर रह जाता है। पंजाब से आए श्रद्धालु अक्सर कहते हैं कि सदाशिव मंदिर की परिधि में ऐसा जरूर कुछ है कि व्यक्ति फिर उम्रभर इस मंदिर में आए बिना रह नहीं सकता। लोअर शिवालिक की पहाड़ियों में ऐसे अलौकिक नजारे और कहीं नहीं दिखते। ऊना जिला के सबसे खूबसूरत और ऊंचे स्थलों में से एक सदाशिव मंदिर से पूरे जिले के अलौकिक नजारे भी देखे जा सकते हैं। 

ट्रस्ट ने मंदिर को बनाया सबसे खास

यहां आने वाले भक्तों ने एक बात और महसूस की है कि इस मंदिर में कोई बाजार नहीं है। मंदिर की सेवा स्थानीय निवासियों द्वारा बनाए गए एक ट्रस्ट द्वारा की जाती है। ट्रस्ट के प्रधान प्रवीण शर्मा का कहना है कि धार्मिक स्थल को बाजार का रूप देने से हम सदा बचते रहे हैं। यहां भक्तों को किसी भी प्रकार से सामान खरीदने के लिए विवश भी नहीं किया जाता। भक्त और शिव के मध्य कोई नहीं आता। श्रद्धालु यहां आते हैं और मंदिर में बैठकर ध्यान, कीर्तन और तप करके चले जाते हैं। कुछ साधक पास के जंगलों में भी ध्यान साधना में बैठे नजर आ सकते हैं। इसलिए ट्रस्ट का साफ मानना है कि मंदिर को मात्र धार्मिक स्थल ही रहने दिया जाए। बाजार या व्यापार का केंद्र नहीं। प्रवीण बताते हैं कि साल 1937 में मद्रास के एक सैशन जज स्वामी ओंकारा नंद गिरी जी ने इस स्थान की खोज शुरू की थी। उन्होंने जंगल में शिवलिंग को खोजा और तपस्या करने लगे। जब स्थानीय लोगों ने उनसे पूछा कि आपको इस शिवलिंग के बारे में कैसे पता चला तो उन्होंने बताया कि मैं आराम से एक जज के नाते अपने दायित्व का निर्वहन कर रहा था। एक दिन भगवान शिव मेरे स्वपन में आए और मुझे धौम्य ऋषि की तपोस्थलि पर जाकर पूजा अर्चना का आशिर्वाद दिया। शिव ने उनसे कहा कि पांडवों के अज्ञातवास के समय उनके पुरोहित धौम्य ऋर्षि द्वारा स्वयंभू शिवलिंग को खोजकर वहां अर्चना करो। 

10 वर्ष ढूंढने पर मिला दिव्य स्थान

वे 10 वर्ष शिवालिक की पहाड़ियों पर इसकी खोज करते रहे और साल 1947 में सोहारी गांव पहुंचे। वहां वे स्कूल के प्रिंसिपल शिव प्रसाद शर्मा डबराल के सहयोग से इस दिव्य स्थान तक पहुंचे। स्वामी जी के सानिध्य में सबसे पहले एक छोटा सा मंदिर बनाया गया जो आज पूरे भारत के धार्मिक नक्शे पर विराजमान हो चुका है। आज सदाशिव मंदिर का ट्रस्ट न सिर्फ धार्मिक दायित्व निभा रहा है अपितु समाज सेवा के कार्यों को भी पूरी निष्ठा से पूरा कर रहा है। हिमाचल के कोने कोने से मंदिर संचालन करने वाली कमेटियां और ट्रस्ट सदाशिव मंदिर के मॉडल को अपना भी रहे हैं। मंदिर का यश बढ़ा तो कुछ राजनेताओं ने इसे कब्जाना भी चाहा। लेकिन जो भी अधिकारी जांच के लिए आया वह भी महादेव का भक्त बनकर ही लौटा। सभी अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ऐसा सुव्यवस्थित मंदिर हमने पहले कभी नहीं देखा। मंदिर में दिन रात लंगर चला रहता है। मंदिर ट्रस्ट एक दिव्य गौशाला का संचालन भी करता है। गौमाता का स्वास्थ देख आस पास की गौशालाएं भी इस मंदिर से कुछ सीखकर ही लौटती हैं।

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