देश की ख्याति प्राप्त लेखिका नंदिता बाली को डॉक्टरेट की मानक उपाधि

इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान के निदेशक आचार्य वीरेन्द्र गहरवार ने दिया सम्मान

हिंदी साहित्य व लेखन में प्राप्त किया 41 वां राष्ट्रीय सम्मान 

बद्दी/सचिन बैंसल: हिंदी साहित्य एवं लेखन में देश भर में ख्याति प्राप्त कर चुकी हिमाचल की सेवानिवृत्त हिंदी प्रवक्ता नंदिता बाली को इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा गया है। हिंदी साहित्य एवं लेखन में देश भर की संस्थाओं द्वारा 40 राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजी जा चुकी सेवानिवृत्त हिंदी प्रवक्ता अब डॉक्टर नंदिता बाली के नाम से हिमाचल का नाम देशभर में रोशन करेंगी। डॉक्टरेट की मानक उपाधि, स्मृति चिन्ह व सम्मान पत्र उन्हें पुरातत्व शोध संस्थान के निदेशक आचार्य वीरेन्द्र गहरवार द्वारा प्रदान किया गया। इतना ही नहीं उन्हें इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान की हिमाचल इकाई का प्रदेश अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया है। पिछले 20 वर्षों से डॉक्टर नंदिता बाली इस संस्थान के लिए ऐतिहासिक स्थल, टूटती इमारतों, खंडहरों के संरक्षण व पर्यावरण से सम्बंधित कविताएं व लेख लिख रही हैं। समय समय पर डॉक्टर नंदिता बाली के उत्कृष्ट लेखन के लिए उन्हें सम्मानित किया जाता रहा है, लेकिन इस बार उन्हें सर्वोच्च सम्मान डॉक्टरेट को मानक उपाधि से सम्मानित किया गया है। हिमाचल की सेवानिवृत्त हिंदी प्रवक्ता को मिला ये सर्वोच्च सम्मान देवभूमि को गौरवांवित करता है।

डॉक्टर नंदिता बाली के नाम अबतक 41 राष्ट्रीय अवार्ड हैं और 2002 में मानवाधिकार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा करने वाली वह प्रथम व एकमात्र हिमाचली महिला हैं। वहीं डॉक्टर नंदिता बाली एकमात्र महिला हैं जिन्हें 21वीं सदी की महान महिला के रूप में वायोग्राफिकल सोसायटी यू.एस.ए. केलिफोर्निया ने चयनित किया और उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया। बद्दी के हाउसिंग बोर्ड में रहने वाली डॉक्टर नंदिता बाली हिन्दी प्रवक्ता के पद से 2015 में सेवानिवृत्त हुईं और निरंतर लेखन व ऑनलाइन कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेती आ रही हैं। नंदिता बाली ने बताया के चित्र लेखन, गद्य व पद्य विधा लेखन के अलावा उनकी रूचि कविता लेखन में रही है। लेखन ने उन्हें विश्वभर में पहचान दी और आज भी उनका लेखन व कवि सम्मेलनो के प्रति लगाव जारी है। डॉक्टर नंदिता बाली ने कहा के डॉक्टरेट की उपाधि हासिल करना उनका अरमान था जो आज पूरा हुआ है। वहीं इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान की पत्रिका गंगोत्री में उनकी कविता को स्थान मिला। उन्होंने कहा के वह आगे भी हिंदी साहित्य व लेखन से जुड़ी रहकर लेखन की यात्रा को जारी रखेंगी।

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