Category: Health

  • क्या दिन में 2 कप Coffee पीने से कम होगा Heart Problems का खतरा? जानें

    क्या दिन में 2 कप Coffee पीने से कम होगा Heart Problems का खतरा? जानें

    सेहत: दुनिया में ऐसे कई लोग है जिनके दिन की शुरुआत एक कप कॉफी के साथ होता है। ऐसे में अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के द्वारा किए गए अब तक के सबसे बड़े रिसर्च से बड़ी राहत मिली है। रिसर्च के अनुसार, ज्यादातर स्वस्थ लोगों के लिए रोज 400 मिलीग्राम तक कैफीन का सेवन करना सुरक्षित होता है। इससे दिल संंबंधी बीमारियों, स्ट्रोक और हार्ट फेलियर का खतरा बढ़ता है। परंतु ध्यान देने वाली बात यहां पर यह है कि सभी तरह के कैफीन पदार्थ एक जैसे ही नहीं होते हैं जैसे कि एनर्जी ड्रिंक्स और कैफीन शॉट्स इसमें बहुत कम मात्रा में काफी ज्यादा कैफीन होात है। इससे आपको फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है।

    दिल का ऊपरी हिस्सा होता है अनियमित

    एक्सपर्ट्स के अनुसार, कॉफी पीने से एट्रियल फाइब्रिलेशन से पीड़ित लोगों पर ज्यादा असर पड़ सकता है। एट्रियल फ्राइब्रिलेशन दिल की धड़कन की सबसे खराब स्थिति है जिसमें दिल का ऊपरी हिस्सा तेजी से और अनियमित तौर पर धड़कने लगता है। इससे स्ट्रोक, हार्ट फेलियर और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

    काफी का ज्यादा सेवन से कम होगा दिल संबंधी बीमारियों का खतरा

    अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के द्वारा सर्कुलेशन पत्रिका में प्रकाशित नए वैज्ञानिक बयानों के अनुसार, कम मात्रा में कॉफी का सेवन करने से ज्यादा लोगों में दिल संबंधी बीमारियों का खतरा नहीं बढ़ता। इसके साथ ही वो यह कहते हैं कि यदि चीनी, सिरप या ब्लैक कॉफी पीना छोड़ दें। इससे दिल संबंधी, स्ट्रोक, हार्ट फेलियर और शुगर जैसी कई बीमारियों का खतरा कम होता है।

    कम मात्रा में काफी पीना होता है सुरक्षित

    कम मात्रा में कॉफी पीना सुरक्षित होता है परंतु एनर्जी ड्रिंक्स के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है क्योंकि नई एनर्जी ड्रिंक्स और एनर्जी शॉट्स में आम कॉफी की तुलना में तीन से चार गुना ज्यादा कैफीन होता है। यदि इन चीजों में अक्सर ऐसी दवाईयां या तत्व मिलाएं जाएं तो शरीर में कैफीन बहुत तेजी से असर करने में मदद करता है। इस रिसर्च में यह भी सामने आया है कि एनर्जी ड्रिंक्स में कैफीन की ज्यादा मात्रा हाई ब्लड प्रेशर और हृदय गति बढ़ेगी। स्वस्थ युवाओं को भी इन पेय पदार्थों को ज्यादा मात्रा में सेवन करने से दिल की गति में गड़बड़ी का अनुभव हुआ है।

    कैफीन पीने के फायदे

    खास बात यह है कि शोधकर्ताओं का यह कहना है कि कॉफी पीने के काफी हेल्थ बेनिफिट्स भी हैं। कॉफी में सैंकड़ों ऐसे प्राकृतिक तत्व भी होते हैं जो शरीर की सूजन को कम करते हैं। यह खून की नसों को सुरक्षित रखते हैं। इसी वजह से अध्ययनों में कॉफी अक्सर सप्लीमेंट या एनर्जी ड्रिंक्स के जरिए से सेवन किए गए कैफीन से अच्छा परिणाम देती है। इस रिसर्च के जटिल होने का एक कारण यह है कि हर व्यक्ति पर इसका असर अलग-अलग होता है। हर व्यक्ति के शरीर पर कॉफी का असर अलग तरीके से होता है। आपकी उम्र, जीन, लिवर की क्षमता, दवाइयां और आप कितनी बार कॉफी पीते हैं। इन सभी बातों से यह तय होता है कि आपका शरीर कैफीन को जल्दी पचाएगा। यही कारण है कि कुछ लोग बिना किसी परेशान के कई कप कॉफी पी लेते हैं वहीं कुछ लोगों को एक ही कप में घबराहट, तेज धड़कन या नींद न आने जैसी समस्या होने लगती है।

    दिन में पीनी चाहिए इतनी कॉफी

    कई अध्ययनों में लगातार यह बात सामने आई है कि रोज 2-4 कप कॉफी पीना सबसे सही होता है परंतु इससे ज्यादा कॉफी का सेवन यदि करेंगे तो कुछ लोगों में दिल गति रुकने का खतरा बढ़ सकता है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि किसी भी चीज को यदि सीमित मात्रा में लेना ही सबसे समझदारी भरा काम होता है।    
  • एक ही घर के दोनों बच्चों का दिमाग आखिर क्यों होता है अलग? Scientists ने ढूंढा सवाल का जवाब

    एक ही घर के दोनों बच्चों का दिमाग आखिर क्यों होता है अलग? Scientists ने ढूंढा सवाल का जवाब

    सेहत: एक ही घर में पले-बढ़े भाई बहनों के बीच में अक्सर यह देखा जाता है कि उनकी बुद्धि, सोचने का तरीका और व्यवहार एक-दूसरे से काफी अलग होता है। समान परवरिश, एक जैसे संसाधन और एक ही माहौल के बाद भी यह अंतर क्यों आता है। यह सवाल लंबे समय से साइकोलॉजिस्ट और रिसर्चर ढूंढ रहे हैं। अब रिसर्स के इस रहस्य पर कुछ बातें भी सामने आई हैं।

    आखिर कौन सा बच्चा होता है ज्यादा बुद्धिमान?

    अक्सर यह भी माना जाता है कि पहला बच्चा सबसे ज्यादा बुद्धिमान होता है। इस धारणा के पीछे कुछ साइंटिफिक आधार भी मिलते हैं। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के एक स्टडी के अनुसार, पहले जन्मे बच्चों में सोचने-समझने की क्षमता अपने छोटे भाई-बहनों की तुलना में ज्यादा होती है। ऐसे ही एडिनवर्ग यूनिवर्सिटी, एनालिसिस ग्रूप और सिडनी यूनिवर्सिटी के इकोनॉमिस्ट ने अमेरिकी का ब्यूरो ऑफ लेब स्टैटिस्टिकस के आंकड़ों का एनालिसिस किया है। इस रिसर्च में यह पाया गया है कि पहले जन्मे हुए बच्चे एक साल की उम्र से ही इंटेलिंजेंस टेस्ट में अपने भाई-बहनों से आगे रहने लगते हैं।

    क्या होता है इसका कारण?

    इस अंतर के पीछे कई कारण बताए गए हैं। पहला कारण होता है माता-पिता का पूरा ध्यान, परिवार में जब पहला बच्चा होता है तो उसको अपने परिवार का पूरा साथ और मार्गदर्शन मिल जाता है। एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के रिसर्च में यह सामने आया है कि भले ही माता-पिता सभी बच्चों को इमोशनल रुप से समान समर्थन देते हो लेकिन पहले बच्चे को मानसिक विकास से जुड़े कामों में ज्यादा मदद मिलती है।

    सिखाने का भी प्रभाव

    दूसरा महत्वपूर्ण कारण है सिखाने का प्रभाव। बड़ा बच्चा अक्सर अपने छोटे भाई बहनों को चीजें सिखाता है। यह प्रक्रिया उसके अपने ज्ञान और समझ को और मजबूत करती है। यानी सिखाने से उसकी सीखने की क्षमता और बेहतर हो जाती है हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि मंझला या सबसे छोटा बच्चा कम बुद्धिमान होता है। कई बार छोटे बच्चे अलग तरह की क्षमताओं में आगे निकल जाते हैं कि क्रीएइवटिविटी, सामाजिक समझ या नए विचारों के प्रति खुलापन है।

    पालन पोषण में बदलाव का होगा असर

    एक और जरुरी पहलू होता है कि पालन-पोषण में बदलाव। हर बच्चे के साथ माता-पिता का व्यवहार थोड़ा बदल जाता है। अनुभव बढ़ाने के साथ-साथ ऐसे बच्चों का तरीका भी बदल जाता है। अनजाने में बच्चों के आत्मविश्वास, सोच और व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। माता-पिता के लिए सबसे ज्यादा जरुरी बात है कि बच्चों को किसी एक पहचान में बांधकर न रखें। यह सबसे होशियार है और यह शरारती है जैसे कि लेबल बच्चों के मन पर गहरा असर डालते हैं। वो खुद को उसी नजर से देखने लगते हैं। इसके कारण बच्चों के प्रयास, मेहनत और प्रगति पर ध्यान देना ज्यादा जरुरी है।    
  • क्या जामुन खाने से कंट्रोल होती है डायबिटीज? जानिए एक्सपर्ट ने क्या बताया और कितनी मात्रा में खाना है सही

    क्या जामुन खाने से कंट्रोल होती है डायबिटीज? जानिए एक्सपर्ट ने क्या बताया और कितनी मात्रा में खाना है सही

    नई दिल्ली: बरसात के मौसम में मिलने वाला जामुन स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है। यह फल विटामिन सी, आयरन, पोटेशियम, मैग्नीशियम और कई शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है। यही वजह है कि लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि जामुन खाने से ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद मिलती है। कई लोग इसकी गुठली का पाउडर बनाकर भी सेवन करते हैं और दावा करते हैं कि इससे डायबिटीज नियंत्रित रहती है। लेकिन क्या सच में जामुन डायबिटीज का इलाज कर सकता है? क्या केवल जामुन खाने से शुगर कंट्रोल हो जाएगी? इस सवाल का जवाब स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दिया है। कैलाश दीपक हॉस्पिटल के एंडोक्रिनोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. निशांत जैन के मुताबिक, जामुन को डायबिटीज के मरीजों के लिए फायदेमंद जरूर माना जाता है, लेकिन इसे बीमारी का इलाज नहीं समझना चाहिए। यह डॉक्टर की दवाओं या इंसुलिन का विकल्प नहीं है। जामुन को केवल एक संतुलित और हेल्दी डाइट का हिस्सा माना जा सकता है, जो ब्लड शुगर मैनेजमेंट में कुछ हद तक मदद कर सकता है। डॉक्टर बताते हैं कि जामुन में एंथोसायनिन, एलेजिक एसिड, फ्लेवोनॉयड्स और जैंबोलिन जैसे प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं। ये शरीर में एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करते हैं और कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में मदद करते हैं। डायबिटीज के मरीजों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस अधिक देखने को मिलता है, इसलिए ऐसे पोषक तत्व शरीर के लिए लाभकारी माने जाते हैं।

    क्या वाकई ब्लड शुगर कम करने में मदद करता है जामुन?

    कुछ शुरुआती रिसर्च में यह संकेत मिले हैं कि जामुन शरीर में स्टार्च को शुगर में बदलने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। इसके अलावा यह इंसुलिन की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में भी मदद कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर अभी और बड़े स्तर के वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत है। जामुन में फाइबर अच्छी मात्रा में मौजूद होता है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) भी कम होता है। यही कारण है कि इसे खाने के बाद ब्लड शुगर का स्तर कई दूसरे मीठे फलों की तुलना में धीरे-धीरे बढ़ता है। यही वजह है कि सीमित मात्रा में जामुन को डायबिटीज मरीजों के लिए बेहतर विकल्प माना जाता है। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि ज्यादा जामुन खाने से ज्यादा फायदा मिलेगा। जरूरत से अधिक सेवन करने पर कब्ज, पेट फूलना, गैस या पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। अगर कोई व्यक्ति पहले से डायबिटीज की दवा या इंसुलिन ले रहा है, तो उसे अपनी डाइट में बदलाव करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए।

    जामुन खाते समय इन बातों का रखें ध्यान

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जामुन हमेशा सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए। इसे खाली पेट खाने से बचना चाहिए। इसके अलावा जामुन खाने के तुरंत पहले या बाद में दूध का सेवन भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे कुछ लोगों को पाचन संबंधी परेशानी हो सकती है। यदि आप डायबिटीज के मरीज हैं, तो केवल जामुन के भरोसे शुगर कंट्रोल करने की कोशिश न करें। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच और डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का सेवन सबसे जरूरी है। जामुन इन सभी चीजों के साथ मिलकर बेहतर स्वास्थ्य बनाए रखने में मदद कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जामुन एक पौष्टिक फल है और सही मात्रा में इसका सेवन शरीर को कई फायदे पहुंचा सकता है। लेकिन इसे किसी चमत्कारी इलाज की तरह नहीं देखना चाहिए। डायबिटीज जैसी बीमारी में डॉक्टर की सलाह और नियमित उपचार ही सबसे महत्वपूर्ण है।
  • क्या आपकी भी सीढ़ियां चढ़ते फूल जाती हैं सांस? इस बीमारी का हो सकता है लक्षण

    क्या आपकी भी सीढ़ियां चढ़ते फूल जाती हैं सांस? इस बीमारी का हो सकता है लक्षण

    सेहत: सीढ़िया चढ़ने समय कई लोगों की सांस फूल जाती है पंरतु इस चीज को कभी भी सामान्य नहीं समझना चाहिए। कई बार इस तरह की कमजोरी बढ़ते वजन या फिटनेस की कमी के कारण से भी होती है परंतु यदि थोड़ी सी सीढ़ियां चढ़ने पर ही आपकी सांस फूलती है तो यह गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है।

    दिल से जुड़ी बीमारियां हो सकती है कारण

    दिल से जुड़ी बीमारियां होने पर आपकी सांस फूल सकती है। जब आपका दिल ठीक से काम नहीं करता है तो शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचाने में दिक्कत होती है। ऐसे में थोड़ी मेहनत करने पर भी सांस तेज चलने लगती है। इसके अलावा सांस फूलने का अलग कारणों में से अस्थमा की बीमारी भी शामिल है। इसके अलावा खून की कमी एनीमिया भी इसका कारण हो सकती है। वजन ज्यादा होने से, रोज एक्सरसाइज न करने पर भी सीढ़ियां चढ़ते हुए सांस फूल सकती है।

    डॉक्टर से कब मिलें

    यदि यह परेशानी बार-बार हो रही है जैसे कि थोड़ी सी मेहनत में ही सांस फूलने लगती है, सीने में दर्द, चक्कर आए या आराम करने के बाद भी सांस सामान्य न हो तो डॉक्टर के साथ मिलें। ऐसे में डॉक्टर आपको दवाई भी दे सकते हैं।

    समस्या से कैसे करें बचाव

    इससे बचने के लिए आपको रोज हल्की एक्सरसाइज करें। हेल्दी फूड खाएं, इसके साथ ही आप वजन को अच्छा रखें। यदि आप पहले से दिल या फेफड़ों की कोई बीमारी है तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार, इलाज करवाएं। सांस फूलना, हर बार किसी गंभीर बीमारी का ही संकेत नहीं होता ऐसे में घबराएं न यदि यह समस्या आपको बार-बार हो तो इसको हल्के में न लें।    
  • लोगों का Diet Coach बन रहा Chatgpt, आप भी कर रहे हैं इस्तेमाल तो बरतें सावधानी

    लोगों का Diet Coach बन रहा Chatgpt, आप भी कर रहे हैं इस्तेमाल तो बरतें सावधानी

    सेहत: एआई टूल्स अब सिर्फ फैक्ट्रियों और ऑफिस तक ही नहीं रहे हैं। अब इनका इस्तेमाल किचन में भी हो रहा है। खाने की रेसिपी के साथ-साथ वजन कम करने के लिए यह पर्सनलाइज्ड मील का भी प्लान बना रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोग चैटजीपीटी जैसे एआई चैटबॉट्स का डाइट कोच के तौर पर ट्रीट कर रहे हैं। उनसे अपने लिए मील प्लान बनवा रहे हैं। ऐसे में अगर आप भी ऐसा कुछ करने की सोच रहे हैं तो थोड़ा संभल जाएं। थेरेपिस्ट का कहना है कि इससे चुनौतियां बढ़ जाएगी। यह फायदे की जगह आफत बन सकता है।

    एआई बनेगा लोगों का डाइटिशियन

    रिपोर्ट्स के अनुसार, एआई चैटबॉट्स पर कई लोग अपनी तस्वीरें शेयर करके वजन कम करने और मसल्स गेन करने की टिप्स मांग रहे हैं। इसी तरह से कुछ लोग अपने खाने की फोटो शेयर करके उसका हेल्दी ऑप्शन पूछते हैं। ऐसी कई रिक्वेस्ट्स के जवाब में ये चैटबॉट लोगों को कार्बोहाइड्रेट कम करने, फास्ट रखने और बहुत ही कम कैलोरी वाला खाना की सलाह दे रहे हैं। मेडिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसी सामान्य सलाह खतरनाक हो सकती है। इससे लोगों को अनहेल्दी आदतें लगती है। एआई को यूजर की मेडिकल हिस्ट्री और मेंटल हेल्थ कंडीशन की जानकारी नहीं होती है। इसका कारण यह भी खाने से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को और मुश्किलों में डाल सकती है।

    इटिंग डिसऑर्डर बना मुश्किल

    रिपोर्ट में यह बताया गया है कि भले ही लोग एआई चैटबॉट्स को एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि परंतु यह जरुरी है कि चीजों में अंतर नहीं कर पाता। किसी एआई चैटबॉट के लिए फिटनेस रुटीन फॉलो करने वाले इटिंग डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों में अंतर कर पाना बहुत मुश्किल है।

    रिकवरी के लिए रहें एआई पर निर्भर

    एआई के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए थेरेपिस्ट का कहना है कि लोगों को एक जरुरी चीज याद रखनी चाहिए। एआई चेटबॉट आपके कई सवालों का जवाब दे सकता है परंतु यह जटिल इमोशन, मेडिकल हिस्ट्री और ईटिंग डिसऑर्डर के पीछे के स्ट्रगल को नहीं समझ सकता है इसलिए इटिंग डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों के लिए इंसानी केयर और एक्सपर्ट्स ट्रीटमेंट जरुरी है। सिर्फ एआई के सहारे रिकवरी नहीं हो सकती है। यह फायदे से ज्यादा नुकसान का कारण भी बन सकती है।  
  • Monsoon में नहीं होगी पेट में इंफेक्शन, Experts ने बताए Healthy Tips

    Monsoon में नहीं होगी पेट में इंफेक्शन, Experts ने बताए Healthy Tips

    सेहत: बारिश का मौसम अपने साथ ठंडी हवाएं और सुहावना मौसम तो लेकर आता है परंतु इसी मौसम में पेट से जुड़ी कई बीमारियां भी हो जाती हैं। मानसून के दौरान उल्टी, दस्त, फूड प्वॉइजनिंग, गैस्ट्रोएन्टराइटिस, टाइफाइड और हेपेटाइटिस ए जैसे इंफेक्शन के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि बारिश के दौरान पानी का दूषित होना, नमी के कारण बैक्टीरिया और वायरस का तेजी से बढ़ाना और खुले में रखा हुआ खाना जल्दी खराब होना है। हेल्थ एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि मानसून में कुछ छोटी-छोटी सावधानियां अपना कर इस इंफेक्शन से बहुत हद तक बचा जा सकता है।

    पीने का पानी का रखें खास ध्यान

    मानसून में पेट के ज्यादातर संक्रमण दूषित पानी के कारण होती है। भारी बारिश के दौरान बैक्टीरिया सीवर का पानी और गंदे पानी के पानी के सोर्स तक पहुंच सकते हैं। ऐसे में साफ दिखने वाला पानी भी पूरी तरह सुरक्षित हो यह जरुरी नहीं है। डॉक्टरों के अनुसार, हमेशा उबला हुआ फिल्टर किया हुआ या फिर पैक्ड पानी ही पिएं। यदि पानी की क्वालिटी को लेकर आपको कोई संदेह हो तो अच्छे वाटर प्यूरीफायर या क्लोरिनेशन टैबलेट का इस्तेमाल करें। एक्सपर्ट्स के अनुसार, बाहर का पानी या बाहर के ड्रिंक न पिए। अपने साथ पीने का पानी हमेशा रखें यह आपके लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा।

    घर का बना खाना ही खाएं

    डॉक्टरों के अनुसार, बारिश के मौसम में लंबे समय तक खुले में रखा हुआ भोजन न खाएं। नमी के कारण बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीव तेजी से बढ़ते हैं। इससे खाना दूषित हो सकता है। एक्सपर्ट्स का यह कहना है कि घर का ताजा बना हुआ खाना सबसे सुरक्षित रहता है। सड़क किनारे मिलने वाले खुले खाद्य पदार्थ, पहले से कटे हुए फल और लंबे समय से बाहर रखे स्नैक्स खाने से बचें। इससे इंफेक्शन का खतरा ज्यादा रहेगा।

    अच्छे से धोए सब्जियां और फल

    अक्सर लोग फल और सब्जियों को सिर्फ पानी से धोकर इस्तेमाल कर लेते हैं लेकिन मानसून में इतनी सावधानी काफी नहीं होती है। इनके ऊपर मिट्टी, कीटनाशक और कई तरह के सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं। डॉक्टर के अनुसार, फल और सब्जियों को अच्छे से साफ करें। जरुरत पड़ने पर कुछ मिनट के लिए सिरके वाली पानी में भिगोकर भी साफ किया जा सकता है। साथ ही कच्चे स्प्राउ्टस और पहले से कटे हुए फलों का सेवन करें क्योंकि इनमें बैक्टीरिया पनपने का खतरा ज्यादा रहता है।

    हाथ धोने की आदत डालें

    डॉक्टर के अनुसार, हाथ धोना से आप इंफेक्शन से बच सकते हैं। इसके अलावा खाना बनाने से पहले टॉयलेट के इस्तेमाल के बाद और बाहर से आने पर साबुन से अच्छी तरह हाथ धोना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को दस्त या उल्टी की समस्या हो जाए तो शरीर में पानी की कमी न होने दे। हल्का भोजन करें और पूरी मात्रा में तरल पदार्थ लें। यदि तेज बुखार, खून वाली उल्टी या दस्त की समस्या हो या कुछ दिनों तक मिलें।
  • Health Tips: रोजाना किशमिश खाने से मिलते हैं कई फायदे, आंतों को रखती है स्वस्थ

    Health Tips: रोजाना किशमिश खाने से मिलते हैं कई फायदे, आंतों को रखती है स्वस्थ

    Health Tips: किशमिश एक ऐसा सूखा मेवा है जिसे बच्चे और बड़े सभी पसंद करते हैं। इसका खट्टा-मीठा स्वाद खाने का मजा बढ़ा देता है। मिठाइयों, खीर, पुलाव और कई अन्य व्यंजनों में किशमिश का इस्तेमाल किया जाता है। यह सूखे अंगूरों से तैयार की जाती है और इसमें प्राकृतिक मिठास भरपूर मात्रा में होती है। स्वादिष्ट होने के साथ-साथ किशमिश पोषक तत्वों का भी अच्छा स्रोत है। हाल ही में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. शुभम वत्स्या ने बताया कि रोजाना किशमिश खाने से आंतों और पाचन तंत्र को कई फायदे मिल सकते हैं।

    आंतों की सेहत के लिए फायदेमंद है किशमिश
    किशमिश में अच्छी मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है। फाइबर भोजन को आंतों से आसानी से गुजरने में मदद करता है और मल त्याग की प्रक्रिया को सरल बनाता है। यही कारण है कि किशमिश को कब्ज की समस्या से राहत दिलाने वाला प्राकृतिक खाद्य पदार्थ माना जाता है।

    कब्ज से राहत दिलाने में करती है मदद
    किशमिश में सॉर्बिटोल नाम का एक प्राकृतिक यौगिक पाया जाता है। यह एक प्रकार का शुगर अल्कोहल है, जो आंतों में पानी बनाए रखने में मदद करता है। इससे मल नरम हो जाता है और उसे बाहर निकालना आसान हो जाता है। जो लोग अक्सर कब्ज की समस्या से परेशान रहते हैं, उनके लिए रोजाना किशमिश खाना काफी फायदेमंद हो सकता है। यह आंतों में नमी बनाए रखती है और मल त्याग को नियमित बनाने में मदद करती है।

    हेल्दी गट बैक्टीरिया को मिलता है पोषण
    हमारी आंतों में कई अच्छे बैक्टीरिया मौजूद होते हैं जो पाचन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किशमिश इन लाभकारी बैक्टीरिया को पोषण देने का काम करती है। इससे गट हेल्थ बेहतर रहती है और पेट से जुड़ी कई समस्याओं का खतरा कम हो सकता है।

    एसिडिटी और पेट भारी होने की समस्या में राहत
    नियमित रूप से किशमिश खाने से एसिडिटी, गैस और पेट में भारीपन जैसी समस्याओं में भी राहत मिल सकती है। जब पाचन तंत्र सही तरीके से काम करता है तो शरीर भोजन को बेहतर ढंग से पचा पाता है और पेट हल्का महसूस होता है।

    बवासीर और फिशर का खतरा हो सकता है कम
    अगर मल त्याग नियमित और आसान हो तो गुदा से जुड़ी समस्याओं जैसे फिशर और बवासीर का खतरा कम हो सकता है। किशमिश में मौजूद फाइबर और सॉर्बिटोल इस दिशा में मददगार साबित हो सकते हैं।

    दिल की सेहत के लिए भी फायदेमंद
    किशमिश सिर्फ पाचन तंत्र के लिए ही नहीं, बल्कि दिल की सेहत के लिए भी लाभकारी मानी जाती है। इसमें पोटेशियम और एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं, जो रक्तचाप को नियंत्रित रखने और शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में मदद करते हैं।

    किशमिश खाने का सही तरीका
    विशेषज्ञों के अनुसार, रोजाना 8 से 10 किशमिश रातभर पानी में भिगोकर सुबह खाली पेट खाना सबसे अच्छा माना जाता है। अगर सुबह समय न मिले तो दिन में किसी भी समय 5 से 6 किशमिश खाई जा सकती हैं। नियमित रूप से इसका सेवन करने से पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

     

  • क्या आप भी रात में देर रात तक जागते हैं तो बढ़ जाएगा Mini Stroke का खतरा?

    क्या आप भी रात में देर रात तक जागते हैं तो बढ़ जाएगा Mini Stroke का खतरा?

    सेहत: भागदौड़ भरी जिंदगी में रात का समय अब पहले जैसा नहीं होता। आधी रात के बाद भी कई लोग स्क्रीन पर लगे रहते हैं। बिस्तर पर लेटे-लेटे लोग ऑफिस के ईमेल चेक करते रहते हैं। सोशल मीडिया स्क्रॉल करते-करते यह भी नहीं पता चलता है कि कब रात बीत गई है। खासकर युवा प्रोफेशनल्स के लिए यह अब सामान्य लाइफस्टाइल बन चुकी है लेकिन न्यूरोलॉजिस्ट्स चेतावनी दे रही है कि यह आदत सिर्फ थकान ही नहीं बल्कि मिनी स्ट्रोक जैसी गंभीर खतरे को भी बढ़ा सकती है।

    आखिर क्या होता है मिनी स्ट्रोक?

    मिनी स्ट्रोक जिसको मेडिकल भाषा में ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक कहते हैं। यह उस समय होता है कि जब कुछ समय के लिए ब्रेन के लिए किसी हिस्से में ब्लड फ्लो रुक जाता है। इसके लक्षण कुछ मिनटों में खत्म हो सकते हैं परंतु इसे हल्के में लेना बहुत बड़ी गलती साबित हो सकती है. अमेरिका के एक इंस्टीट्यूट के अनुसार, जिन लोगों को ट्रांजिएट इस्केमिक होता है। उनमें से लगभग हर तीन में एक व्यक्ति को आगे चलकर स्ट्रोक हो सकता है। इनमें से करीबन आधे मामले एक साल के अंदर सामने आते हैं।

    नींद की कमी बनेगी हार्ट की समस्याओं का कारण

    एक्सपर्ट्स ने TOI ने बताया कि नींद की कमी तेजी से न्यूरोलॉजिकल और हार्ट संबंधी समस्याओं का बड़ा कारण बनती जा रही है। उनका कहना है कि लगातार कम नींद लेने से शरीर में तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन का स्तर ऊंचा रहता है। ब्लड प्रेशर प्रभावित होता है सूजन बढ़ती है और मेटाबॉलिज्म बिगड़ता है। ये सभी कारक मिलकर मिनी स्ट्रोक और बाद में स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।

    मिनी स्ट्रोक और स्ट्रोक का बढ़ेगा खतरा

    एक्सपर्ट्स ने बताया कि नींद की कमी तेजी से न्यूरोलॉजिकल और हार्ट संबंधी समस्याओं का बड़ा कारण बनती जा रही है। उनका कहना है कि लगातार कम नींद लेने से शरीर में तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन का स्तर ऊंचा रहता है। ब्लड प्रेशर प्रभावित होता है सूजन बढ़ाती है भी मेटाबॉल्जिम बिगड़ सकता है। इन सभी कारणों के चलते मिनी स्ट्रोक और बाद में स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। अच्छी नींद सिर्फ शरीर को आराम नहीं देती बल्कि ब्लड वेसल्स की मरम्मत, ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने और सूजन कम करने में भी मदद करती है। जब लगातार नींद पूरी नहीं होती है तो शरीर के ये जरुरी सिस्टम प्रभावित होने लगते हैं। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट की रिसर्च भी बता चुकी है कि लंबे समय तक नींद की कमी हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाती है यह स्ट्रोक का मुख्य कारण होते हैं।

    भविष्य में गंभीर समस्याओं का कारण बनेगा फोन

    हाल के सालों में एक नया शब्द भी चर्चा में आया है और वो है रिवेंज बेडटाइम प्रॉक्रैस्टिनेशन कहते हैं। इसका अर्थ है कि चक्कर में जानबूझकर देर तक जागना जबकि शरीर को आराम की जरुरत होती है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, देर रात तक फोन चलाना, लगातार स्क्रीन देखना और सिर्फ कुछ घंटे की नींद लेना आज कई युवाओं की आदत बन चुकी है जो भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बन सकते हैं।

    जानें इसके लक्षण

    मिनी स्ट्रोक की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके संकेत अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। शरीर के एक हिस्से में अचानक कमजोरी या सुन्नपन, बोलने में दिक्कत, चक्कर आना, धुंधला दिखाई देना, चेहरे का एक ओर झुक जाना या कुछ मिनटों तक भ्रम की स्थिति बने रहना। इसके शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार है कि ऐसे किसी भी संकेत को नजरअंदाज नहीं करनी चाहिए। तुरंत डॉक्टर से संपर्क करने चाहिए।  
  • Health Tips: लीची खाने के फायदे और नुकसान जान हैरान हो जाएंगे आप

    Health Tips: लीची खाने के फायदे और नुकसान जान हैरान हो जाएंगे आप

    Health Tips: गर्मियों के मौसम में कुछ फलों का लोग पूरे साल इंतजार करते हैं। इनमें आम और लीची सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। लीची अपने मीठे स्वाद और रसदार गूदे के कारण बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को खूब पसंद आती है। मई और जून के महीने में लीची का सीजन होता है और इस दौरान बाजार में इसकी भरमार रहती है। हालांकि लीची खाने के कई स्वास्थ्य लाभ हैं, लेकिन इसका ज्यादा सेवन कुछ लोगों के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। इसलिए लीची खाने से पहले इसके फायदे और नुकसान दोनों जान लेना जरूरी है। लीची खाने से पहले रखें यह बात ध्यान लीची की तासीर गर्म मानी जाती है। इसलिए इसे खाने से पहले कुछ समय के लिए पानी में भिगोकर रखना बेहतर माना जाता है। इससे इसकी गर्म तासीर का प्रभाव कुछ हद तक कम हो जाता है। लीची खाने के फायदे
    1. शरीर को हाइड्रेट रखती है
    लीची में पानी की मात्रा काफी अधिक होती है। गर्मियों में इसे खाने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती और शरीर हाइड्रेट बना रहता है। यह गर्मी और लू के असर को कम करने में भी मदद कर सकती है।
    1. कब्ज से राहत दिलाती है
    लीची में फाइबर अच्छी मात्रा में पाया जाता है। फाइबर पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है। जिन लोगों को कब्ज की समस्या रहती है, उनके लिए लीची फायदेमंद हो सकती है। इसके सेवन से पेट साफ रखने में मदद मिलती है।
    1. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है
    लीची में विटामिन सी, पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं। ये शरीर की इम्यूनिटी मजबूत करने में मदद करते हैं, जिससे मौसमी बीमारियों का खतरा कम हो सकता है।
    1. त्वचा को बनाती है चमकदार
    लीची में एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं। ये त्वचा को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। नियमित और संतुलित मात्रा में लीची खाने से त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनी रह सकती है। साथ ही बढ़ती उम्र के असर को भी कम करने में मदद मिल सकती है। लीची खाने के नुकसान
    1. शुगर की मात्रा अधिक होती है
    लीची काफी मीठा फल है और इसमें प्राकृतिक शुगर अधिक मात्रा में होती है। इसलिए डायबिटीज के मरीजों को इसका सेवन बहुत सावधानी से करना चाहिए या डॉक्टर की सलाह के बाद ही खाना चाहिए।
    1. वजन बढ़ सकता है
    यदि लीची का रोजाना जरूरत से ज्यादा सेवन किया जाए तो शरीर में अतिरिक्त कैलोरी जमा हो सकती है, जिससे वजन बढ़ने का खतरा रहता है।
    1. गठिया के मरीजों के लिए नुकसानदायक
    अधिक मात्रा में लीची खाने से कुछ लोगों में गठिया (आर्थराइटिस) का दर्द बढ़ सकता है। इसलिए ऐसे मरीजों को सीमित मात्रा में ही इसका सेवन करना चाहिए।
    1. गले में खराश की समस्या
    ज्यादा लीची खाने से कुछ लोगों को गले में खराश या जलन महसूस हो सकती है। इसलिए एक बार में बहुत अधिक लीची खाने से बचना चाहिए।
    1. अस्थमा मरीजों को बरतनी चाहिए सावधानी
    अस्थमा से पीड़ित लोगों को लीची का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। ज्यादा मात्रा में खाने से कुछ मामलों में सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है।    
  • Health Tips: बारिश के मौसम में बढ़ जाता है आई फ्लू का खतरा, जानिए लक्षण और बचाव के आसान तरीके

    Health Tips: बारिश के मौसम में बढ़ जाता है आई फ्लू का खतरा, जानिए लक्षण और बचाव के आसान तरीके

    Health Tips: बारिश का मौसम जहां लोगों को गर्मी से राहत और सुकून देता है, वहीं इस मौसम में कई तरह की बीमारियों और संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। इन्हीं में से एक है कंजंक्टिवाइटिस (आई फ्लू)। हर साल मानसून के दौरान इसके मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिलती है। अस्पतालों और क्लीनिकों में इस मौसम में आंखों के लाल होने, पानी आने, जलन और खुजली जैसी समस्याओं से परेशान मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ी हुई नमी, वायरस और बैक्टीरिया का तेजी से फैलना तथा गंदगी के संपर्क में आने से यह संक्रमण अधिक फैलता है। क्या होता है कंजंक्टिवाइटिस कंजंक्टिवाइटिस, जिसे आम भाषा में आई फ्लू कहा जाता है, आंख की उस पतली झिल्ली में होने वाली सूजन है जो आंख के सफेद हिस्से और पलकों के अंदरूनी भाग को ढकती है। यह संक्रमण मुख्य रूप से तीन कारणों से हो सकता है
    • वायरल संक्रमण
    • बैक्टीरियल संक्रमण
    • एलर्जी
    इस बीमारी में आंखें लाल हो जाती हैं, पानी आने लगता है और कई बार आंखों में चिपचिपा पदार्थ भी जमा होने लगता है। बच्चों में ज्यादा तेजी से फैलता है संक्रमण बच्चों में आई फ्लू का खतरा अधिक रहता है क्योंकि वे बार-बार अपनी आंखों को छूते या मलते हैं। स्कूलों और भीड़भाड़ वाली जगहों पर यह संक्रमण एक बच्चे से दूसरे बच्चे में आसानी से फैल सकता है। आई फ्लू के प्रमुख लक्षण
    • आंखों का लाल होना
    • आंखों से लगातार पानी आना
    • खुजली और जलन होना
    • आंखों में चुभन महसूस होना
    • पलकों में सूजन आना
    • आंखों से चिपचिपा पदार्थ निकलना
    • तेज रोशनी से परेशानी होना
    • आंखों में भारीपन महसूस होना
    ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। मानसून में क्यों बढ़ता है आई फ्लू बारिश के मौसम में वातावरण में नमी बढ़ जाती है, जिससे वायरस और बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं। इसके अलावा कई अन्य कारण भी संक्रमण को बढ़ावा देते हैं।
    1. बढ़ी हुई नमी
    नमी वाले वातावरण में सूक्ष्म जीव अधिक समय तक जीवित रहते हैं और तेजी से फैलते हैं।
    1. गंदे पानी का संपर्क
    बारिश का पानी, धूल और प्रदूषण आंखों में जाकर संक्रमण और जलन पैदा कर सकते हैं।
    1. भीड़भाड़ वाले स्थान
    स्कूल, ऑफिस, बाजार और सार्वजनिक परिवहन जैसी जगहों पर संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से बीमारी तेजी से फैल सकती है।
    1. संक्रमित वस्तुओं का उपयोग
    तौलिया, रूमाल, तकिया या आंखों से जुड़ी अन्य वस्तुएं साझा करने से भी संक्रमण फैल सकता है। आई फ्लू से बचाव के आसान उपाय विशेषज्ञों के अनुसार कुछ सावधानियां अपनाकर इस संक्रमण से काफी हद तक बचा जा सकता है। हाथों की सफाई रखें दिनभर में हम कई बार अनजाने में अपने चेहरे और आंखों को छूते हैं। ऐसे में हाथों पर मौजूद बैक्टीरिया और वायरस आंखों तक पहुंच सकते हैं। इसलिए साबुन और पानी से नियमित रूप से हाथ धोना बेहद जरूरी है। आंखों को बार-बार न छुएं बिना वजह आंखों को छूने या रगड़ने से बचें। ऐसा करने से संक्रमण एक आंख से दूसरी आंख में फैल सकता है और समस्या बढ़ सकती है। व्यक्तिगत सामान साझा न करें तौलिया, रूमाल, तकिया, आई मेकअप और चश्मा जैसी चीजें किसी दूसरे व्यक्ति के साथ साझा न करें। साफ पानी से आंखों की सफाई करें अगर आंखों में जलन या धूल चली जाए तो साफ और ठंडे पानी से आंखों को धो लें। भीड़भाड़ वाली जगहों पर सावधानी रखें संक्रमित व्यक्ति के बहुत करीब जाने से बचें और आंखों को साफ रखें। कब डॉक्टर से संपर्क करें यदि आंखों की लालिमा लगातार बढ़ रही हो, तेज दर्द हो, धुंधला दिखाई दे रहा हो या आंखों से ज्यादा चिपचिपा पदार्थ निकल रहा हो, तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से जांच करवानी चाहिए।