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  • आखिर क्यों खास होता है भगवान जगन्नाथ रथयात्रा की रस्सी को खींचना? जानें पौराणिक कथा

    आखिर क्यों खास होता है भगवान जगन्नाथ रथयात्रा की रस्सी को खींचना? जानें पौराणिक कथा

    धर्म: भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा आज से शुरु हो गई है। यह यात्रा 24 जुलाई को खत्म होगी। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि कई लोगों की आस्था, समर्पण और भक्ति का एक महासागर होता है। हर साल आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ओडिशा के पुरी में निकलने वाली यह यात्रा पूरे विश्व के श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर देती है। इस यात्रा में शामिल होने के लिए और भगवान के रथ की रस्सियों को खींचने का अपना एक खास महत्व होता है।

    इस वजह से शुभ है रथ की रस्सी खींचना

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने वाली रस्सी को शंखचूड़ का प्रतीक माना जाता है। पुराणों में इस बात का जिक्र मिलता है कि जो भी श्रद्धालु रथ की रस्सी को छूता है या उसको खींचता है। उसके जीवन के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इसे साक्षात मोक्ष का द्वार माना गया है। ऐसा माना जाता है कि रथ को खींचने वाला व्यक्ति सीधे प्रभु के चरणों में स्थान पाता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की ओर बढ़ता है।

    रथ यात्रा से जुड़ी पौराणिक कथा

    रथ यात्रा के पीछ वैसे तो कई सारी कथाएं हैं। ऐसा कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ में अपनी मौसी के घर में जाते हैं। इस यात्रा के दौरान भगवान खुद ही भक्तों के बीच में आते हैं ताकि जो भी लोग मंदिर के गृभगृह तक नहीं पहुंच पाते हैं। वो भी प्रभु के दर्शन का लाभ उठा पाएं। रथ की रस्सी को खींचने एक तरह से खुद को प्रभु को रथ का सारथी बनाने जैसा है। ऐसे ही अर्जुन का सारथी खुद श्रीकृष्ण बने थे। उसी तरह से रथ खींचने वाले श्रद्धालु इस प्रक्रिया के जरिए से प्रभु से सीधा जुड़ाव महसूस करते हैं।

    रस्सी खींचने का यह है महिमा

    मोक्ष की मिलेगी प्राप्ति

    मान्यता है कि जो व्यक्ति रथ की रस्सी को हाथ लगाता है या उसको खींचता है। वह वैकुंठ लोक का अधिकारी बन जाता है।

    प्रेम और समरसता का भाव

    जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा जाति-पाति और ऊंच-नीच के भेदों को भी मिटाती है। यहां राजा हो या रंक सभी एक ही रस्सी को थामकर अपने आराध्य को खींचते हैं। यह प्रेम और समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण है।

    पिछले जन्मों के धुलेंगे पाप

    ऐसा माना जाता है कि रथ खींचना सिर्फ एक शारीरिक क्रिया ही नहीं है बल्कि यह घमंड को खत्म करने का भी प्रतीक है। रस्सी को पकड़ते ही भक्त का सारा अहंकार प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाता है। इससे उसके पिछले जन्मों के पाप धुल जाते हैं।

    भक्तों का लगता है सैलाब

    रथ यात्रा के दौरान जय जगन्नाथ के जयकारों से माहौल भक्तिमय हो जाता है। जब भक्त विशाल रथ को एकासाथ खींचते हैं तो वह दृश्य काफी अच्छा होता है। यह श्रद्धा का ऐसा अद्भूत क्षण होता है जहां पर भक्त और भगवान के बीच में कोई दूरी ही नहीं रहती है। आखिर में यात्रा हमें यह संदेश देती है कि जीवन रुपी रथ की डोर यदि आप भगवान के हाथों में देंगे तो संसार का हर कठिन रास्ता आसान बन जाएगा।  
  • कल मनाई जाएगी ज्येष्ठ पूर्णिमा, आखिर इस दिन क्या करें क्या नहीं जानें यहां

    कल मनाई जाएगी ज्येष्ठ पूर्णिमा, आखिर इस दिन क्या करें क्या नहीं जानें यहां

    धर्म: इस बार 29 जून को ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाई जाएगी। ज्येष्ठ पूर्णिमा सनातन वाले धर्म में एक बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। इस दिन स्नान, दान और व्रत करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यदि आप ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत रख रहे हैं या इस दिन की पूजा-अर्चना करने जा रहे हैं तो आपके लिए यह जानना बेहद जरुरी है कि इस दिन क्या करना शुभ होता है और किन कामों से बचना चाहिए।

    आखिर क्या नहीं करना चाहिए?

    तामसिक भोजन न खाएं

    ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भूलकर भी मांस, मदिर, लहसुन या प्याज जैसी तामसिक चीजों का सेवन न करें। इस दिन पूरी तरह सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए।

    देर तक न सोएं

    पूर्णिमा की सुबह को बेहद ऊर्जावान माना जाता है इसलिए इस दिन सूर्योदय के बाद तक सोने की गलती न करें। सुबह जल्दी उठकर पूजा-पाठ में मन लगाएं।

    उधार न लें

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, पूर्णिमा के दिन न तो किसी को पैसा उधार देना चाहिए और न ही किसी से लेना चाहिए। ऐसा करने से आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है।

    कलह से क्रोध से बचें

    पूर्णिमा के दिन घर का माहौल शांतिपूर्ण रखना चाहिए। इस दिन किसी से वाद-विवाद न करें, न ही क्रोध में आकर किसी को अपशब्ध कहें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं।

    किसी का अपमान न करें

    इस दिन अपने घर के बड़ों, महिलाओं या किसी भी जरुरतमंद/भिक्षुक का अपमान न करें। यदि कोई द्वार पर आए तो उसे खाली हाथ में लौटाएं।

    क्या करें?

    पवित्र नदी में स्नान व दान

    पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि ऐसा संभव न हो तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इसके बाद अपने क्षमता के अनुसार, तिल, कपड़ा, अनाज या पानी से भरा घड़ा दान करें।

    माता लक्ष्मी का अभिषेक

    पूर्णिमा की शाम को धन की देवी मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उनका मखाने की खीर से भोग लगाएं और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।

    चंद्रदेव का अर्घ्य

    चूंकि पूर्णिमा पर चंद्रमा अपने पूर्ण आकार में होता है इसलिए रात को कच्चे दूध में गंगाजल और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य जरुर दें। इससे कुंडली में चंद्र दोष दर होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति होती है।

    पीपल के पेड़ की करें पूजा

    पीपल के वृक्ष में त्रिदेव का वास माना जाता है। इस दिन पीपल के पेड़ में जल अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं।  
  • आखिर कब लगेगा साल का आखिरी सूर्य ग्रहण? भारत में कितना होगा इसका असर

    आखिर कब लगेगा साल का आखिरी सूर्य ग्रहण? भारत में कितना होगा इसका असर

    धर्म: दुनिया भर के वैज्ञानिकों और आसमान में होने वाली घटना को देखने के शौकीन लोगों के लिए अगस्त 2026 का महीना बहुत खास होगा। इस साल 12 अगस्त को एक अद्भूत खगोलीय घटना होने वाली है। इससे हम पूर्ण सूर्य ग्रहण कहते हैं।

    क्या होता है कि सूर्य ग्रहण?

    सूर्य ग्रहण उस समय लगता है जब चांद, सूर्य और पृथ्वी के बीच में आता है जब चांद, सूर्य को पूरी तरह से ढक लेता है। दिन के उजाले में कुछ देर के लिए अंधेरा छा जाता है। इसे पूर्ण सूर्य ग्रहण कहते हैं। उस समय सूर्य के चारों और एक चमकती हुई रिंग दिखाई देती है। यह देखने में किसी जादुई नजारे जैसी लगती है।

    क्या भारत में नजर आएगा?

    सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत में रहने वाले इसे देख पाएंगे। इसका मतलब है कि जबाब नहीं है। यह सूर्य ग्रहण भारत में कही भी नजर नहीं आएगा। यह मुख्य रुप से यूरोप, ग्रीनलैंड, आईसलैंड और आर्कटिक के कुछ हिस्सों में दिखाई देगा।

    भारत में इसका असर

    यह भारत में दिखाई नहीं देगा इसलिए भारत में इसका कोई असर नहीं होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो ग्रहण हमारे देश में नहीं दिखता है। उसका सूतक काल भी मान्य नहीं होता है इसलिए भारत के लोग अपनी रोजर्मरा की जिंदगी और पूजा-पाठ बिना किसी चिंता के सामान्य रुप से कर सकते हैं। यह ग्रहण भारत में दिखाई ही नहीं देगा इसलिए भारत में इसका कोई असर नहीं होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो ग्रहण हमारे देश में नहीं दिखता है। उसका सूतक काल भी मान्य नहीं होता इसलिए भारत के लोग अपनी रोजर्मरा की जिंदगी और पूजा-पाठ बिना किसी चिंता के सामान्य रुप से कर सकते हैं।

    ग्रहण कैसे देखें?

    यदि आप ऐसी जगह पर हैं जहां ग्रहण दिखने वाला है। एक बात को हमेशा ध्यान रखें। ग्रहण को कभी भी अपनी आंखों से सीधा न देखें। सूर्य की रोशनी इतनी तेज होती है कि वह आपकी आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा सकती है। इसे देखने के लिए हमेशा बाजार में मिलने वाले खास सोलर फिल्टर वाले चश्मों का ही इस्तेमाल करना चाहिए। साधारण चश्मे या आंखों के सामने हाथ रखकर इसे देखना बहुत खतरनाक हो सकता है।  
  • क्या Periods में मंदिर जाना सही है या नहीं, Jaya Kishori ने खुद दिया जवाब

    क्या Periods में मंदिर जाना सही है या नहीं, Jaya Kishori ने खुद दिया जवाब

    धर्म: हम अपने बुजुर्गों से हमेशा सुनते हैं कि पीरियड्स या महावारी के दौरान लड़कियों को मंदिर नहीं जाना चाहिए और ना ही पूजा-पाठ करना चाहिए। दरअसल पीरियड्स के समय महिलाओं का शरीर बहुत ही कमजोर हो जाता है। उन्हें इस समय आराम करने की सलाह दी जाती है हालांकि इस विषय को लेकर जया किशोरी की राय कुछ अलग है। एक इंटरव्यू के दौरान किसी ने जया किशोरी से सवाल किया कि पीरियड्स में आज भी कई घरों में यह कहा जाता है कि अचार मत छुओ, मंदिर मत जाओ, पूजा मत करो और ये हर धर्म में होता है। इस दौरान आप क्या करती है। इस सवाल का जया किशोरी जवाब देते हुए कहती है कि कुछ चीजें जब बनाई गई थी तो उसके पीछे कुछ कारण होते थे। गौर करें तो सांइस के नजरिए से पीरियड्स में लड़कियों या महिलाओं को ज्यादा खटाई नहीं खानी चाहिए। पीरियड्स में ज्यादा मीठा भी नहीं खाना चाहिए वो भी सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है। दूसरा कारण है कि इस दौरान घर से बाहर निकलने को मना कर दिया जाता था। दरअसल पहले व्यवस्थाएं ऐसी नहीं थी क्योंकि कई घरों में कपड़े का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन आजकल तो मार्केट में पीरियड्स से संबंधित से हर चीज उपलब्ध है लेकिन समय के साथ इन बातों का गलत मतलब निकाला जाने लगा। कुछ लोगों ने इसे अछूतपन से जोड़ दिया है जो बिल्कुल गलत है जिसने शुरुआत की उसका उद्देश्य बहुत अच्छा था जैसे आराम और सेहत का ख्याल लेकिन बीच में जाकर लोगों ने इसे गलत दिशा दे दी है। सोचिए जब एक महिला 9 महीने तक गर्भ में बच्चे को पालती है। तब उसे पीरियड्स नहीं होते। वहीं खून बच्चे को पोषणा देता है। अगर वही खून अपवित्र होता तो हम सब भी अपवित्र होते हैं क्योंकि हम उसी से बने हैं इसलिए उसको अपवित्र कहना पूरी तरह गलत है। आगे जया किशोरी जी इस बात का उदाहरण देते हुए कहती है कि महाभारत के एक प्रसंग मे भी इस बात का जिक्र मिलता है। माता द्रौपदी रजस्वला अवस्था में थी। फिर भी भगवान कृष्ण ने उनकी मदद थी। रजस्वला अवस्था में थी फिर भी भगवान कृष्ण ने उनकी मदद की थी। भगवान ने यह नहीं सोचा था कि वो उस अवस्था में है या नहीं तो फिर हम कौन होते हैं ऐसे नियम बनाने वाले हैं इसलिए ये सारे बातें पुराने समय के हिसाब से थी लेकिन अब समय बदल चुका है।

    महावारी को लेकर प्रेमानंद महाराज ने कही ये बात

    प्रेमानंद महाराज के अनुसार, शास्त्रों ने इस बात का जिक्र किया गया है। मासिक धर्म के दौरान लड़कियों को पूजा पाठ नहीं करना चाहिए। उनके लिए निषेध होता है। इसके अलावा महिलाओं को सप्ताहिक अनुष्ठान नहीं करना चाहिए हां लेकिन लकड़ियां इस दौरान भगवत चिंतन का गुणगान या नाम जाप कर सकती है।  
  • आखिर किस दिन मनाई जाएगी Nirjala Ekadashi, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    आखिर किस दिन मनाई जाएगी Nirjala Ekadashi, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    धर्म: हिंदू धर्म में सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी का सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली यह एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इसे साल की सबसे बड़ी एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन जो श्रद्धालु अन्न, जल ग्रहण किए बिना व्रत रखते हैं। श्री हरि उनके सारे दुख हर लेते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि निर्जला एकादशी का व्रत रखने से साल की सभी 24 एकादशियों के समान पुण्य मिलता है। हिंदू पंचागों के अनुसार, ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जून को रात 08:09 मिनट पर होगा। एकादशी तिथि का समापन 25 जून को रात 9:14 मिनट पर होगा। उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून दिन गुरुवार को रखा जाएगा। निर्जला एकादशी का साल की सबसे कठिन और श्रेष्ठ एकादशी माना गया है। इस दिन व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर भगवान विष्णु की अराधना करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत से दुख-दरिद्रता और नेगेटिव ऊर्जा का नाश होता है। इसके अलावा सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    पूजा की विधि

    निर्जला एकादशी के दिन सुबह उठकर व्रत-पूजा का संकल्प लें। इसके बाद साफ-सुथरे कपड़े धारण करके एक चौकी पर पीले रंग का कपड़े बिछाकर उस पर विष्णु और लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करें और दोनों की संयुक्त पूजा करें। भगवान दो धूप, दीप, फल और पीले रंग की मिठाई या पकवान का भोग लगाएं। भगवान को खीर में तुलसी दल डालकर भी भोग लगाया जा सकता है। इसके बाद वहीं बैठकर विष्णु जी के मंत्रों को जाप करें। मां लक्ष्मी और विष्णु जी की आरती उतारें। इसके बाद मनोकामना कहें।

    पारण का समय

    एकादशी का व्रत पारण द्वादशी तिथि में करना जरुरी माना गया है। साल 2026 में निर्जला एकादशी व्रत का पारण 26 जून दिन शुक्रवार को किया जाएगा। पारण का शुभ समय सुबह 5:41 बजे से लेकर सुबह 8:25 बजे तक रहेगा।
  • इस दिन मनाई जाएगी देवशयनी एकादशी, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त

    इस दिन मनाई जाएगी देवशयनी एकादशी, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त

    नई दिल्ली: साल में 12 एकादशी होती है परंतु उनमें से कुछ बड़ी एकादशी मानी जाती है। इस साल देवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी। ये एकादशी इसलिए भी खास है क्योंकि इस दिन से चातुर्मास लग जाते हैं। विष्णु 4 माह के लिए क्षीरसागर में निद्रा अवस्था में चले जाते हैं। चातुर्मास में सभी मांगलिक बहुत काम बंद रहते हैं। ऐसे में यदि आप भी गृह प्रवेश, विवाह, नया घर-वाहन, मुंडन, जनेऊ संस्कार करना चाहते हैं तो देवशयनी एकादशी से पहले ही निपटा लें। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 24 जुलाई 2026 को सुबह 9.12 पर शुरु होगी। अगले दिन 25 जुलाई 2026 को सुबह 11.34 पर समाप्त होगी। उदयातिथि में एकादशी 25 जुलाई को मनाई जाएगी। देवशयनी एकादशी का व्रत पारण 26 जुलाई को सुबह 5:39 से सुबह 8.22 के बीच किया जाएगा। पारण तिथि के दिन द्वादशी खत्म होने का समय दोपहर के 1.57 है। देवशयनी एकादशी को पद्मा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी और हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं। देवशयनी एकादशी के चार महीने के बाद भगवान विष्णु प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागते हैं।

    एकादशी व्रत के फायदे

    . पापों का नाश होता है। . मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है। . भगवान विष्णु की विशेष कृपा मिलती है। . सुख-समृद्धि और शांति मिलती है। . परिवार में मंगलमय वातावरण बनता है। . देवशयनी एकादशी से शुरु होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार्तुमास चलता है।

    ऐसे करें व्रत

    . दशमी तिथि की शाम से ही सात्विक भोजन करें। . प्याज, लहसुन, मांसाहार और तामसिक चीजों से बचें।

    सुबह की पूजा

    . स्नान करके साफ कपड़े पहनें। . व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति, चित्र स्थापित करें। . पूजा स्थान पर भगवान मूर्ति/चित्र स्थापित करें।      
  • इस दिन मनाई जाएगी Buddha Purnima, जानें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त

    इस दिन मनाई जाएगी Buddha Purnima, जानें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त

    धर्म: बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध का जन्मोत्सव, बुद्ध पूर्णिमा के रुप में बड़े श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। यह दिन न सिर्फ उनके जन्म का प्रतीक है बल्कि ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वारण से भी जुड़ा माना जाता है इसलिए बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए यह तिथि बहुत ही पवित्र मानी जाती है। इस दिन लोग भगवान बुद्ध के बताए मार्ग पर चलकर मोक्ष और शांति की कामना करते हैं। हिंदू धर्म में इस दिन वैशाख पूर्णिमा के रुप में मनाया जाता है इसलिए इस दिन स्नान-दान करना बहुत शुभ माना जाता है क्योंकि यह पूर्णिमा हिंदू धर्म में भी बहुत ही खास मानी जाती है। इस शुभ दिन गौतम बुद्ध के साथ श्रीहरि और मां लक्ष्मी की पूजा-उपासना करना भी शुभ माना जाता है। द्रिक पंचागों के अनुसार, बुद्ध पूर्णिमा की तिथि 30 अप्रैल को रात 9 बजकर 12 मिनट पर शुरु होगी और तिथि का समापन 1 मई को रात 10 बजकर 52 मिनट पर होगा। इस दिन चंद्रोदय का समय शाम 6 बजकर 52 मिनट पर होगा।

    बुद्ध पूर्णिमा तिथि

    द्रिक पंचागों के अनुसार, बुद्ध पूर्णिमा की तिथि 30 अप्रैल को रात 9:12 मिनट पर शुरु होगा और तिथि का समापन 1 मई को रात 10 बजकर 52 मिनट पर होगा। इस दिन चंद्रोदय का समय शाम 6:52 मिनट पर होगा।

    बुद्ध पूर्णिमा स्नान-दान का मुहूर्त

    बुद्ध पूर्णिमा के दिन स्नान-दान का मुहूर्त सुबह 4 बजकर 15 मिनट से शुरु होकर 4 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। इस दौरान किया गया स्नान दान शास्त्रों में बहुत ही शक्तिशाली बताया गया है। इसके बाद किया गया स्नान राक्षस स्नान कहलाता है। ऐसे में कोशिश करें कि इस दिन ब्रह्मा मुहूर्त में ही स्नान करें। बुद्ध पूर्णिमा के दिन स्नान और दान का खास महत्व होता है। भगवान बुद्ध को खीर का भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद प्रसाद को लोगों में बांटना शुभ माना जाता है। ध्यान, शांति और सेवा भाव और विशेष जोर दिया जाता है।

    बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

    मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान बुद्ध को बोधि प्राप्त हुआ था ऐसे में उनका आध्यात्मिक पुनर्जन्म भी कहते हैं। इस दिन स्नान, दान और ध्यान करने से जीवन में पॉजिटिव आती है और पापों से मुक्ति मिलती है।

    बुद्ध पूर्णिमा की कथा

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान बुद्ध का जन्म सिद्धार्थ के रुप में एक राजघराने में हुआ था। राजसी जीवन त्यागकर उन्होंने सत्य की खोज के लिए कठिन तपस्या की। सालों की साधना के बाद वैशाख पूर्णिमा वाले दिन उन्हें ज्ञान मिला और वो बुद्ध कहलाए।  
  • Bhagwad Gita से Motivational Speaker बने Dhanush, फैंस से शेयर किया Secret

    Bhagwad Gita से Motivational Speaker बने Dhanush, फैंस से शेयर किया Secret

    मनोरंजन: धनुष एक ऐसे एक्टर नहीं है जो कि मोटिवेशनल स्पीच देते हैं परंतु अपनी आने वाली फिल्म कारा के प्री-रिलीज इवेंट में उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि जिसकी एहमियत इसलिए ज्यादा था क्योंकि उनकी अपनी जिंदगी उस बात को साबित करती है। इवेंट में धनुष ने अपनी बात एक तमिल के क्रेज से शुरु हुई है। उन्होने कहा कि – एनम पोल वजकई और बताया कि ये भगवद गीता से लिया गया है। इसका अर्थ है कि जैसा आप सोचते हैं कि वैसे ही बन जाते हैं। इसके जरिए उन्होंने अपनी एक निजी कहानी शेयर की है।

    धनुष को भगवद गीता से मिली है बड़ी सीख

    धनुष ने बताया कि साल 2002 में जब उन्होंने अपने पिता कस्तूरी राजा की निर्देशित फिल्म थुलुवाधो इलामाई से फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था। तभी उन्होंने तय कर लिया था कि वो एक दिन नेशनल अवॉर्ड जीतेंगे। उन्होने कहा कि – उस समय लोग मुझ पर हंस सकते थे। क्योंकि वो नए थे और ऐसा लग रहा था कि इतनी बड़ी उपलब्धि तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है परंतु उन्होंने इस विश्वास को अपने अदर रखा और लगातार मेहनत करते रहे। वो बोले – मैंने पूरी मजबूती से सोचा कि मै नेशनल अवॉर्ड जीत चुका हूं और समय आने पर ये सच हो गया।

    कई फिल्मों के लिए मिले नेशनल अवॉर्ड

    धनुष को फिल्म आडुकल में मुर्गा लड़ाने वाले खिलाड़ी की भूमिका के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड बेस्ट एक्टर मिला जो उनकी डेब्यू के लगभग 9 साल बाद था। इस फिल्म ने 58वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में 6 पुरस्कार जीते। इसमें बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट स्क्रीनपले और बेस्ट एक्टर शामिल थे। इसके बाद भी उन्होंने रुकना नहीं सीखा। उन्हें 2019 में फिल्म असुरन के लिए दूसरा नेशनल अवॉर्ड मिला। कुल मिलाकर उन्हें एक्टिंग और प्रोडक्शन में चार नेशनल अवॉर्ड मिल गए हैं।

    कई बार उड़ा मजाक

    धनुष पहले भी इस बारे में बात कर चुके हैं कि उन्होंने युवाओं से कहा था कि मैनिफेस्टेशन का मतलब है कि खुद पर विश्वास करना है कि आप वहां पहुंच चुके हैं। जहां आप जाना चाहते हैं और फिर उस लक्ष्य के लिए मेहनत करना लेकिन इन सबसे पहले आई फिल्म पोलधवन। इस फिल्म के बारे में बात करते हुए धनुष के शब्दों में एक अलग ही भावनात्मक जुड़ाव दिखा है। उन्होंने कहा कि – ये मेरे करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक थी। इसके कारण बॉक्स ऑफिस या रिव्यू नहीं थे बल्कि कुछ और ही थी। उन्होने बताया कि पोलधवन से पहले कई सालों तक उन्हें दुबले-पतले शरीर के कारण लोगों ने बॉडी शेम किया है लेकिन इस फिल्म में एक शर्टलेस सीन के बाद पहली बार धर्शकों की प्रतिक्रिया बदल गई। लोगों ने तालियां बजाई, सीटी बजाई, डॉयलॉग या एक्शन के लिए नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व के लिए। उन्होंने कहा कि – ये मेरे लिए बहुत खास फिल्म थी। धनुष की आने वाली फिल्म कारा 1991 में फ्यूल संकट की पृष्ठभूमि पर आधारित है और एक दमदार, किरदार आधारित कहानी पेश करेगी। इस फिल्म में ममिता बैजू, जयराम, सूरज वेंजरमुडू, केएस रविकुमार और करुरणास भी नजर आएंगे। ये फिल्म 30 अप्रैल को दुनियाभर में रिलीज होगी।
  • आखिर क्या होती है मृत्यु? Premanand Maharaj ने अपने भक्तों को दिया जवाब

    आखिर क्या होती है मृत्यु? Premanand Maharaj ने अपने भक्तों को दिया जवाब

    धर्म: मृत्यु एक ऐसा शब्द है जिसको सुनते ही मन में डर, बैचेनी और कई अनजान सवाल उठने लगते हैं। क्या कभी आपने यह सोचा है कि यदि एक दिन सब खत्म हो जाएगा तो फिर क्या होगा? क्या सच में सब यहीं खत्म हो जाता है या फिर इसके बाद भी कुछ है? सच यह है कि मृत्यु का डर सिर्फ एक भावना नहीं है बल्कि इंसान के अंदर बैठा सबसे गहरा डर होता है। हम अपने परिवार, अपने सपनों और इस दुनिया से इतने जुड़े होते हैं कि उन्हें खोने का ख्याल ही हमें अंदर से हिला देता है लेकिन क्या हो यदि यह डर उतना सच्चा ही न हो जितना हमें लगता है? क्या हो यदि मृत्यु असल में अंत नहीं बल्कि सिर्फ एक बदलाव ही हो?

    प्रेमानंद महाराज ने दिया जवाब

    इन्हीं गहरे सवालों का बेहद आसान लेकिन सोच बदल देने वाला जवाब वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने दिया है। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, मृत्यु कोई वास्तिवक अंत नहीं है बल्कि यह एक तरह का भ्रम है। हमारा शरीर पंच तत्वों अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश से बना है। मृत्यु के बाद ये तत्व फिर से प्रकृति मिल जाते हैं। उनका कहना है कि आत्मा कभी खत्म नहीं होती। वह अविनाशी है यानी जो असली में है। वह न जन्म लेता है और न मरता है। महाराज बताते हैं कि डर इसलिए लगता है कि क्योंकि हम खुद को शरीर मान लेते हैं। जब हमें लगता है कि मैं ही यह शरीर हूं तब शरीर के खत्म होने का डर भी पैदा हो जाता है। असल में यह एक डर है एक मानसिक भ्रम है। जैसे ही इंसान इस सच्चाई को समझ लेता है कि आत्मा अलग है और शरीर अलग, तब मृत्यु का डर कम होने लगता है।

    जन्म और मृत्यु का क्या अर्थ है?

    उनके अनुसार, शरीर को छोड़ देना ही मृत्यु है और नए शरीर को पाना जन्म होता परंतु यह पूरी प्रक्रिया भी एक तरह से भ्रम ही है। यदि इंसान इस भ्रम को समझ लें तो जीवन और मृत्यु दोनों को लेकर उसका नजरिया बदल सकता है। प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि इस डर से बाहर निकालने का रास्ता है भगवान का स्मरण और भक्ति। जब इंसान अपने असली स्वरुप को समझने लगता है तो उसे मृत्यु का भय नहीं रहता।
  • शुरु हुई केदारनाथ की यात्रा, पहले दिन 38 हजार श्रद्धाल पहुंचे बाबा केदार के पास, देखें वीडियो

    शुरु हुई केदारनाथ की यात्रा, पहले दिन 38 हजार श्रद्धाल पहुंचे बाबा केदार के पास, देखें वीडियो

    धर्म: उत्तराखंड के पवित्र धाम केदारनाथ मंदिर में कपाट खुलते ही आस्था का अद्भूत दृश्य देखने को मिल रहा है। बीते दिन विधि-विधान के साथ बाबा केदार के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खुल गए हैं। देश-विदेश से आए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ गई है। पहले ही दिन लगभग 38 हजार श्रद्धालु धाम पहुंच गए है। इससे पूरा क्षेत्र भक्ति और उत्साह से सराबोर नजर आया। सुबह करीबन 7:50 बजे कपाट खुलने के साथ ही ऊं नम: शिवाय और जय बाबा केदार के जयघोषों से वातावरण पॉजिटिव हो गया। इस मौके पर सेना की सिख लाइट इनफ्रैंट्री रेजिमेंट के बैंड की मधुर धुनों ने माहौल को भी भक्तिमय बना दिया। परंपरा के अनुसार, पहली पूजा नरेंद्र मोदी के नाम से संपन्न हुई है। कपाटोद्वाटन के इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनने के लिए करीबन 10 हजार श्रद्धालु मौजूद रहे।
     
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    मुख्यमंत्री भी रहे मौजूद

    इस मौके पर उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी भी धाम में उपस्थित रहे। उन्होंने देश विदेश से आए श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं देते हुए प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। कपाट खुलने के दौरान हेलिकॉप्टर से फूलों की बारिश की गई। इससे पूरा आयोजन और भी दिव्य बन गया।

    भारी भीड़ ने बढ़ाई चिंता

    हालांकि भारी भीड़ के कारण श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। कई भक्तों ने यह भी बताया कि उन्हें बाबा के दर्शन के लिए 10-12 घंटे तक कतार में खड़ा रहना पड़ा। मंदिर तक पहुंचने वाले करीबन 700 मीटर लंबे कॉरिडोर की लंबी लाइनें लगी हैं इससे व्यवस्था पर दबाव साफ दिखाई देगा।

    व्यवस्था में दिखी कमी

    यात्रा व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए पुलिस, एनडीआरएफ, आईटीबी और बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के कर्मचारी तैनात किए गए थे लेकिन पहले दिन थोड़ी मुश्किल भी आई। मंदिर के मुख्य द्वार पर कुछ श्रद्धालु रेलिंग पार कर अंदर जाने की कोशिश करते दिखे। इससे सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे। पुलिस अधीक्षक निहारिका तोमर ने स्थिति को स्वीकार करते हुए कहा कि व्यवस्थाओं को जल्द ही दुरुस्त किया जाएगा ताकि श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की परेशानी न हो। धाम में सिर्फ मंदिर नहीं बल्कि आस्था का प्रतीक बनी भीम शिला पर भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। साल 2013 की आपदा के बाद से यह शिला श्रद्धालुओं के लिए खास महत्व रखती है। तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद भीम शिला के दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। प्राकृतिक सौंदर्य भी श्रद्धालुओं को खास तौर पर आकर्षित कर रहा है। चारों और बर्फ से ढके पहाड़, साफ नीला आस-मान और ठंडी हवाएं धाम की भव्यता की ओर बढ़ा रहे हैं। भैरवनाथ मार्ग और आस-पास के क्षेत्रों में श्रद्धालु बर्फ के बीच खेलते और तस्वीरें नजर आए। गुजरात से आए एक श्रद्धालु रमाबाई ने बताया कि इस बार कपाट खुलने के समय मौसम बहुत अनुकूल है। इससे यात्रा का अनुभव और भी सुखद हो गया है।