Category: Spiritual

  • कभी न छपवाएं शादी का ऐसा कार्ड, हो सकता है अशुभ

    कभी न छपवाएं शादी का ऐसा कार्ड, हो सकता है अशुभ

    धर्मः किसी व्यक्ति के जीवन में शादी बहुत ही मायने रखती है। यह जिंदगी की सबसे अच्छी यादों में से एक होती है। इसी के चलते लोग इसे बहुत ही स्पेशल बनाना पसंद करते हैं। लोग अपनी शादी के लिए एक-एक चीज को बहुत ही ध्यान से देखकर खरीदते हैं ताकि उनके शादी फंक्शन में कोई विगन न पड़े। शादी फंक्शन का पहला पड़ाव शादी के कार्ड छपवाने से शुरू होता है। इसी के बाद ही शादी की अन्य रस्में तय की जाती है। लोग अपने शादी के कार्ड को स्पेशल से भी स्पेशल बनाना चाहते हैं लेकिन कई बार इसको लेकर लोग कुछ गलतियां कर देते हैं जो आगे चलकर अशुभ हो सकती हैं। इसलिए शादी का कार्ड छपवाने से पहले कुछ नियमों का पालन जरूर करें। कई बार तो इतने अधिक शादी के कार्ड छपवा लिए जाते हैं कि उनमें से काफी बच भी जाता है। ऐसे में लोगों को समझ नहीं आता है कि इन बचे हुए कार्ड का क्या करें। कुछ लोग इसे फाड़कर फेंक देते हैं तो कुछ दीवान, बक्से में रख देते हैं। आखिर बची हुई शादी के कार्ड का क्या करना चाहिए? क्या इसे फेंकना शुभ होता है? शादी के कार्ड पर क्या लिखवाना चाहिए, किसकी तस्वीर होनी चाहिए? इन बातों को भी जानना बहुत जरूरी है। आपको बता दें, शादी का कार्ड छपवाने समय भी वास्तु के नियमों का पालन करना चाहिए। कार्ड में स्वास्तिक, नारियल, कलश, भगवान गणेश की चित्र जरूर हो। आप राधा जी और कृष्ण भगवान की भी फोटो छपवा सकते हैं। शादी के कार्ड का आकार चौकोर ही रखें। अन्य शेप के कार्ड बनवाना अशुभ माना गया है। कुछ लोग आयताकार, गोलाकार, अंडाकार कार्ड भी बनवाते हैं, ऐसा करना शुभ नहीं होता।

    इस विशेष दिन का हो जिक्र

    शादी के कार्ड पर आप हल्दी सेरेमनी, मेहंदी, फेरे, रिसेप्शन की तारीख और समय जरूर लिखवाएं. दूल्हा-दुल्हन के नाम के साथ ही उनके पैरेंट्स का नाम जरूर लिखा हो कार्ड पर।

    कार्ड पर लिखवाएं ये मंत्र

    कार्ड पर हमेशा गणेश भगवान से संबंधित मंत्र लिखवाएं. ऐसा करना बेहद जरूरी और शुभ होता है. मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुड़ ध्वजा, मंगलम पुंडरीकाक्ष, मंगलाय तनो हरि” एक मंत्र है. विवाह जैसे मांगलिक कार्य में इस मंत्र को कार्ड पर लिखवाने या उच्चारण करने से कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती है।

    बचे हुए कार्ड का क्या करें?

    कई बार ऐसा होता है कि शादी का कार्ड बहुत अधिक छप जाता है। मेहमानों, रिश्तेदारों को भेजने के बाद भी यदि आपके घर में कार्ड बच गए हैं तो इसे कूड़े में फाड़कर फेंकने की भूल न करें। कुछ लोग इसे संभालकर दीवान, बैग आदि में रख देते हैं। आप कुछ शादी के कार्ड को संभाल कर रख सकते हैं। कई बार किसी महत्वपूर्ण कानूनी काम में सबतू के तौर पर दिखाने के काम आ सकता है। आप शादी के कार्ड को फेंके नहीं, बल्कि इसे किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें। कचरे के डिब्बे में डालना अशुभ है, क्योंकि कार्ड पर आपने राधा-कृष्ण, गणेश भगवान की तस्वीर बनवाई है। इससे इनका अपमान होगा।
  • 144 साल बाद शुभ संयोग, माघ पूर्णिमा पर करें इन चीजों का दान

    144 साल बाद शुभ संयोग, माघ पूर्णिमा पर करें इन चीजों का दान

    धर्मः हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ का महीना दान-पुण्य के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस माह की पूर्णिमा अत्यंत शुभ तिथि मानी गई है। इसे माघी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। माघ मास की पूर्णिमा पर भाग्य और आर्थिक पक्ष को मजबूत करने का शुभ अवसर है। इस बार शुभ संयोग में माघ पूर्णिमा आ रही है।
    शास्त्रों के अनुसार इस साल माघ महीने की पूर्णिमा तिथि 12 फरवरी को है। माघ पूर्णिमा के दिन 144 साल बाद शुभ संयोग बन रहा है, क्योंकि इस दिन महाकुंभ का चौथा शाही स्नान है। इस दिन स्नान और दान का बहुत खास महत्व है। साथ ही इस दिन सत्य नारायण की कथा सुनने का भी विधान है। अगर कोई व्यक्ति पूरे माघ महीने गंगा स्नान नहीं कर सका हो, तो माघ महीने की पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान अवश्य करनी चाहिए। इससे जीवन में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है।

    इन चीजों का दान करें
    फलः लम्बे समय से अगर कोई व्यक्ति रोग से पीड़ित है, तो कार्तिक पूर्णिमा पर फल का दान करना चाहिए। इस दान से स्वास्थ्य में लाभ होता है और यह दान करने से देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    गुड़ः तरक्की में अगर लम्बे समय से बाधा देखने को मिल रही है या फिर मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिल रही, धन अटका हुआ है, तो कार्तिक पूर्णिमा पर जरुरतमंदों को गुड़ का दान करें। इससे सारी अड़चने खत्म होती है।

    अन्नः मान्यता है कि अन्य का दान शास्त्रों मे सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन अन्न का दान जरूर करना चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा के शुभ दिन पर अन्न का दान करने से व्यक्ति के घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती हैं।

    श्रृंगार की वस्तुः बहुत सारी सुहागन महिलाएं अपनी पति और संतान की लंबी आयु के लिए कई व्रत रखती हैं। इसी प्रकार कार्तिक पूर्णिमा पर सुहागिनों महिलाओ को श्रृंगार की वस्तु का दान करना चाहिए। इसमें हरी चूड़ी, साड़ी, सिंदूर, बिंदी आदि दान में करना काफ़ी शुभ माना गया है।

  • उल्ट दिशा में क्यों बहती है नर्मदा नदी? इसके पीछे है एकतरफा प्यार की दिलचस्प कहानी

    उल्ट दिशा में क्यों बहती है नर्मदा नदी? इसके पीछे है एकतरफा प्यार की दिलचस्प कहानी

    धर्मः भारत की प्रमुख नदियों में से एक नर्मदा नदी का विशेष धार्मिक महत्व है। नर्मदा नदी को गंगा के समान पवित्र माना जाता है। नर्मदा नदी पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली नदी है, अर्थात यह विपरीत दिशा में बहती है। इसके विपरीत दिशा में बहने के पीछे एक दिलचस्प कहानी है जिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। भारत में लोगों की नदियों से धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। हमारे देश में लगभग 400 नदियां बहती हैं और इनमें से कुछ नदियों को देवी-देवताओं के समान पवित्र माना जाता है। इन पवित्र नदियों की भी उचित अनुष्ठानों के साथ पूजा की जाती है। गंगा, यमुना और सरस्वती की तरह नर्मदा नदी भी लोगों की आस्था का केंद्र मानी जाती है। अधिकांश नदियां पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं, लेकिन नर्मदा एक ऐसी नदी है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और अरब सागर में गिरती है। नर्मदा नदी को ‘आकाश की पुत्री’ भी कहा जाता है। हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा जयंती मनाई जाती है, जो 4 फरवरी को मनाई जाती है।

    इन पुराणों में नर्मदा का वर्णन

    नर्मदा का उल्लेख रामायण और महाभारत जैसे पुराणों में मिलता है। नर्मदा नदी के उतार-चढ़ाव और महत्व की कहानी वायु पुराण और स्कंद पुराण के रेव भागवत में वर्णित है। इसी कारण नर्मदा को रेवा भी कहा जाता है। अमरकंटक नर्मदा का उद्गम स्थल है, जिसे हिंदू धर्म में एक पवित्र नदी माना जाता है। इसके अलावा नर्मदा नदी के दोनों तटों पर कई मंदिर स्थित हैं। इसी समय अगस्त्य, भारद्वाज, भृगु, कौशिक, मार्कण्डेय और कपिल आदि अनेक महान ऋषियों और मुनियों ने नर्मदा के तट पर तपस्या की थी। नर्मदा नदी के विपरीत दिशा में बहने के पीछे की पौराणिक कहानी काफी दिलचस्प है।

    नर्मदा नदी का जन्म

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नर्मदा नदी की उत्पत्ति भगवान शिव से हुई मानी जाती है। इसी कारण इन्हें भगवान शिव की पुत्री या शंकरी भी कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि नर्मदा के तट पर पाया जाने वाला प्रत्येक पत्थर शिवलिंग के आकार का है। इन लिंग आकार के पत्थरों को बाणलिंग या बाण शिवलिंग कहा जाता है, जिन्हें हिंदू धर्म में बहुत पूजनीय माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान भोलेनाथ माइकल पर्वत पर तपस्या में लीन थे। इस दौरान देवताओं ने उनकी पूजा की और उन्हें प्रसन्न किया। भगवान शिव की तपस्या के दौरान उनके शरीर से पसीने की कुछ बूंदें गिरीं, जिससे एक झील बन गई। उसी झील से एक और सुन्दर लड़की प्रकट हुई। इस कन्या की सुन्दरता को देखकर देवताओं ने उसका नाम ‘नर्मदा’ रखा।

    नर्मदा नदी की विपरीत दिशा में बहने की कहानी

    नर्मदा नदी उल्टी दिशा में क्यों बहती है, इसके संबंध में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार नर्मदा राजा मेकल की पुत्री थीं। जब नर्मदा विवाह योग्य हुई तो राजा मेकल ने घोषणा की कि जो भी गुलाब का फूल लाएगा, वह उसकी बेटी नर्मदा का विवाह उसके करवा देगा। राजकुमार सोनभद्र ने यह चुनौती पूरी की और इसके बाद नर्मदा और सोनभद्र का विवाह तय हो गया। एक दिन नर्मदा ने राजकुमार से मिलने की इच्छा व्यक्त की और इसलिए उसने अपनी सहेली जोहिला को संदेश लेकर सोनभद्र के पास भेजा। जब सोनभद्र ने जोहिला को देखा तो उसने उसे नर्मदा समझ लिया और उससे विवाह का प्रस्ताव रखा। जोहिला इस प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं कर सकी और सोनभद्र से प्रेम करने लगी। जब नर्मदा को इस बात का पता चला तो वह बहुत क्रोधित हुई और उसने जीवन भर कुंवारी रहने की कसम खा ली। तभी से नर्मदा नाराज होकर विपरीत दिशा में बहने लगी और अरब सागर में विलीन हो गई। तब से नर्मदा नदी को कुंवारी नदी के रूप में पूजा जाता है। नर्मदा नदी के प्रत्येक कंकड़ को नर्वदेश्वर शिवलिंग भी कहा जाता है।

    नर्मदा के विपरीत दिशा में बहने का वैज्ञानिक कारण

    हालांकि, नर्मदा नदी के विपरीत दिशा में बहने के संबंध में वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि नर्मदा नदी रिफ्ट वैली के कारण विपरीत दिशा में बहती है, यानी नदी के बहने के लिए बनाया गया ढलान विपरीत दिशा में है। ऐसी स्थिति में नदी ढलान की दिशा में ही बहती है।
  • Basant Panchami आज, जानें इस दिन का महत्व

    Basant Panchami आज, जानें इस दिन का महत्व

    धर्मः देश भर में वसंत पंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वसंत पंचमी मनाई जाती है। आज के दिन को मां सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार वसंत पंचमी के दिन ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़ककर सरस्वती माता को उत्पन्न किया था, इसलिए इस तिथि पर घर, मंदिर से लेकर सभी शिक्षा संस्थानों में मां शारदा की पूजा का भव्य आयोजन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां सरस्वती का प्रिय फल बेर है, इसलिए वसंत पंचमी की पूजा में इस फल को जरूर शमिल करें।

    ऐसे करें माता सरस्वती को प्रसन्न
    माता सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए उन्हें पीले चंदन का टीका लगाएं। फिर उसी चंदन को अपने मस्तक पर लगाकर मां सरस्वती का आशीर्वाद लें। अब देवी को पीले रंग की मिठाई और कुछ फलों का भोग लगाएं। इस दौरान पान और सुपारी भी चढ़ानी चाहिए। अंत में मां सरस्वती के मंत्रों का जाप करें।

    विद्यार्थियों के लिए खास है वसंत पंचमी
    विद्यार्थियों के लिए वसंत पंचमी का विशेष महत्व है। इस दिन विद्यार्थी और बच्चे पूरे मन और श्रद्धा से सरस्वती मां की पूजा करते हैं और करियर में सफलता पाने की इच्छा जाहिर करते हैं। वसंत पंचमी के दिन बच्चों को अलग तरीके से सरस्वती मां की पूजा करनी चाहिए। उन्हें मोदक, फूल, मीठे चावल और पीले रंग के फूल अर्पित करने चाहिए। इस तरह से पूजा कर के पढ़ाई में आ रही परेशानियों से जल्द ही छुटकारा मिल जाता है।

    वसंत पंचमी पर इन चीजों का करें दान
    ज्ञान की देवी को खुश करने के लिए इस खास दिन पर कुछ चीजों का दान भी करना चाहिए। वसंत पंचमी पर पढ़ाई-लिखाई से जुड़ीं चीजें दान करनी चाहिए। इससे करियर में उन्नति प्राप्त होती हैं। धार्मिक ग्रंथों में जरूरतमंद बच्चों को पेंसिल, किताबें और पेन दान में देना शुभ माना जाता है।

    वसंत पंचमी पर पीले रंग का महत्व
    वसंत पंचमी पर पीले रंग को अत्यंत शुभ और सौभाग्यशाली माना जाता है। यह रंग देवी सरस्वती का प्रिय माना गया है जो ज्ञान, ऊर्जा, उत्साह, तेजस्विता एवं सकारात्मकता का प्रतीक है। इस दिन विशेष रूप से पीले वस्त्र धारण करने, पीले पुष्प अर्पित करने और पीले रंग के भोजन का सेवन करने की परंपरा है। मान्यता है कि पीला रंग नई फसल का प्रतीक है और इस दिन से ‘वसंत ऋतु’ की शुरुआत भी होती है। इस दौरान जगह-जगह रंग-बिरंगे फूल, खेतों में सरसों की पीली फसलें लहलहाने लगती हैं, इसलिए वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर पीले रंग के वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके अलावा, पीला रंग समृद्धि और ज्ञान का भी प्रतीक है। मान्यता है कि पीले वस्त्र धारण करने से आत्मिक शुद्धता बढ़ती है और मन शांत रहता है। यह रंग धार्मिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।

  • आज सपाट पर खुली STOCK MARKET, सेंसेक्स में आई गिरावट

    आज सपाट पर खुली STOCK MARKET, सेंसेक्स में आई गिरावट

    मुंबई: भारतीय शेयर बाजार में जारी तेजी का सिलसिला वीरवार को रूक गया। दरअसल, बुधवार को दोनों इंडेक्स Sensex-Nifty तेजी के साथ बंद हुए। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 631 अंक चढ़कर 76,532.96 के लेवल पर बंद हुआ था, तो वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 205 अंकों की उछाल के साथ 23,163 पर बंद हुआ था। शेयर बाजार की निगाहें अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले पर टिकी हुई थीं और बुधवार रात US Fed ने फैसला लेते हुए पॉलिसी रेट को स्थिर रखा है।

    इसके बाद जहां अमेरिकी बाजारों में कमजोरी दिखी, तो गिफ्ट निफ्टी भी सुस्ती में कारोबार कर रहा था। तो इसका असर भारतीय बाजार पर भी दिखा और इसकी रफ्तार पर ब्रेक लग गया। सेंसेक्स करीब 100 अंक फिसल गया, तो निफ्टी भी मामूली गिरावट के साथ लाल निशान पर ओपन हुआ। आज के कारोबार के दौरान निफ्टी पर बजाज फाइनेंस, बजाज फिनसर्व, भारती एयरटेल, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, एनटीपीसी प्रमुख लाभ में रहे, जबकि टाटा मोटर्स, एचडीएफसी लाइफ, एक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक के शेयर फोकस में रहेंगे।

    बीते दिन कारोबार के दौरान फ्टी पर श्रीराम फाइनेंस, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, विप्रो, बजाज ऑटो, इंफोसिस के शेयर टॉप गेनर के लिस्ट में शामिल रहे. जबकि एशियन पेंट्स, मारुति सुजुकी, बीपीसीएल, ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज, आईटीसी के शेयर टॉप लूजर के लिस्ट में शामिल रहे। सेक्टोरल मोर्चे पर मीडिया, आईटी, रियल्टी में 2-2 फीसदी की तेजी आई, जबकि एफएमसीजी इंडेक्स में 0.5 फीसदी की गिरावट आई। बीएसई मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में 2-2 फीसदी की तेजी आई। फेड के ब्याज दरों के फैसले और केंद्रीय बजट से पहले आईटी और वित्तीय शेयरों की बदौलत सेंसेक्स और निफ्टी ने बुधवार को लगातार दूसरे सत्र में बढ़त दर्ज की। बीएसई का बाजार पूंजीकरण 6.13 लाख करोड़ रुपये बढ़कर 415.13 लाख करोड़ रुपये हो गया।

  • संत प्रेमानंद महाराज की बिगड़ी तबीयत

    संत प्रेमानंद महाराज की बिगड़ी तबीयत

    नई दिल्ली : मथुरा-वृंदावन के प्रसिद्ध संत बाबा प्रेमानंद दास महाराज जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिससे उनके भक्तों में भारी मायूसी फैल गई है। महाराज जी को गोवर्धन परिक्रमा के दौरान स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हुई, जिसके कारण उन्होंने परिक्रमा छोड़कर आश्रम लौटने का फैसला किया। अब उनके भक्त भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना कर रहे हैं कि महाराज जी जल्दी से स्वस्थ हो जाएं।

    शनिवार को प्रेमानंद जी महाराज अपनी बड़ी संख्या में भक्तों के साथ गोवर्धन परिक्रमा के लिए गए थे। परिक्रमा के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने पर वह तुरंत आश्रम लौट आए। परिक्रमा के बीच में ही उन्होंने रुकने का निर्णय लिया, क्योंकि उनकी तबीयत बहुत खराब हो गई थी। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद से भक्तों में चिंता और निराशा का माहौल है। वे भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना कर रहे हैं कि महाराज जी जल्द ठीक हो जाएं और फिर से उनका दर्शन कर सकें।

    महाराज जी की तबीयत बिगड़ने के बाद से उनके भक्तों में गहरी मायूसी छा गई है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में उनके आश्रम पहुंचकर उनका ध्यान कर रहे हैं और राधारानी से प्रार्थना कर रहे हैं कि उनका स्वास्थ्य जल्दी ठीक हो। प्रेमानंद जी के दर्शन के लिए देश-विदेश से भक्तों का तांता लगा रहता है, और उनकी तबीयत खराब होने के बाद लोग अपने प्रिय संत के दर्शन के बिना वापिस  लौटने को मजबूर हैं।

  • असफलता के डर को दूर करने के लिए अपनाएं शास्त्रों की ये 3 महत्वपूर्ण बातें

    असफलता के डर को दूर करने के लिए अपनाएं शास्त्रों की ये 3 महत्वपूर्ण बातें

    Religion : लक्ष्य मुश्किल हो तो उस में असफलता मिलने की संभावनाएं बनी रहती हैं। जिस काम की शुरुआत में असफल होने का भय रहता है, वह काम और मुश्किल लगने लगता है। असफलता का भय दूर करने के लिए शास्त्रों की कथाओं से सीख ले सकते हैं। जानिए ऐसी कथाएं, जिनमें सफल होने के सूत्र बताए गए हैं…

    श्रीमद्भगवद्गीता में महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन भ्रम में फंसे हुए थे, वे सही-गलत समझ नहीं पा रहे थे। उस समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि किसी भी स्थिति में हमें भ्रम में नहीं फंसना चाहिए। अगर हम भ्रम में फंसे रहेंगे तो सफलता मिलना संभव नहीं है।

    अर्जुन का भ्रम दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने गीता उपदेश दिया। श्रीकृष्ण की बातें सुनकर अर्जुन के सारे भ्रम दूर हो गए और फिर वे युद्ध के लिए तैयार हो गए।सफल होना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने सारे भ्रम दूर करना चाहिए। भ्रम के साथ काम करेंगे तो सफल नहीं हो पाएंगे।

    रामायण में हनुमान, अंगद, जामवंत और वानर सेना को मालूम हो गया था कि देवी सीता समुद्र पार रावण की लंका में हैं। इस बात की सच्चाई जानने के लिए किसी को लंका जाना था। उस समय अंगद ने कहा कि मैं समुद्र पार करके लंका जा तो सकता हूं, लेकिन वापस लौट आऊंगा, इसमें मुझे संशय है। यहां अंगद ने आत्मविश्वास की कमी दिखाई और लंका जाने से मना कर दिया। इसके बाद जामवंत ने हनुमान जी को उनकी शक्तियां याद दिलाई और लंका जाने के लिए प्रेरित किया।

    जामवंत की बातें सुनकर हनुमान जी आत्मविश्वास से भर गए और लंका जाने के लिए तैयार हो गए। बाद में हनुमान जी ने इतने मुश्किल काम को अपने आत्मविश्वास से कर दिखाया। काम करने से पहले ही आत्मविश्वास कमजोर हो जाएगा तो सफलता हाथ से निकल जाएगी, इसलिए आत्मविश्वास कमजोर न होने दें। खुद पर भरोसा रखें।


    महाभारत में युधिष्ठिर में जुआ खेलने की बुरी आदत थी। इस आदत की वजह से युधिष्ठिर दुर्योधन और शकुनी से सबकुछ हार गए, अपने भाइयों और द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया, इन्हें भी हार गए। युधिष्ठिर ने अपनी असफलता को स्वीकार किया और इससे सीख लेकर आगे बढ़े। इतना कुछ होने के बाद भी युधिष्ठिर ने धैर्य और धर्म नहीं छोड़ा। असफलता से मिली सीख की वजह से ही उन्होंने आगे के सभी निर्णय सही लिए, श्रीकृष्ण और भाइयों की मदद से कौरवों को युद्ध में पराजित किया। असफल हो जाए तो निराश नहीं होना चाहिए। असफलता से सीख लें और आगे बढ़ें। किसी भी स्थिति में धैर्य और धर्म नहीं छोड़ना चाहिए। तभी सफलता मिल सकती है।

  • Mahakumbh में शाही स्नान का क्या है महत्व ? जानिए कुंभ कितने प्रकार के होते है

    Mahakumbh में शाही स्नान का क्या है महत्व ? जानिए कुंभ कितने प्रकार के होते है

    नई दिल्ली : महाकुंभ दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव है जिसमें शाही स्नान का विशेष महत्व है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार महाकुंभ में शाही स्नान करने वाले मोक्ष को प्राप्त करते हैं। कुम्भ का उल्लेख वेदों में भी मिलता है इसलिए कुम्भ की महत्ता बढ़ जाती है। कुम्भ के सम्बन्ध में वेदों में अनेक महत्त्वपूर्ण मन्त्र मिलते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि कुम्भ अत्यन्त प्राचीन और वैदिक धर्म से ओत-प्रोत है। कुछ उदहारण वेदों में सिद्ध होते है।। कुंभ मेले में शाही स्नान सबसे महत्वपूर्ण भागों और अनुष्ठानों में से एक है। शाही स्नान के लिए कुछ तिथियां तय की जाती हैं।

    महाकुंभ में शाही स्नान लोगों के लिए पूरी जिंदगी में एक बार मिलने वाला अवसर माना जाता है, क्योंकि महाकुंभ 144 साल बाद आता है। कुम्भ-पर्व में जाने वाला मनुष्य स्वयं दान-होमादि सत्कर्मों के फलस्वरूप अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है जैसे कुठार वन को काट देता है। जिस प्रकार गंगा नदी अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है, उसी प्रकार कुम्भ-पर्व मनुष्य के पूर्वसंचित कर्मों से प्राप्त हुए शारीरिक पापों को नष्ट करता है और नूतन (कच्चे) घड़े की तरह बादल को नष्ट-भ्रष्टकर संसार में सुवृष्टि प्रदान करता है महाकुंभ में स्नान करने से क्या फल मिलता है: शास्त्रों के अनुसार, महाकुंभ में स्नान व पूजा करने से कई गुना अधिक पु्ण्य फलों की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि कुंभ मेले में स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    कुंभ चार तरह के होते हैं, महाकुंभ, अर्ध कुंभ, पूर्ण कुंभ और माघ मेला

    1. महाकुंभ: महाकुंभ 144 वर्षों में आयोजित होता है। ऐसी मान्यता है कि महाकुंभ मेला 12 पूर्ण कुंभ मेला के बाद आता है और यह सिर्फ प्रयागराज में ही लगता है।

    2. अर्ध कुंभ: अर्ध कुंभ हर 6 वर्षों में लगता है। अर्ध कुंभ दो पूर्ण कुंभ मेला के बीच में आयोजित किया जाता है। अर्ध कुंभ का आयोजन हरिद्वार व प्रयागराज में किया जाता है।

    3. पूर्ण कुंभ: पूर्ण कुंभ का आयोजन प्रत्येक 12 वर्षों में किया जाता है। यह चार पवित्र स्थानों हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक व उज्जैन में कहीं भी लग सकता है।

    4. माघ मेला: माघ मेला का आयोजन हर साल किया जाता है। इसे छोटा कुंभ भी कहते हैं। यह प्रयागराज में माघ मास में किया जाता है। आमतौर पर यह जनवरी-फरवरी महीने में लगता है।

  • मकर संक्रांति पर क्या है गंगा स्नान का विशेष महत्व, जानें पौराणिक कथा

    मकर संक्रांति पर क्या है गंगा स्नान का विशेष महत्व, जानें पौराणिक कथा

    धर्मः मकर संक्रांति एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलाव का उत्सव है। यह दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है, जिससे उत्तरायण की शुरुआत होती है और शीत ऋतु का अंत करीब आता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं। शनि, जो मकर राशि के स्वामी हैं, का अपने पिता से संबंध मधुर नहीं था। फिर भी, सूर्य देव बिना किसी द्वेष के उनके घर जाते हैं, जो पिता-पुत्र के संबंधों को मधुर बनाने का संदेश देता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि पारिवारिक रिश्तों में प्रेम और सम्मान बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है, भले ही परिस्थितियां कैसी भी हों।

    इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध की समाप्ति की घोषणा की थी। इस उपलक्ष्य में उन्होंने सभी के घरों में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया था। इसलिए, मकर संक्रांति को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। लोग गरीबों को तिल, गुड़, खिचड़ी, और वस्त्र दान करते हैं।

    भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मकर संक्रांति को अलग-अलग नामों और रीति-रिवाजों से मनाया जाता है। मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व है जो हमें प्रकृति के चक्र, रिश्तों के महत्व, और दान-पुण्य की महिमा का संदेश देता है।

  • मकर संक्रांति पर्व से पहले सोने के बढ़े दाम

    मकर संक्रांति पर्व से पहले सोने के बढ़े दाम

    नई दिल्लीः मकर संक्रांति के पर्व से पहले सोने की कीमत में उछाल आया है। सोमवार को सोने की कीमत में 180 रुपये प्रति 10 ग्राम की तेजी आई। वहीं, बात चांदी की करें तो उसकी कीमत में मामूली गिरावट आई है। चांदी 100 रुपये प्रति किलो टूटा है। गौर हो कि सोने चांदी की कीमतें हर दिन टैक्स और उत्पाद शुल्क के कारण घटता बढ़ता रहता है। सोमवार को सर्राफा बाजार में 24 कैरेट सोने की कीमत 180 रुपये बढ़कर 79800 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई। इससे पहले 12 जनवरी को इसका भाव 79620 रुपये था।

    वहीं, बात 22 कैरेट सोने के कीमत की करें तो बाजार में उसकी कीमत में 150 रुपये की तेजी आई है। इसके बाद उसका भाव 73150 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया. पहले 12 जनवरी को इसकी कीमत 73000 रुपये थी। इन सबके अलावा बात 18 कैरेट सोने की करें तो सोमवार को बाजार में उसकी कीमत 120 रुपये बढ़कर 59850 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई। बता दें कि सोने की खरीदारी से पहले उसकी शुद्धता जरूर जांचनी चाहिए। 24 कैरेट सोना सबसे शुद्ध माना जाता है। इसके खरीदते समय हॉलमार्क भी देखना चाहिए।

    सोने के अलावा बात चांदी के कीमत की करें तो सोमवार को उसकी कीमत में मामूली कमी देखने को मिली है। बाजार खुलने के साथ चांदी 100 रुपये प्रति किलो टूटकर होकर 93400 रुपये प्रति किलो हो गया। पहले 12 जनवरी को इसकी कीमत 93500 रुपये थी। सर्राफा एसोसिएशन के महामंत्री रवि सर्राफ ने बताया कि जनवरी महीने में अभी वेडिंग सीजन का दौर शुरू होने वाला है। इस सीजन से पहले ही बाजार में तेजी का दौर देखा जा रहा है। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में अभी सोने चांदी की कीमत और बढ़ सकती है।