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  • Premanand Maharaj से मिलने पहुंचे इंद्रेश उपाध्याय के पिता, महाराज ने की कथावाचक की तारीफ

    Premanand Maharaj से मिलने पहुंचे इंद्रेश उपाध्याय के पिता, महाराज ने की कथावाचक की तारीफ

    धर्म: वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने हाल ही में शादी की है। उनकी शादी का कार्ड भी काफी चर्चा में रहा। अब उनके पिता कृष्ण चंद्र ठाकुर और प्रेमानंद महाराज की मुलाकात का वीडियो सोशल मीडया पर वायरल हो रहा है। इस भेंट के दौरान दोनों में बात भी हुई और बातचीत का मुख्य हिस्सा कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय रहे। प्रेमानंद महाराज ने कहा कि इंद्रेश उपाध्याय का स्वभाव ऐसा है कि लूट लेता है और वो एक बार भी जिसके पास जाते हैं उसको अपना बना लेते हैं।

    कथावाचक की तारीफ की

    प्रेमानंद महाराज ने इंद्रेश उपाध्याय के स्वभाव की तारीफ करते हुए कहा कि उनका स्वभाव मृदु महा भागवत स्वरुप है। इंद्रेश पर हमारे संत महात्मा, वैष्णव सब आत्मा की तरह प्यार करते हैं। उनका स्वभाव है कि सबको लूट लेता है एक बार जिसके पास गए उन्हें अपना बना लेते हैं। प्रेमानंद महाराज ने इंद्रेश उपाध्याय की वाणी और कथावाचन शैली की भी तारीफ की। उन्होंने उनके पिता से यह बात कही कि आपकी ऐसी कृपा है कि उनकी वाणी में अमृत विराजमान है। जब यह भागवत चर्चा करते हैं तो चित्त को एकाग्रता करनी नहीं पड़ती। चित्त स्वभाविक एकाग्र हो जाता है।

    जयपुर में हुआ इंद्रेश उपाध्याय का विवाह

    इस दौरान कृष्ण चंद्र ठाकुर जी ने कहा कि इंद्रेश दो बार आप से मिल चुके हैं। यह वीडियो पुराना है और इंद्रेश की शादी के बाद अब वायरल हो रहा है। इंद्रेश उपाध्याय की शादी 5 दिसंबर को जयपुर के आमेर स्थित ताज होटल में वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुई। यह शादी सिर्फ एक पारिवारिक उत्सव नहीं थी बल्कि धार्मिक और सामाजिक जगत में भी खूब चर्चा का विषय बनी है। इंद्रेश उपाध्याय की शादी में देशभर से संत शामिल हुए। मंहत, आचार्य और कई विशिष्ट अतिथियों ने आजोयन में शामिल होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। पूरे विवाह समारोह में वैदिक मंत्रोच्चार पारंपरिक रीतियों और आध्यात्मिक वातावरण का खास रंग देखने को मिला। इससे इंद्रेश उपाध्याय की शादी और यादगार बन गई।    
  • इस जन्म में भुगतना पड़ता है पिछले कर्मों का फल, Premanand Maharaj ने दिया जवाब

    इस जन्म में भुगतना पड़ता है पिछले कर्मों का फल, Premanand Maharaj ने दिया जवाब

    धर्म: ऐसा बोला जाता है कि पिछले जन्मों का फल इस जन्म में भुगतना पड़ता है पर इस बात में कितनी सच्चाई है। यह कोई नहीं जानता। अब प्रेमानंद महाराज ने इस पर जवाब दिया है। महाराज के अनुसार, कर्म का सिद्धांत ही ईश्वर की सबसे पहली न्याय व्यवस्था है। उनका यह कहना है कि इन दुनिया में जब कोई भी अपराध कर दे तो उसी दिन उसको सजा नहीं मिलती वैसे ही भगवान की अदालत में भी तुरंत कर्मों का फल नहीं मिलता।

    उस दरबार में नहीं चलती रिश्वत

    उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई कत्ल कर दे तो क्या उसको उसी दिन फांसी दी जाती है? नहीं न पहले मुकदमा चलता है फिर कुछ लोग गवाही देते हैं और इसके बाद वकील को फैसले तक पहुंचने में समय लगता है। ऐसे ही हमारे पिछले जन्मों के कर्म भी एक अद्भूत और विशाल-न्याय व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं। भगवान के दरबार में किसी की गवाही, सिफारिश या रिश्वत की जरुरत नहीं पड़ती।

    सौ-सौ जन्मों का फल भी मिल जाता है

    उस अदालत में सिर्फ न्याय और सच्चाई ही चलती है। प्रेमानंद महाराज के अनुसार, ब्रह्मांड जितना बड़ा है उतना ही बड़ा हमारे कर्मों का लेखा भी होता है इसलिए कभी-कभी सौ-सौ जन्मों का फल भी किसी चरण में सामने आ ही जाता है।

    भगवान रखते हैं पूरा हिसाब

    भगवान की अदालत बहुत बड़ी होती है। वहां पर कई सारे जीवों और अनंत लोगों का हिसाब रखा जाता है। इसी कारण कर्मों का रजिस्टर देर से खुलता है।

    कर्म का मिलेगा फल

    हम समझते हैं कि अब तो पाप भूल गया होगा लेकिन भगवान कभी भी नहीं भूलते। वो बस उचित समय का इंतजार करते हैं। जब वो रजिस्टर खुलता है तभी जीव को अपने अच्छे और बुरे दोनों कर्मों का फल मिलता है। उनके अनुसार, कर्म का नियम ऐसा है कि उससे बिल्कुल बचा नहीं जा सकता। दुनिया में कभी-कभी अन्याय हो जाता है पर भगवान के दरबार में नहीं।

    कर्मों की गांठ खुलेगी

    प्रेमानंद महाराज के अनुसार, मनुष्य का शरीर बहुत ही दुर्लभ अवसर है। पाप करना आसान होता है पर उसका परिणाम बहुत कठिन होता है इसलिए वो हमेशा लोगों को अच्छे कर्म करने और सच का पालन करने के लिए और भगवान का नाम जपने की सलाह देता है। दिन के कुछ मिनट भी यदि आप अपने आराध्य को देंगे तो मन शांत होगा और जीवन अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगेगा। वो कहते हैं कि नाम जप आपके मन को निर्मल करेगा। कर्मों को पवित्र दिशा मिलेगी। उनके अनुसार, भगवान का स्मरण न सिर्फ व्यक्ति का आंतरिक शुद्धिकरण करेगा बल्कि इससे कर्मों की गांठ भी खुलेगी।
  • मोक्षदा एकादशी पर न करें ये काम, भगवान विष्णु हो जाएंगे नाराज

    मोक्षदा एकादशी पर न करें ये काम, भगवान विष्णु हो जाएंगे नाराज

    धर्म: हिंदू धर्म में एकादशी की तिथि बहुत ही खास मानी गई है। पूरे साल में 24 एकादशियां होती है। एकादशी को अनुशासन संयम और भक्ति के साथ मनाने के लिए कहा जाता है। यह सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि आत्मिक शुद्धि और भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद लेने के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे दिल से, पूरे नियम से एकादशी का व्रत करता है उसके पाप दूर होते हैं और जीवन में खुशी, सौभाग्य और समृद्धि आती है। वहीं एकादशी के कुछ नियम भी बताए हैं। इन नियमों का पालन न करने से भगवान विष्णु नाराज हो सकते हैं।

    कल मनाई जाएगी मोक्षदा एकादशी

    हिंदू पंचाग के अनुसार, इस साल मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 30 नवंबर यानी की आज रात 9:29 पर शुरु होगी और 1 दिसंबर को शाम 7:01 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, मोक्षदा एकादशी का व्रत 1 दिसंबर को रखा जाएगा।

    लहसुन प्याज न खाएं

    व्रत वाले दिन सादा और सात्विक खाना ही खाएं। इस दिन तामसिक चीजें जैसे कि लहसुन और प्याज जैसी चीजों से परहेज करें। यह आपकी पवित्रता को प्रभावित करेगी ऐसे में इससे बचाव ही करें।

    तुलसी के पत्ते न तोड़ें

    एकादशी वाले दिन तुलसी का पत्ता न तोड़ें और न ही इस दिन तुलसी के पौधे को हाथ भी न लगाएं।

    देर तक न सोएं

    इस दिन आलस को दूर ही रखें। बहुत देर तक सोना या फिर दोपहर में सोना भी इस दिन अवॉइड ही करें। इससे मन की शुद्धता और व्रत की आध्यत्मिक एनर्जी पर भी असर होगा।

    नेगेटिव विचारों से रहें दूर

    व्रत में सिर्फ शरीर ही नहीं बल्कि मन और वाणी का भी शुद्ध होना जरुरी है। इस दिन किसी के लिए कठोर शब्द न बोलें। इसके अलावा किसी का अपमान करना या नेगेटिव सोच आपके व्रत के प्रभाव को कम कर देगी।  
  • राम मंदिर में इस शुभ मुहूर्त में किया जाएगा ध्वजारोहण समारोह, PM Modi भी होंगे शामिल

    राम मंदिर में इस शुभ मुहूर्त में किया जाएगा ध्वजारोहण समारोह, PM Modi भी होंगे शामिल

    धर्म: विवाह पंचमी के मौके पर अयोध्या के राम मंदिर के शिखर पर भव्य ध्वजारोहण समारोह की तैयारियां जोरो पर चल रही हैं। श्रीराम और माता सीता की विवाह वर्षगांठ के मौके पर रामनगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया है। इस मौके पर पीएम नरेंद्र मोदी भी शामिल होंगे। इस दौरान कितने बजे ध्वजारोहण होगा इसका क्या महत्व है आज आपको इस बारे में बताएंगे।

    ध्वजारोहण के लिए मुहूर्त

    राम मंदिर में ध्वजारोहण के लिए सुबह 11:58 से लेकर दोपहर 12:30 बजे तक का शुभ मुहूर्त रहेगा। इस मौके पर पीएम नरेंद्र मोदी राम मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वज की स्थापना करेंगे। राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुसार, यह ध्वजारोहण मंदिर का निर्माण कार्य खत्म होने का संकेत है।

    इस वजह से मंदिर पर लगता है ध्वज

    शास्त्रों की मानें तो मंदिर के शिखर पर फहराती ध्वजा से दिव्य एनर्जी का संचार होता है। इससे मंदिर परिसर में पॉजिटिव और पवित्र वातावरण से बना रहता है। मंदिर के शीर्ष पर ध्वजा लगाने का उद्देश्य ये होता है कि मंदिर के अंदर विशिष्ट दैवीय शक्ति उपस्थित है क्योंकि मंदिर का शिखर सर्वोच्च बिंदु माना जाता है। कहा जाता है कि ये ब्रह्मांडीय एनर्जी और मंदिर के गर्भगृह के बीच एक संपर्क सूर्य का कार्य करता है।

    ध्वज दर्शन करने का फायदा

    मंदिर में लगा हुआ झंड़ा उस मंदिर की दिव्य और आध्यात्मिक एनर्जी को भी इंगित करता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मंदिर में ध्वज के दर्शन करने से उस मंदिर में स्थित देवी-देवता के दर्शन करने का बराबर पुण्य मिलता है।

    इस तरह होगा राम मंदिर का ध्वजा कार्यक्रम

    राम मंदिर का ध्वज शास्त्रों और भगवान राम की सूर्यवंशी परंपरा के अनुसार बनाया गया है। ध्वज का रंग केसरिया रखा गया है। इस पर सूर्य देव का प्रतीक चिन्ह भी अंकित किया गया है। राम मंदिर के ध्वज की ऊंचाई 191 फीट होगी। मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वज स्थापित करना सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि इसका गहरा और आध्यात्मिक महत्व भी है।
  • इस दिन मनाई जाएगी पौष पुत्रदा एकादशी, भगवान विष्णु को प्रसन्न करना है तो करें ये काम

    इस दिन मनाई जाएगी पौष पुत्रदा एकादशी, भगवान विष्णु को प्रसन्न करना है तो करें ये काम

    धर्म: सनातन धर्म में पौष महीना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस महीने में अनेक व्रत और पर्व आते हैं। इस महीने में पड़ने वाले पौष पुत्रदा एकादशी का भी खास महत्व होता है। यह पवित्र तिथि भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को समर्पित होती है। संतान प्राप्ति, वंश बढ़ाने और पारिवारिक सुख-शांति के लिए यह व्रत विशेष रुप से फलदायी माना जाता है।

    साल में दो बार आती है पुत्रदा एकादशी

    पुत्रदा एकादशी साल में दो बार आती है। पहली सावन महीने में और दूसरी पौष महीने में शास्त्रों में यह कहा गया है कि इस व्रत को करने से दंपत्ति का योग्य, स्वस्थ और दीर्घायु संतान का आशीर्वाद मिलता है। परिवार में चल रही बाधाएं भी दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन भक्त उपवास करते हैं और भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि विधान के साथ पूजा करते हैं। एकादशी की तिथि भगवान विष्णु को सबसे ज्यादा प्रिय है। इस दिन जो भी भक्त व्रत करते हैं उनके सभी पापों का नाश होता है।

    इस दिन मनाई जाएगी एकदाशी

    पंचागों के अनुसार, पौष महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 30 दिसंबर 2025 को सुबह 7:50 बजे शुरुआत होगी और 31 दिसंबर 2025 को सुबह 5:00 बजे खत्म होगी। परंपरा के अनुसार, आम लोग 30 दिसंबर को व्रत रखेंगे और वैष्णव संप्रदाय परंपरा के अनुसार, यह एकादशी 31 दिसंबर को मनाई जाएगी। व्रत खोलने अर्थात पारण का समय भी बहुत जरुरी माना जाता है। व्रत का पारण 31 दिसंबर दोपहर 1:29 बजे से 3:33 बजे तक किया जाएगा। इस अवधि के दौरान भगवान विष्णु को तिल, पंचामृत, तुलसी और फलों के साथ अर्पण करके व्रत का समापन करना शुभ माना जाता है।

    खास विधि के साथ करें पूजा

    यदि आप एकादशी का व्रत रखने वाले हैं तो इस दिन सुबह उठकर नहाने के बाद संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु को पीला चंदन, रोली, मोली, अक्षत, पीले फूल, ऋतुफल, मिष्ठान से पूजा करें। धूप-दीप से आरती करके दीपदान जरुर करें। यदि आप संतान प्राप्ति की इच्छा से व्रत कर रहे हैं तो पीले वस्त्र पहनकर भगवान श्रीकृष्ण की बाल स्वरुप में पूजा करें। इसके बाद संतान गोपाल मंत्र का जाप करें। पूरे दिन छल, कपट, क्रोध और द्वेष जैसी भावनाओं से दूर रहें और भगवान विष्णु की सच्चे मन से पूजा करें।
  • कब मनाई जाएगी साल की आखिरी पूर्णिमा? इस पूजा विधि से करें मां लक्ष्मी को प्रसन्न

    कब मनाई जाएगी साल की आखिरी पूर्णिमा? इस पूजा विधि से करें मां लक्ष्मी को प्रसन्न

    धर्म: हिंदू धर्म में पूर्णिमा का दिन एक त्योहार की तरह मनाया जाता है। इस साल की आखिरी पूर्णिमा 4 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी। ये मार्गशीर्ष पूर्णिमा होती है। इस दिन भक्तों को मां लक्ष्मी का आशीर्वाद मिलता है। वहीं वैज्ञानिकों के अनुसार, पूर्णिमा उस समय होती है जब चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर की अपनी कक्षा में सीधे सूर्य के विपरीत होता है।

    पूर्णिमा के लिए शुभ मुहूर्त

    मार्गशीर्ष पूर्णिमा इस बार 4 दिसंबर 2025 को सुबह 8:37 पर शुरु होगी। इसका समापन 5 दिसंबर 2025 को सुबह 4:43 पर होगा। इस दिन अन्नपूर्णा जयंती भी मनाई जाएगी। इस दिन स्नान दान के लिए सुबह 5:10 से लेकर सुबह 6:04 तक रहेगा। सत्यनारायण की पूजा के लिए इस दिन सुबह 10:53 से लेकर दोपहर 1:29 तक का मुहूर्त रहेगा। इस दिन चंद्रोदय के लिए समय दोपहर 4:34 मिनट का रहेगा।

    पूर्ण कलाओं से युक्त होता है चंद्रमा

    पूर्णिमा वाला दिन चंद्रमा से खास संबंध रखता है क्योंकि इस रात को चंद्रमा पूर्ण कलाओं से युक्त होता है। चांद मन का कारक होता है। ऐसे में चंद्रमा की किरणें इंसान, पशु-पक्षी पेड़, पानी और हर प्रजाति को प्रभावित करती है। पूर्णिमा का जप-तप आध्यात्मिक साधकों को अपने अंदर के देवत्व को महसूस करने और भटके हुए मन को स्थिर करके खींचने में मदद करता है।

    ऐसे करें पूजा

    इस दिन भगवान श्री विष्णु को पंचामृत से स्नान करवाएं। इसके बाद उन्हें खीर का भोग लगाएं और पीले फूल अर्पित करें। घर पर सत्यानारायण की कथा करें। मान्याओं के अनुसार, इससे पापों का नाश होगा और आपको सभी भौतिक और सांसारिक सुखों की भी प्राप्ति होगी।

    करें ये उपाय

    इस दिन एक आटे का दीपक बनाकर उसमें तिल का तेल भरें। फिर उस दीपक को सुबह पीपल के पेड़ के नीचे जलाकर अपनी मनोकामना बता दें। मान्यताओं के अनुसार, इस उपाय को करने से धन मार्ग में आने वाली दिक्कतें दूर होगी और कार्यों में सफलता मिलेगी।
  • आखिर Premanand Maharaj क्यों लगाते हैं माथे पर चंदन का तिलक? खुद दिया महाराज ने जवाब

    आखिर Premanand Maharaj क्यों लगाते हैं माथे पर चंदन का तिलक? खुद दिया महाराज ने जवाब

    धर्म: हिंदू धर्म में तिलक का बहुत ही महत्व बताया गया है। यह सिर्फ सजावट या दिखावे का प्रतीक नहीं माना जाता बल्कि इसको ईश्वर की भक्ति और आध्यात्मिकता के खास चिन्ह के तौर पर देखा जाता है। वहीं मथुरा-वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज भी अपने माथे पर हमेशा चंदन का तिलक लगाकर रखते हैं। बहुत से लोग यह नहीं जानते कि प्रेमानंद महाराज माथे पर तिलक क्यों लगाते हैं।

    महाराज से व्यक्ति ने किया सवाल

    अब हाल ही में एक भक्त ने प्रेमानंद से प्रश्न किया। व्यक्ति ने उनसे पूछा कि तिलक लगाना दिखावा होता है या नहीं। इस पर उत्तर देते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि – ‘हमने जो माथे पर चंदन लगाया है वो दिखाने के लिए नहीं है। हमारे आचार्य परंपरा में तिलक की रचना की आज्ञा दी गई है’।

    महारानी को अर्पित किया प्रसाद है तिलक

    प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा कि- ‘हम जो माथे पर चंदन लगाते हैं वह कोई सजावट नहीं बल्कि महारानी जी को अर्पित किया हुआ एक प्रसाद है। इसे माथे पर धारण करना भक्ति की पहचान है। आगे महाराज ने कहा कि कंठी हमारे गुरु ने दी है माला हमारे गुरु ने दी है और ये वेशभूषा भी हमारे गुरु ने ही दी है ये सब हमारी उपासना के प्रतीक है बल्कि न कोई दिखावे के’। ‘अगर हम यह सोचें कि तिलक या कंठी न लगाएं ताकि लोग हमें दिखावटी न समझें तो यह हमारी उपासना का अपमान होगा और हमारी उपासना रद्द हो जाएगी। तिलक कंठी कोई दिखावा नहीं है ये हमारा सुहाग है। जैसे एक सौभाग्यवती स्त्री अपने पति के लिए सोलह श्रृंगार करती है वैसे ही हम भगवती जन अपने ईष्ट का श्रृंगार करते हैं’। ‘ये हमारे भगवान के चिन्ह है जिनके द्वारा हमारा दासत्व पुष्प होता है। इसको ऐसा खिलवाड़ मत समझना क्योंकि ये हमारी आराधना है’। आगे प्रेमानंद महाराज ने कहा कि – ‘भक्ति में बनावटीपन नहीं होना चाहिए यदि माला जप रहे हैं तो सिर्फ दिखाने के लिए नहीं बल्कि प्रेम से भजन करने के लिए करें’। ‘अगर कोई सामने आ जाए तो दिखावे के लिए ध्यानमग्न होने का नाटक न करें क्योंकि इस तरह का आचरण भक्ति नहीं अहंकार का रुप होता है। सच्ची भक्ति वही होती है जिसमें आडंबर नहीं सिर्फ समर्पण और प्रेम है’।
  • इस शुभ मुहूर्त में मनाई जाएगी उत्पन्ना एकादशी, ऐसे करें पूजा श्री हरि की मिलेगी कृपा

    इस शुभ मुहूर्त में मनाई जाएगी उत्पन्ना एकादशी, ऐसे करें पूजा श्री हरि की मिलेगी कृपा

    धर्म: हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत का खास महत्व बताया गया है। इन्हीं एकादशी में से एक है उत्पन्न एकादशी। इसे साल की सबसे शुभ और फलदायी एकादशी माना जाता है। यह व्रत हर साल मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि मनाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन एकादशी देवी प्रकट हुई थी इसलिए इसको उत्पन्ना एकादशी कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    15 नवंबर को मनाई जाएगी एकादशी

    इस बार उत्पन्न एकादशी का व्रत 15 नवंबर को रखा जाएगा। यह तिथि देर रात 12:49 पर शुरु होगी और अगले दिन 16 नवंबर को देर रात 2:37 पर खत्म होगी। इस दिन उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र और विश्कुंभ योग रहेगा। पूजा और व्रत की शुरुआत के लिए शुभ समय अभिजीत मुहूर्त माना जाता है। यह मुहूर्त सुबह 11:44 से शुरु होगा और दोपहर 12:27 तक रहेगा।

    एकादशी का व्रत करने से दूर होंगे पाप

    शास्त्रों की मानें तो जब असुर मुर नाम के दैत्य ने देवताओं को परेशान किया तो भगवान विष्णु ने उसे मारने के लिए युद्ध किया। युद्ध के दौरान जब भगवान विश्राम करने लगे तब उनके शरीर से एक दिव्य स्त्री प्रकट हुई। वही स्त्री एकादशी देवी थी। उन्होंने मुर दैत्य का वध किया। इसके बाद भगवान विष्णु ने खुश होकर उन्हें वरदान दिया कि जो भी उनके तिथि पर व्रत करेगा उसके सभी पाप खत्म हो जाएंगे।

    ऐसे करें पूजा

    इस दिन सुबह उठकर नहाएं और पीले कपड़े पहनें। इसके बाद भगवान विष्णु के नाम का दीया जलाएं। पूजा में भगवान को पीले फूल, तुलसी दल और मिठाई अर्पित करें। उत्पन्ना एकादशी वाले दिन लोग पूरे दिन का व्रत रखकर भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं। कुछ लोग निर्जला व्रत करते हैं जबकि कुछ फलाहार या एकादशी प्रसाद का सेवन करते हैं। शास्त्रों में यह बताया गया है कि इस दिन पहले दाल और अन्य का सेवन वर्जित होता है।      
  • भगवान शिव के रौद्र अवतार को समर्पित है काल भैरव जयंती, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त

    भगवान शिव के रौद्र अवतार को समर्पित है काल भैरव जयंती, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त

    धर्म: हिंदू धर्म में काल भैरव जयंती बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसको भैरव अष्टमी या कालाष्टमी भी कहते हैं। यह त्योहार भगवान शिव के रौद्र अवतार काल भैरव के प्राक्ट्य और उनके अद्भूत शक्ति स्वरुप को समर्पित है। काल भैरव को समय का देवता और न्याय के संरक्षक के तौर पर पूजा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, काल भैरव जयंती वाले दिन ही भगवान काल भैरव प्रकट हुए थे। इसी कारण काल भैरव जयंती वाले दिन उनकी खास-तौर पर पूजा अर्चना की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इस मौके पर बाबा काल भैरव की जो भी आराधना करता है उसके जीवन से डर, नेगेटिव शक्तियां और बुरी आत्माएं दूर होती है। ऐसा माना जाता है कि काल भैरव की आराधना समय की बाधाओं और न्याय के विषयों में मदद करती है। इससे व्यक्ति के जीवन में सफलता और सुरक्षा आती है। इस दिन उपवास करने, जागरण करने और भैरव स्त्रोत का पाठ करने का भी खास महत्व बताया गया है।

    12 नवंबर को मनाई जाएगी काल भैरव जयंती

    हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 11 नवंबर मंगलवार सुबह 11:08 मिनट से शुरु होगी और इसका समापन 12 नवंबर बुधवार को सुबह 10:58 पर होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, कालभैरव जयंती 12 नवंबर 2025 को मनाई जाएगी।

    ऐसे करें पूजा

    इस दिन यदि संभव हो तो मंदिर में जाकर काल भैरव बाबा के सामने सरसों के तेल का दीया जलाएं। यदि आप मंदिर में नहीं जा सकते तो घर पर ही काल भैरव की पूजा कर लें। दीपक जलाने के बाद काल भैरव बाबा के मंत्रों का 108 बार जाप करें। इसके अलावा इस दिन भैरव अष्टक का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। इससे जीवन में पॉजिटिविटी आएगी, मानसिक शांति मिलेगी, डर और नेगेटिविटी का प्रभाव आपके जीवन से दूर होगा। भैरव बाबा को इस दिन विशेष भोग जरुर अर्पित करें। इस दिन जलेबी, उड़द की दाल के पकौड़े, नारियल का भोग आप लगा सकते हैं। यह भोग बाबा को प्रिय माना जाता है। इसको अर्पण करने से आपके जीवन में सुख, समृद्धि और शांति आएगी।

    पूजा का महत्व

    काल भैरव की आराधना करने से जीवन की नकरात्मक शक्तियां दूर होती है। इससे आपकी जीवन में स्थिरता और पॉजिटिव एनर्जी आएगी। पापों से भी मुक्ति मिलेगी और जीवन में सफलता के रास्ते खुलेंगे।
  • आज से शुरु हुआ मार्गशीर्ष महीना, श्रीकृष्ण की मिलेगी कृपा जरुर करें ये काम

    आज से शुरु हुआ मार्गशीर्ष महीना, श्रीकृष्ण की मिलेगी कृपा जरुर करें ये काम

    धर्म: हिंदू धर्म में मार्गशीर्ष महीना बहुत ही पावन और शुभ माना जाता है। इसको अगहन मास भी कहते है। यह महीना भगवान श्रीकृष्ण को काफी प्रिय होता है। पंचागों की मानें तो इस बार मार्गशीर्ष महीना 6 नवंबर से शुरु होकर 4 दिसंबर तक रहेगा। ऐसा माना जाता है कि इस महीने में की गई पूजा, दान और भक्ति का फल कई गुना ज्यादा मिलता है। इस समय यदि सच्चे मन से कोई काम किया जाए तो हर काम बहुत शुभ माना जाता है।

    दिसंबर तक चलेगा मार्गशीर्ष महीना

    मार्गशीर्ष महीने की शुरुआत 6 नवंबर यानी आज से हो चुकी है। यह महीना 4 दिसंबर तक चलेगा। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के बाद पौष महीने की शुरुआत हो जाएगी। यह महीना भगवान श्रीकृष्ण की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण ने स्वंय गीता में कहा है कि ‘मासानां मार्गशीर्षऽहम’ यानी की महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूं।

    जरुर करें ये काम

    मार्गशीर्ष महीने में श्रीकृष्ण के बाल स्वरुप यानी की लड्डू गोपाल की पूजा करनी चाहिए। रोज सुबह उठकर नहाने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर तुलसी पर जल चढ़ाएं। इस महीने भगवान श्रीकृष्ण, विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करें। ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम का जाप करना इस महीने में फायदेमंद रहेगा। इस महीने अन्न, कपड़ा, तेल, तिल और गुड़ का दान करें। इससे पितरों और देवों की कृपा मिलेगी। इस महीने एकादशी और पूर्णिमा का व्रत करने से भी खास फायदा होता है। इस महीने में पवित्र नदियों में स्नान का महत्व भी बढ़ जाता है। इस महीने गंगा, यमुना जैसी नदियों में स्नान करना अमृत स्नान के समान माना जाता है।

    इस महीने में न करें ये काम

    मार्गशीर्ष महीने में मांस, मदिरा या किसी भी तरह की तामसिक चीजों का सेवन न करें। मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में जीरे का सेवन करना भी वर्जित माना जाता है ऐसे में भोजन में इसका इस्तेमाल न करें। इस महीने में बासी या ठंडा भोजन भी न करें। इस महीने में तुलसी का पत्ता भी नहीं तोड़ना चाहिए।