Category: Spiritual

  • Guru Nanak Jayanti पर जानें गुरु नानक देव जी की शिक्षाएं, बदल जाएगी आपकी जिंदगी

    Guru Nanak Jayanti पर जानें गुरु नानक देव जी की शिक्षाएं, बदल जाएगी आपकी जिंदगी

    धर्म: आज पूरे देश में गुरु नानक देव जयंती धूमधाम के साथ मनाई जा रही है। ये गुरु नानक देव जी 556वीं जयंती है। गुरुनानक जयंती को गुरुपर्व भी कहा जाता है। यह सिखों का सबसे खास पर्व होता है। इस दिन को प्रकाश पर्व के तौर पर मनाया जाता है। गुरु नानक देव की जी करुणा, सद्भाव और सत्य की शिक्षाएं आज भी कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। गुरु नानक देव के उपदेश इंसानियत और समानता का रास्ता दिखाते हैं। इस दिन देशभर के गुरुद्वारों को दीपों के साथ सजाया जाता है। सुबह-सुबह नगर कीर्तन निकाला जाता है और जगह-जगह लंगर के रुप में सामूहिक सेवा की जाती है।

    गुरु नानक देव की शिक्षाएं

    . परमात्मा एक ही है वही सब के रचयिता और पालनकर्ता हैं। . ईश्वर हर जगह और हर प्राणी में विद्यमान हैं इसलिए किसी से भेदभाव न करो। . जो व्यक्ति ईश्वर की भक्ति में लीन होता है उसको किसी चीज का डर नहीं होता। . कभी किसी के बारे में बुरा मत सोचो और न ही बुरा करो। सभी के प्रति दया भाव रखो। . सबको समान दृष्टि से देखो। स्त्री और पुरुष दोनों एक समान है। . भोजन सिर्फ शरीर को जीवित रखने के लिए है। लोभ की बुरी आदत मत डालो । . हमेशा एक ही ईश्वर की साधना में मन लगाओ वही सच्चा मार्ग दिखाता है। . हमेशा खुश रहो और ईश्वर से अपनी गलतियों के लिए माफी मांगो। . अपनी कमाई का एक हिस्सा जरुरतमंदों की मदद में लगाओ यही सच्चा दान है।
  • देवउठनी एकादशी से शुरु हुए मांगलिक कार्य, November में शादी के लिए ये मुहूर्त रहेंगे शुभ

    देवउठनी एकादशी से शुरु हुए मांगलिक कार्य, November में शादी के लिए ये मुहूर्त रहेंगे शुभ

    धर्म: कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसको देवउठनी एकादशी भी कहते हैं। यह बीते दिन शनिवार को 1 नवंबर 2025 को मनाई गई। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और चातुर्मास भी खत्म हो जाता है। चातुर्मास खत्म होते ही पिछले चार महीने से रुके हुए शुभ-मांगलिक काम की शुरुआत भी हो जाती है। 6 जुलाई से चातुर्मास शुरु हुआ था। इसकी समाप्ति 1 नवंबर को हुई है। चातुर्मास के दौरान चार महीनों तक शादी, गृह प्रवेश, नामकरण, उपनयन और बाकी शुभ मांगलिक काम पर रोक रहती है। देवउठनी एकादशी वाले दिन यह रोक खत्म हो जाती है और दोबारा शुभ काम शुरु हो जाते हैं।

    नवंबर-दिसंबर को इसलिए कहते हैं शादी का सीजन

    देवउठनी एकादशी वाले दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जाग जाते हैं। अगले दिन विष्णु जी के शालीग्राम स्वरुप के साथ मां तुलसी का विवाह करवाया जाता है। इसके बाद बाकी लोगों के लिए भी शादी के मुहूर्त शुरु हो जाते हैं। ऐसे में लोग नवंबर-दिसबंर को शादी का सीजन कहते हैं। हालांकि यह जरुरी नहीं होता कि चातुर्मास खत्म होने के बाद आप किसी भी दिन शादी कर सकते हैं।  हिंदू धर्म में शादी विवाह जैसे कार्यों के लिए ग्रह-नक्षत्रों की चाल के आधार पर शुभ तिथि और मुहूर्त निकाला जाता है। शादी के लिए ये शुभ तिथियां बहुत जरुरी मानी जाती है।

    शादियों के लिए नवंबर में रहेंगे 14 शुभ मुहूर्त

    नवंबर महीने की यदि बात करें तो इस महीने में हिंदू विवाह के लिए कुल 14 शुभ मुहूर्त रहेंगे। इसमें शादी विवाह जैसे कार्य संपन्न किए जा सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवंबर महीने की 2,3,6,8,12,13,16,17,18,21,22,23,25,30 तारीखें शादी के लिए शुभ रहेगी। ऐसे में विवाह की तारीख तय करने से पहले आप किसी पंडित से वर-वधू की राशि-नक्षत्र के आधार पर ही तिथि-समय पक्का करें।  
  • Tulsi Vivah 2025: इस शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा तुलसी विवाह, जानें पूजा करने की विधि

    Tulsi Vivah 2025: इस शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा तुलसी विवाह, जानें पूजा करने की विधि

    धर्म: देवउठनी एकादशी के अगले दिन तुलसी विवाह धूमधाम के साथ किया जाता है। हिंदू धर्म में यह दिन बहुत ही धार्मिक और आध्यात्मिक माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा के बाद जागते हैं और विष्णु का विवाह तुलसी देवी (वृंदा) के साथ करवाया जाता है। यह दिन कार्तिक मास की सबसे शुभ तिथियों में से एक माना जाता है। इस दिन तुलसी और शालीग्राम (भगवान विष्णु का स्वरुप) का विवाह विधि-विधान के साथ किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि तुलसी विवाह करवाने से जीवन में वैवाहिक सुख, संतुलन, सफलता और शांति बनी रहती है। इस दिन से हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों के शुभ कार्मों की शुरुआत भी हो जाती है। देवउठनी एकादशी तक शादी, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे शुभ और मांगलिक काम वर्जित माने जाते हैं लेकिन तुलसी विवाह के बाद इन सभी कामों के लिए शुभ मुहूर्त शुरु हो जाता है।

    2 नवंबर को मनाया जाएगा तुलसी विवाह

    पंचागों के अनुसार, कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि 2 नवंबर सुबह 7:33 मिनट से शुरु होगी। इस तिथि का समापन 3 नवंबर सुबह 2:07 मिनट पर होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, इस साल 2 नवंबर 2025 को तुलसी विवाह का पर्व मनाया जाएगा।

    विवाह के लिए शुभ मुहूर्त

    तुलसी विवाह के शुभ मुहूर्त की यदि बात करें तो शाम 5:35 मिनट से शुरु होगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 5:35 से शुरु होकर 6:01 मिनट तक रहेगा। तुलसी विवाह वाले दिन ब्रह्मा मुहूर्त सुबह 4:50 मिनट से लेकर 5:42 मिनट तक है। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:42 से लेकर दोपहर 12:26 तक रहेगा। तुलसी विवाह पर व्याघात योग भी रहेगा। इसके अलावा सवार्थ सिद्धि योग इस दिन शाम 5:03 से लेकर 3 नवंबर की सुबह तक रहेगा।

    विवाह की विधि

    इस दिन सबसे पहले घर की अच्छे से साफ-सफाई करें। पूजा करने वाले व्यक्ति को पीले वस्त्र पहनने चाहिए क्योंकि पीला रंग सौभाग्य और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाएं। अब एक साफ लाल कपड़े के साथ मंडप बनाएं। मंडप को फूलों, आम के पत्तों और केले के तन्नों के साथ सजाएं। तुलसी के पौधे को मंडप मे रखे और उनके बाद भगवान शालिग्राम जी की स्थापना करें। शालीग्राम जी को नए कपड़े पहनाएं। तुलसी माता को लाल चुनरी ओढ़ाएं। इसके बाद शालिग्राम जी और मां तुलसी को फूलों की माला पहनाएं। अब दोनों का विवाह संस्कार पूरा करने के लिए सात फेरे करवाएं। जब फेरे पूरे हो जाएं तो पूरे परिवार के सदस्यों को मिलकर फूलों की बारिश करवानी चाहिए। भगवान विष्णु तथा तुलसी माता से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करें। अंत में तुलसी और शालिग्राम जी की आरती करें और उन्हें मिठाई और मौसमी फलों का भोग लगाएं।
  • गोपाष्टमी पर ऐसे करें गायों की पूजा, जानें विधि और शुभ मुहूर्त

    गोपाष्टमी पर ऐसे करें गायों की पूजा, जानें विधि और शुभ मुहूर्त

    धर्म: गोपाष्टमी का पर्व हर साल शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि वाले दिन मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पूजा वाले दिन गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। मान्यताओं के अनुसार, सात दिनों तक लगातार साल के बाद इंद्र देव ने गोपाष्टमी के दिन अपनी हार स्वीकार कर ली थी। इस साल गोपाष्टमी कब है और पूजा को शुभ मुहूर्त क्या है इस बारे में लोगों को थोड़ी कंफ्यूजन है तो चलिए आपको बताते हैं कि इस बार यह पर्व कब मनाया जाएगा।

    30 अक्टूबर को है गोपाष्टमी

    पंचागों के अनुसार, कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 29 अक्टूबर बुधवार के दिन सुबह 9:23 मिनट पर शुरु होगी। इसका समापन 30 अक्टूबर गुरुवार के दिन सुबह 10:06 पर होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, गोपाष्टमी की पूजा 30 अक्टूबर को की जाएगी।

    पूजा का शुभ मुहूर्त

    इस दिन राधा श्रीकृष्ण की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 6:35 से लेकर 7:57 तक रहेगा। इस दौरान श्री राधा कृष्ण की पूजा करने से भक्ति का आनंद मिलता है। इसके अलावा शादीशुदा जिंदगी में भी प्यार बना रहता है। पार्टनर का साथ मिलेगा और सभी मनोकामनाएं पूरी होगी। इसके साथ ही भक्तों के ऊपर श्री राधा कृष्ण की असीम कृपा बनी रहेगी।

    गाय और बछड़ों की होती है खास पूजा

    इस दिन गाय और बछड़े की खास तौर पर पूजा की जाती है। इस दिन गायों को सजाया जाता है, उन्हें गुड़ और चारा खिलाया जाता है। इसके अलावा उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यह त्योहार कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि वाले दिन मनाया जाता है। इसका महत्व भगवान श्री कृष्ण के गौ चरण की शुरुआत से जुड़ा हुआ है।

    ऐसे करें पूजा

    इस दिन साफ सुथरे कपड़े पहनें और पूजा का संकल्प लें। फिर पूजा स्थान को गोबर, फूलों और रंगोली के साथ सजाएं। भगवान श्रीकृष्ण और गौमाता की मूर्ति या चित्र रखें। गाय को स्नान करवाएं और उसके सींगों पर हल्दी, कुमकुम और फूलों की माला डालें। उसे गुड़, हरा चारा, गेंहू, फल और दीपक अर्पित करें। अंत में गौ माता की आरती और परिक्रमा करें।
  • 30 या फिर 31 किस दिन मनाई जाएगी आंवला नवमी? जानें शुभ मुहूर्त और पौराणिक कथा

    30 या फिर 31 किस दिन मनाई जाएगी आंवला नवमी? जानें शुभ मुहूर्त और पौराणिक कथा

    धर्म: दीवाली भले ही खत्म हो गई है लेकिन हिंदू धर्म में अभी भी उत्सव खत्म नहीं हुई। 25 से 28 अक्टूबर तक छठ का महापर्व है। इसके बाद अक्षय नवमी का भी पर्व आने वाला है। अक्षय नवमी को आंवला नवमी भी कहते हैं। यह त्योहार हर साल कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि वाले दिन मनाया जाता है। इस दिन आंवले के वृक्ष की खासतौर पर पूजा की जाती है हालांकि इस बार आंवला नवमी की तिथि को लेकर थोड़ी कफ्यूंजन है। कुछ लोगों का कहना है कि आंवला नवमी 30 की है वहीं कुछ लोगों का कहना है कि 31 अक्टूबर को आंवला नवमी है।

    31 अक्टूबर को मनाई जाएगी आंवला नवमी

    हिंदू पंचागों के अनुसार, नवमी तिथि 30 अक्टूबर सुबह 10:06 बजे से शुरु होगी और 31 अक्टूबर में सुबह 10:03 बजे खत्म होगी। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, अक्षय नवमी का पर्व 31 अक्टूबर को मनाया जाएगा।

    शुभ योग और मुहूर्त

    हिंदू पंचागों के अनुसार, इस बार अक्षय नवमी पर वृद्धि योग और रवि योग जैसे कई शुभ योग बने रहे हैं। 31 अक्टूबर को वृद्धि योग सुबह 6:17 बजे से पूरे दिन तक रहेगा। रवि योग भी सारा दिन रहेगा। इसके साथ ही शिववास योग भी इस दिन बन रहा है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा, दान और उसके नीचे खाना खाने से अक्षय पुण्य मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चचना की जाती है।

    आंवला नवमी से जुड़ी पौराणिक कथा

    पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा और उसके नीचे खाना खाने की परंपरा मां लक्ष्मी ने शुरु की थी। एक बार लक्ष्मी जी जब पृथ्वी पर भ्रमण करने के लिए आई थी तब उनके मन में भगवान विष्णु और भगवान शिव की संयुक्त पूजा करने का विचार मन में आया लेकिन उन्हें यह संशय भी हुआ कि दोनों देवों की एक साथ पूजा कैसे होगी। तभी उन्हें यह याद आया कि तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और बेलपत्र भगवान शंकर को। दोनों के गुण आंवला के पेड़ में मौजूद होते है इसलिए उन्होंने आंवले के पेड़ को विष्णु और शिव दोनों का प्रतीक मानकर उसका पूजन किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और भगवान शिव वहां पर प्रकट हुए। इसके बाद में माता लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर खाना बनाया और दोनों देवताओं को भोग लगाया। इसके बाद उन्होंने खुद भी भोजन ग्रहण किया। तभी से अक्षय नवमी पर आंवले के वृक्ष की पूजा और उसके नीचे खाना करने की धार्मिक परंपरा चली आ रही है।
  • इस दिन पड़ेगी Kartik Purnima की तिथि, गंगा स्नान के लिए शुभ रहेगा ये समय

    इस दिन पड़ेगी Kartik Purnima की तिथि, गंगा स्नान के लिए शुभ रहेगा ये समय

    धर्म: हिंदू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा की तिथि बहुत ही पवित्र मानी जाती है। यह तिथि कार्तिक महीने के अंतिम दिन में पड़ती है। इस दिन को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं। इसका मुख्य कारण है कि इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान शिव की पूजा अर्चना भी की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने तीन असुरों का नाश इसी दिन किया था। यह तीनों असुर अलग-अलग लोकों में आतंक मचाते थे। त्रिपरों के नाश के बाद शिवजी की महिमा और पूजा का महत्व और भी ज्यादा बढ़ गया और यह दिन त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से मशहूर हो गया।

    गंगा स्नान का है खास महत्व

    कार्तिक पूर्णिमा वाले दिन गंगा स्नान बहुत ही पवित्र माना जाता है। इस महीने में भी गंगा स्नान से सारे पाप दूर होते हैं और व्यक्ति को मोक्ष मिलता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन स्वर्ग से देवी-देवता भी स्नान करने के लिए धरती पर आते हैं। इसके साथ ही इस दिन दीवाली भी मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि देवता धरती पर आकर दीप जलाते हैं और असुरों पर विजय प्राप्त करने की खुशी मनाते हैं।

    5 नवंबर को मनाई जाएगी कार्तिक पूर्णिमा

    इस बार कार्तिक पूर्णिमा 5 नवंबर को मनाई जाएगी। तिथि की शुरुआत 4 नवंबर को रात में 10:36 पर होगी और अगले दिन 5 नवंबर को शाम 6:48 तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 5 नवंबर को सूर्योदय के बाद तक बनी रहेगी इसलिए 5 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा मनाई जाएगी।

    गंगा स्नान का शुभ मुहूर्त

    गंगा स्नान का मुहूर्त सुबह 4:52 से लेकर 5:22 तक रहेगा। वहीं पूजा का मुहूर्त सुबह 7:58 से लेकर सुबह 9:20 तक रहेगा। प्रदोषकोल देव दीवाली का मुहूर्त शाम 5:15 बजे से लेकर रात 7:15 तक रहेगा। वहीं चंद्रोदय का समय शाम 5:11 बजे होगा।

    इसी दिन मनाई जाएगी गुरुनानक देव जयंती

    इसके अलावा कार्तिक पूर्णिमा वाले दिन सिक्खों के पहले गुरु गुरुनानक देव जी का जन्म हुआ था। सिख धर्म में यह दिन बहुत ही खास होता है। इस दिन सिख समुदाय के लोग गुरुद्वारों में अरदास करते हैं, कीर्तन करते हैं औऱ भगवान का नाम जपते हैं।
  • Bhai Dooj पर सिर्फ इतने मिनट तक रहेगा शुभ मुहूर्त, इस विधि के साथ करें तिलक

    Bhai Dooj पर सिर्फ इतने मिनट तक रहेगा शुभ मुहूर्त, इस विधि के साथ करें तिलक

    धर्म: कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि वाले दिन हर साल भाई दूज का त्योहार मनाया जाता है। इस बार भाई दूज का त्योहार 23 अक्टूबर को मनाया जाएगा। भाई दूज को यम द्वितीया, भाऊ बीज और भतरु द्वितीया जैसे नाम से भी जाना जाता है। इस पावन त्योहार वाले दिन बहनें अपने भाईयों का टीका करती हैं और उनकी लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती है। इसके बाद भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं। द्रिक पंचागों के अनुसार, इस बार भाई दूज पर राहु काल की अशुभ छाया रहने वाली है। माना जाता है कि राहु काल में कोई भी शुभ काम करना अच्छा नहीं माना जाता है।

    मुहूर्त के लिए रहेगा यह शुभ समय

    पंचाग के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितिया तिथि 23 अक्टूबर की रात 10:46 मिनट तक रहेगी। तिलक और पूजा का सबसे शुभ समय दोपहर 1:13 बजे से लेकर 3:28 तक रहेगा। ऐसे में इस साल भाई दूज पर बहनों के पास सिर्फ 2 घंटे 15 मिनट का शुभ अवसर होगा। इस बार भाई दूज पर आयुष्मान योग बन रहा है। यह योग 24 अक्टूबर सुबह 5:00 बजे तक रहेगा। इसी दिन शिववास योग भी बन रहा है। यह योग 23 अक्टूबर की रात 10:46 बजे तक रहेगा।

    इस विधि से करें तिलक

    भाई को चौकी पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बिठाएं। फिर भाई के माथे पर रोली या चंदन का तिलक करें और अक्षत लगाएं। अब भाई के हाथ में कलावा बांधे और उन्हें मिठाई खिलाएं। इसके बाद घी का दीपक जलाकर भाई की आरती करें और उसकी लंबी उम्र की कामना करें। अंत में भाई बहन के पैर छूकर उसका आशीर्वाद लें और उन्हें उपहार दें। भाई की आरती उतारते समय बहन को थाली में सिंदूर, फूल, चावल के दाने, सुपारी, पान का पत्ता, चांदी का सिक्का, नारियल, फलमाला, मिठाई, कलावा, दूर्वा घास और केला जरुर रखें। इन सब चीजों के बिना भाई दूज का पर्व अधूरा ही माना जाता है।

    भाई दूज की कथा

    मान्यताओं के अनुसार, इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे। देवी यमुना ने उनका बहुत अच्छे से आदर-सत्कार किया था। उन्हें स्वादिष्ट भोजन करवाया था और उनके माथे पर तिलक लगाया था। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें यह वरदान दिया कि आज के दिन जो भी भाई अपनी बहन के घर जाकर तिलक करवाएगा उसे अकाल मृत्यु का डर नहीं होगा और उसकी उम्र लंबी होगी। इसी कारण से इस पर्व को यम द्विताया भी कहते हैं। इस दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि के लिए उपवास रखती है और तिलक लगाती है। भाई भी बहन को तोहफा देते हैं और उनको सदैव रक्षा का वादा करते हैं।  
  • कल इस शुभ मुहूर्त में मनाई जाएगी Govardhan Puja, जानें पूजा का महत्व

    कल इस शुभ मुहूर्त में मनाई जाएगी Govardhan Puja, जानें पूजा का महत्व

    धर्म: कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की प्रतिपद तिथि वाले दिन गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। पंचागों के अनुसार, अमावस्या तिथि के कारण यह पूजा 22 अक्टूबर को मनाई जाएगी। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, गोवर्धन पूजा अमावस्या की तिथि में करना बहुत ही अशुभ मनाई जाती है। इस पर्व के लिए प्रतिपदा तिथि का लगना बहुत ही जरुर माना जाता है हालांकि हर साल गोवर्धन पूजा दीवाली के अगले दिन की जाती है। ऐसे में यह त्योहार चौथे दिन मनाया जाता है। ऐसे में आपको बताते हैं कि गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है।

    शुभ मुहूर्त

    द्रिक पंचागों के अनुसार, हर साल कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि वाले दिन गोवर्धन पूजा का त्योहार मनाया जाता है। इस बार यह त्योहार की तिथि 21 अक्टूबर यानी की आज शाम 5:54 मिनट पर शुरु होगी और तिथि का समापन 22 अक्टूबर की रात 8:16 मिनट पर होगा। ऐसे में पूजा का पहला मुहूर्त 22 अक्टूबर में सुबह 6:26 से शुरु होकर सुबह 8:42 तक रहेगा। दूसरा मुहूर्त दोपहर में 3:29 मिनट से शुरु होकर शाम को 5:44 मिनट तक रहेगा। पूजा का तीसरा मुहूर्त गोधूली वेला में बन रहा है जो कि शाम 5:44 मिनट से लेकर शाम 6:10 मिनट तक रहेगा। ऐसे में इन तीन मुहूर्तों में पूजा की जा सकती है।

    ऐसे करें पूजा

    इस दिन सुबह जल्दी उठकर अपने घर की साफ-सफाई करें। फिर गाय के गोबर के साथ गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाएं। इसमें छोटे-छोटे टीले बनाकर गाय, बछड़े, पेड़-पौधे और तालाब जैसी आकृतिक बनाएं। यह प्रकृति और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं। इसके बाद पूजा स्थान तैयार करें और दीपक जलाकर भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें। अब पूजा के लिए फूल, जल, अक्षत, मिठाई, तुलसी पत्र, दूध, दही, घी, गुड़ और अन्न जैसी वस्तुएं रखें। श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की विधि विधान के साथ पूजा करें। इसके बाद भगवान को अन्नकूट का भोग लगाएं। इस दिन तरह-तरह के व्यंजन जैसे कि पूड़ी, सब्जी, मिठाई, चावल और खीर आदि बनाकर अर्पित करें। मान्यताओं के अनुसार, जितना ज्यादा अन्न भगवान को अर्पित किया जाता है घर में उतनी ही ज्यादा समृद्धि आती है। पूजा के बाद गोवर्धन पर्वत के चारों और सात बार परिक्रमा करें और फिर श्रीकृष्ण की आरती करें। आरती के बाद सभी को प्रसाद बांटे। इस दिन गायों की पूजा करना भी बहुत ही शुभ माना जाता है।

    पूजा का महत्व

    यह पूजा बहुत ही पवित्र मानी जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र का घमंड तोड़ने के लिए गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी सी उंगली पर उठाया था। इस पूजा से यह संदेश मिलता है कि अंहकार का अंत होता है और प्रकृति तथा भगवान की कृपा ही सच्चा सहारा है। इस दिन गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक पूजा कर लोग अपनी कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
  • Diwali के बाद न करें ये काम, धन की देवी मां लक्ष्मी हो जाएगी नाराज

    Diwali के बाद न करें ये काम, धन की देवी मां लक्ष्मी हो जाएगी नाराज

    धर्म: दीवाली की रात पूरे साल की सबसे शुभ रात मानी जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां लक्ष्मी घरों में वास करती है। इससे सुख-समृद्धि का वास होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, दीवाली वाली रात मां लक्ष्मी घर-घर में भ्रमण के लिए निकलती हैं। जिस घर में सफाई, प्रकाश और श्रद्धा होती है मां लक्ष्मी उसी घर में वास करती है। इसी वजह से दीवाली से पहले घरों को पवित्र तौर पर साफ-सुथरा किया जाता है। इस रात मां लक्ष्मी की पूजा काफी श्रद्धा के साथ की जाती है परंतु उसके अगले दिन हमें ऐसी कोई गलती नहीं करनी चाहिए जिससे मां लक्ष्मी नाराज हो जाएं।

    मूर्तियां न हटाएं

    दीवाली की रात में मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापना पूरे विधि-विधान के साथ की जाती है। ऐसे में पूजा के दौरान घर का वातावरण भक्ति, प्रकाश और पॉजिटिविटी से भर जाता है परंतु अक्सर लोग पूजा खत्म होने के बाद मूर्तियां हटा देते हैं या फिर उन्हें वापिस से रख देते हैं परंतु यह बहुत बड़ी गलती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा के तुंरत बाद मूर्तियां हटाना या उन्हें अस्त-व्यस्त करना अशुभ हो जाता है।

    झगड़ा या नेगेटिव बातें न करें

    दीवाले के अगले दिन घर का माहौल शांत और शुभ रखना बहुत जरुरी होता है। इस दिन गुस्सा, झगड़ा या नेगेटिव बातें करने से पॉजिटिव एनर्जी पर असर होता है। ऐसा माना जाता है कि मां लक्ष्मी वहीं रहती है जहां पर खुशहाली हो।

    टूटे या पुराने दीपक न फेंके

    पूजा में इस्तेमाल करने वाले दीपक, कलश या फिर सजावट का पवित्र समान कूड़े में न फेंके। सामान को किसी पेड़ के नीचे, नदी या फिर साफ जगह पर प्रवाहित कर दें। ऐसा करने से पवित्रता बनी रहेगी और मां लक्ष्मी जी की कृपा भी आपके परिवार पर बनेगी।

    तुंरत न बुझाएं दीपक

    मां लक्ष्मी के अनुष्ठान में घर में जलाने वाली अखंड ज्योति मां लक्ष्मी के स्वागत का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में सुबह होते ही इस दीपक को एकदम से न बुझाएं। ऐसा करना अशुभ माना जाता है। दीपक को खुद ही बुझने दें। इससे घर में सुख और शांति बनी रहेगी।

    पूजा स्थान रखें साफ

    दीवाली की पूजा के बाद यदि आपके पूजा स्थान में दीप, फूल या प्रसाद बिखरा हो तो यह लापरवाही का प्रतीक है। ऐसे में पूजा स्थान को साफ रखें और फिर से भगवान को प्रणाम करें। इससे शुभ फल लंबे समय तक बना रहेगा।

    बाहर न फेंके कूड़ा कचरा

    दीवाली वाली रात घर की सफाई और दीपमाला से वातावरण पवित्र हो जाता है ऐसे में अगले दिन सुबह झाड़ू लगाकर कूड़ा बाहर निकालना अशुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे मां लक्ष्मी का निवास भंग होता है और इसका असर सुख-समृद्दि पर होता है। दीवाली के बाद यदि आप सफाई करना चाहते हैं तो दोपहर के बाद ही करें।
  • इस दिन मनाई जाएगी नरक चतुदर्शी, यम का दीपक जलाते हुए रखें इन बातों का ध्यान

    इस दिन मनाई जाएगी नरक चतुदर्शी, यम का दीपक जलाते हुए रखें इन बातों का ध्यान

    धर्म: नरक चतुदर्शी को छोटी दीवाली, रुप चौदस जैसे कई तरह के नामों से जाना जाता है। वैसे तो नरक चतुर्दशी दीवाली से एक दिन पहले मनाई जाती है लेकिन इस साल तिथि का ऐसा संयोग बन रहा है जिसको नरक चतुर्दशी और दीवाली एक ही दिन मनाई जाएगी।

    20 अक्टूबर को मनाई जाएगी नरक चतुर्दशी

    20 अक्टूबर को नरक चतुदर्शी रहेगी और इसी दिन दीवाली भी मनाई जाएगी। चतुर्थी तिथि की शुरुआत 19 अक्टूबर 1:51 पर होगी और 20 अक्टूबर दोपहर 3:44 तक रहेगी। इस दिन स्नान सूर्योदय से पहले किया जाता है। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, 20 अक्टूबर को ही नरक चतुर्दशी मनाई जाएगी।

    इस समय जलेगा यम का दीपक

    यम दीपक कुछ लोग धनतेरस वाले दिन जलाते हैं तो कुछ लोग दीवाली से एक दिन पहले जलाते हैं। ऐसे में आप अपनी परंपरा का पालन करते हुए यम का दीप जला सकते हैं। यदि आप धनतेरस वाले दिन यम का दीपक जलाते हैं तो 18 अक्टूबर को रात में जलाएं और यदि आप दीवाली से एक दिन पहले यम का दीपक जलाते हैं तो 19 अक्टूबर को यम का दीपक जलाएँ। नरक चतुर्दशी को मनाने के लिए भी कई पौराणिक कथाएं मशहूर है परंतु इस दिन यम दीप जलाने का खास महत्व बताया गया है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन यमराज के नाम का दीपक जलाने से परिवार में अकाल मृत्यु का डर नहीं रहता और नेगेटिव एनर्जी दूर होती है परंतु यम का दीपक जलाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरुरी है।

    इन नियमों का रखें ध्यान

    सही दिशा और विधि

    शास्त्रों के अनुसार, इस दीप को जलाने के कुछ नियम और दिशाएं बताई गई हैं। इसके अनुसार, यम का दीपक हमेशा दक्षिण दिशा में जलाना चाहिए क्योंकि यह दिशा यमराज की मानी जाती है। इसके साथ ही यह ध्यान रखें कि दीया या तो मिट्टी का हो या आटे से बना हो। दीया हमेशा सरसों के तेल से ही जलाएं।

    साफ जगह पर रखें

    यम का दीप जलाने के बाद पहले इसको सारे घर में घुमाएं। फिर घर के बाहर इसको किसी दक्षिण दिशा वाली सगह पर रखें। दीपक रखते समय आप ध्यान रखें कि यहां भी इसको रखें वो जगह शुद्ध और पवित्र हो।

    14 दीपक जलाएं

    नरक चतुर्दशी वाले दिन यम दीप जलाने के अलावा 14 अन्य दीपक भी जलाने चाहिए। इससे आपके घर के अलग-अलग जगह जैसे पूजाघर, रसोई, पीने के पानी वाली जगह पर, तुलसी के पास, मुख्य द्वार, छत और बाथरुम पर जलाएं। ये दीप घर में जलाने बहुत शुभ माने जाते हैं।

    चौमुखी दीपक

    यम दीप हमेशा चार मुख वाला ही जलाएं। इसमें चार बाती लगाएं। यम दीप की चार बातियों चार दिशाओं में रोशनी फैलने का प्रतीक मानी जाती हैं। इस दीपक को जलाने से यम देव खुश होते हैं। यम देव अकाल मृत्यु और गंभीर संकटों से परिवार की रक्षा करते हैं। यम दीप जलाने से पितृ भी प्रसन्न होते हैं।