Category: Spiritual
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आखिर किस दिन मनाई जाएगी दीवाली? जानें दीप उत्सव की सही तारीख
धर्म: दीवाली हिंदुओं का प्रमुख त्योहार मानी जाती है। इसको दीपावली या दीप उत्सव के तौर पर भी जाना जाता है। यह अंधकार पर प्रकाश की जीत और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक मानी जाती है। इस साल दीवाली 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी। हिंदू पंचाग के अनुसार, हर साल कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि वाले दिन यह त्योहार मनाया जाता है। -

संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है अहोई अष्टमी का व्रत, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त
धर्म: इस समय हर जगह दीवाली की तैयारियां चल रही हैं। भारतीय पंचाग के मुताबिक, कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की तिथि बहुत ही खास मानी जाती है। इस दिन अहोई माता का व्रत रखा जाता है। इस बार यह व्रत 13 अक्टूबर को रखा जाएगा। इस साल कार्तिक मास की कृष्ण अष्टमी तिथि 13 अक्टूबर दोपहर 12:24 मिनट पर शुरु होगी और इसका समापन 14 अक्टूबर 11:09 मिनट पर होगा। ऐसे में 13 को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाएगा। भारतीय हिंदू महिलाओं के लिए यह दिन बहुत ही खास होता है क्योंकि माताएं इस दिन अपने बच्चों की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत रखती हैं। शाम के समय तारों को अर्घ्य देने के बाद यह व्रत खोल दिया जाता है।संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है व्रत
यह व्रत बहुत ही खास माना जाता है। इस व्रत को करने से संतान खुशहाल रहती है और उम्र भी लंबी होती है। हर तरह के रोगों से भी उसकी रक्षा होती है। इस व्रत को करने से घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है और बच्चे करियर में खूब तरक्की करते हैं। यह व्रत सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक रखा जाता है और इस दौरान अन्न और जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता। तारों को जल देने के बाद यह उपवास खोला जाता है।पूजा का शुभ मुहूर्त
इस दिन पूजा के लिए शुभ मूहूर्त शाम 5:33 से लेकर 7:08 तक रहेगा। मुहूर्त की कुल अवधि 1 घंटे 15 मिनट की होगी। इस दौरान तारों का दर्शन करके व्रत का पारण शाम को 6:28 मिनट से शुरु हो जाएगा। चंद्रोदय का समय रात 11:40 मिनट पर है। कुछ स्थानों पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा है।अहोई माता की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, अहोई माता का रुप नेवला के तौर पर दर्शाया गया है। ऐसा कहा जाता है कि पुराने समय में एक महिला जो अपने पुत्रों की मां थी वो जंगल में मिट्टी खोदते समय गलती से साही के बच्चों को मार देती है। इसके बाद वह महिला देवी से क्षमा याचना करती है। उसकी तपस्या से खुश होकर देवी उसको आशीर्वाद देती है कि उसकी संतान सुरक्षित रहेगी। तभी से माताएं अहोई माता की पूजा करके अपनी संतान को लंबी उम्र और कल्याण की कामना करती है। -

Karwachauth पर इस बार बन रहा खास संयोग, जानें चंद्रमा को अर्घ्य देने का सही समय
धर्म: हर साल की तरह इस बार भी करवाचौथ के त्योहार को लेकर महिलाएं बहुत उत्साहित हैं। इस बार यह व्रत 10 अक्टूबर यानी की कल रखा जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। इस दिन शादीशुदा महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए उपवास रखती हैं। कई जगह कुंवारी कन्याएं भी अच्छे पति की कामना के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस तिथि पर व्रत रखने से वैवाहिक जीवन की सभा बाधाएं दूर होती हैं।करवा चौथ पर बन रहे शुभ संयोग
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, माता सती ने भगवान शिव के लिए यह व्रत रखा था। इसके अलावा इस तिथि कि संबंध भगवान गणेश के साथ भी है इसलिए करवाचौथ वाले दिन भगवान गणेश, मां गौरी और चंद्रमा की पूजा की जाती है। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, इस बार करवा चौथ बहुत ही खास माना जा रहा है क्योंकि कई सारे शुभ संयोग इस दिन बनने वाले हैं। करवा चौथ की तिथि 9 अक्टूबर 10:54 मिनट पर शुरु होगी और इसका समापन 10 अक्टूबर को शाम 7:37 पर होगा। उदयातिथि के अनुसार, करवा चौथ 10 अक्टूबर को मनाया जाएगा।चांद निकलने का समय
इस बार करवा चौथ पर चंद्रोदय का समय 8:14 मिनट से शुरु होगा। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, इस बार करवाचौथ पर सिद्धि योग और शिववास योग बन रहा है। सिद्धि योग और शिववास योग करवा चौथ पर 200 साल के बाद एक साथ बन रहे हैं।सिद्धि योग का महत्व
पंचांग के अनुसार, इस दिन सिद्धि योग शाम 5:41 मिनट तक रहेगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, करवा चौथ की तिथि पर यह योग बनना बहुत ही शुभ माना जाता है। यह योग किसी भी काम में सफलता और सिद्धि दिलवाने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। इस योग में की गई पूजा और साधना खासतौर पर फलदायी मानी जाती है। माना जा रहा है कि करवाचौथ वाले दिन सिद्धि योग में व्रत रखने और पूजा करने से व्रत का पूर्ण फल मिलेगा।शिववास योग का महत्व
इस बार करवाचौथ पर शिववास योग भी बन रहा है। शिव वास का अर्थ है भगवान शिव का निवास। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब शिववास कैलाश पर होता है तो यह समय पूजा-पाठ, रुद्राभिषेक और व्रत के लिए बहुत खास माना जाता है। इस योग में पूजा करने से भगवान शिव और मां पार्वती का जल्दी आशीर्वाद मिलता है। -

Sharad Purnima पर आखिर क्यों रखी जाती हैं चांद की रोशनी में खीर? जानें
धर्म: सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा का खास महत्व बताया गया है। ऐसा मान्यता है कि इस दिन चंद्र देव अपनी 16 कलाओं से युक्त होते हैं और अमृत वर्षा करते हैं। इसलिए इस दिन चांद की रोशनी के नीचे खीर रखी जाती है। इससे अमृत की कुछ बूंदें खीर में गिर जाती है। कहा जाता है कि जो भी लोग इस अमृतमयी खीर का सेवन करते हैं उनके शरीर को भी कई चमत्कारिक फायदे होते हैं।इस समय रखें खीर
शरद पूर्णिमा वाले दिन खीर रखने का समय 6 अक्टूबर को रात 10:46 से शुरु होगा और 7 अक्टूबर 2025 की सुबह 6:17 मिनट तक खीर रखी जाएगी। खीर को पूरी रात के लिए चांद की रोशनी के नीचे छोड़ दें।ऐसे रखें खीर
इस दिन रात में दूध, चावल से बनी खीर चांद की रोशनी में रखने का विधान माना जाता है। आज के दिन दूध, चावल की खीर बनाकर एक बर्तन में रखकर उसको जालीदार कपड़े से ढक्कर चांद की रोशनी में रखें। अगली सुबह ब्रह्मामुहूर्त में श्री विष्णु को उस खीर का भोग लगाएं। भोग लगाने के तुरंत बाद सारी खीर पूरे परिवार में प्रसाद के तौर पर बांट दें। खीर 7 अक्टूबर 2025 की सुबह 6:17 मिनट के बाद खा लें। इसका सेवन स्नान करने के बाद ही करें।खीर रखने का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा वाले दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर अमृत वर्षा करते हैं। इसी वजह से इस दिन लोग आस-मान के नीचे खीर बनाकर रखते है इससे अमृत की कुछ बूंदें उनकी खीर में पड़ जाए। कहते हैं कि इस अमृत रुपी खीर का सेवन जो भी करे उसकी सेहत हमेशा अच्छी रहती है। शरद पूर्णिमा वाली खीर खाने से खास तौर पर चर्म रोगियों को बहुत फायदा होता है। इस खीर को जो भी कोई प्रसाद के रुप में खाता है उसके जीवन में पैसे की भी कमी नहीं होती। -

घर में चूहे कर रहे हैं आतंक? अपनाएं ये सस्ता और असरदार घरेलू उपाय
नई दिल्लीः घर में चूहों के आतंक से परेशान है तो अब परेशान होना बंद कर दें। वैसे तो बाजार में चूहे मारने वाले कई प्रॉडक्ट मिलते हैं। लेकिन अगर आप प्राकृतिक तरीका ढूंढ कर इन्हें भगा भी सकते है। इसके लिए आपको एक बिस्किट और कुछ आम रसोई के सामान की जरूरत होगी। इसके लिए आपको एक बिस्किट मीठा या नमकीन, बेकिंग सोडा, विनेगर व सरसों का तेल चाहिए।सबसे पहला कामः एक बिस्टिक लेकर उसपर लगभग आधा चम्मच बेकिंग सोडा डालें और बिस्किट की शेप में घोल-घोल घुमाते हुए फैला दें। इसके बाद विनेगर की कुछ बूंदें डालें, जिससे हल्का झाग बनेगा। आखिरी में थोड़ा सा सरसों का तेल डालकर इसे भी फैला दीजिए। यहां तेल की खुशबू चूहों को बिस्किट की तरफ अट्रैक्ट करेगी और बाकी सामग्री अपना काम करेगी।कैसे करना है इस्तेमालः तैयार बिस्किट को घर के उन कोनों, दरारों, किचन के निचले हिस्सों, या उन रास्तों के पास रखें जहां चूहों का आना-जाना सबसे अधिक होता है। कोशिश करें कि बिस्किट को ऐसी जगह पर रखें जहां बच्चों या पालतू जानवरों की सीधी पहुंच न हो, हालांकि यह इसमें कोई पॉइजन नहीं नहीं है, फिर भी सावधानी जरूरी है।यह उपाय चूहों को मारने के बजाय उन्हें दूर भगाने के लिए है इससे चूहे मरने पर बदबू की दिक्कत नहीं होगी। जब चूहा इस बिस्किट को खाता है, तो बेकिंग सोडा उसके पेट में पहुंचता है। बेकिंग सोडा पेट के एसिड के साथ मिलकर गैस बनाता है, जिससे चूहे को असहजता महसूस होती है और वह बेचैन होकर घर से बाहर की ओर भागते हैं। यहां विनेगर और सरसों का तेल चूहों को अट्रैक्ट करने का काम करता है। -

इस दिन मनाई जाएगी Valmiki Jayanti, जानें कौन थे महार्षि वाल्मीकि?
धर्म: अश्विन महीने की पूर्णिमा तिथि का खास महत्व है। इस दिन शरद पूर्णिमा भी होती है और महार्षि वाल्मीकि जयंती भी मनाई जाती है। वाल्मीकि जी ने हिंदू धर्म के सबसे जरुरी महाकाव्यों में से एक रामायण की रचना की थी। महार्षि वाल्मीकि को ही संसार का पहला महाकवि माना जाता है। इस बार वाल्मीकि जयंती की तारीख को लेकर लोगों में थोड़ी कंफ्यूजन है।7 अक्टूबर को मनाई जाएगी वाल्मीकि जयंती
हिंदू पंचागों के अनुसार, इस बार अश्विन पूर्णिमा की तिथि सोमवार 6 अक्टूबर को दोपहर 12:24 पर शुरु होगी। मंगलवार 7 अक्टूबर सुबह 9:17 मिनट पर तिथि का समापन होगा। ऐसे में 6 और 7 अक्टूबर दोनों ही दिन आश्विन महीने की पूर्णिमा का संयोग बन रहा है परंतु पूर्णिमा तिथि का व्रत 6 अक्टूबर को किया जाएगा ऐसे में वाल्मीकि जंयती 7 अक्टूबर को मनाई जाएगी।राम-राम नाम का जाप करने से बदला था जीवन
रामायण के रचयिता महार्षि वाल्मीकि का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था परंतु उन्होंने छोटी उम्र में ही घर छोड़कर वैराग्य जीवन अपना लिया था। लोक कथाओं के अनुसार, एक दिन वे महार्षि नारद जी के साथ मिले। नारदजी ने उनको आत्मज्ञान और सत्य का रास्ता दिखाया। नारदजी ने उनको राम-राम नाम का जाप करवाया। इसके बाद से उनका जीवन बदल गया।आदिकवि के तौर पर जाने जाते हैं महार्षि वाल्मीकि
वाल्मीकि जी ने भगवान श्रीराम के जीवन, संघर्ष, आदर्श और धर्म की स्थापना की कथा को महाकाव्य रामायण के रुप में लिखा। आगे चलकर जब माता सीता को वनवास मिला तब वाल्मीकि जी ने उन्हें अपने आश्रम में स्थान दिया था। उनके दोनों पुत्रों लव और कुश का जन्म भी इसी आश्रम में हुआ और उन्होंने ही वाल्मीकि जी से रामायण का ज्ञान प्राप्त किया था। रामायण में करीबन 24,000 श्लोक हैं। यह संस्कृत के सबसे प्राचीन महाकाव्यों में से एक है। महार्षि वाल्मीकि जी को महाकवि भी कहते हैं। -

दशहरे वाले दिन इस समय किया जाएगा रावण दहन, जानें पूजा विधि और महत्व
नई दिल्ली: भारत देश में हर त्योहार बहुत धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हर त्योहार का एक आध्यात्मिक संदेश होता है। इस साल दशहरा का पर्व 2 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। यह पर्व बुराई पर अच्छाई का प्रतीक माना जाता है। हिंदू पंचागों के अनुसार, यह त्योहर हर साल अश्विन महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि वाले दिन मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम ने रावण पर विजय पाई थी। इसके अलावा मां दुर्गा ने भी महिषासुर का वध करके धरती को राक्षसों से मुक्ति दिलवाई थी इसलिए इस दिन भगवान राम और मां दुर्गा की खास पूजा की जाती है। रावण दहन का शुभ मुहूर्त और शस्त्र पूजा की सही विधि क्या है।रावण दहन का शुभ समय
दशमी तिथि की शुरुआत 1 अक्टूबर 2025 को शाम 7:01 से हो रही है और इसका समापन 2 अक्टूबर 2025 को शाम 7:10 मिनट पर होगी। ऐसे में इस दिन शस्त्र पूजा का मुहूर्त 2 अक्टूबर 2025 को दोपहर 2:09 मिनट से लेकर 2:56 मिनट तक है। इसकी अवधि 47 मिनट तक होगी। अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1:21 मिनट से लेकर 3:44 तक का है। रावण दहन का शुभ मुहूर्त 2 अक्टूबर 2025 प्रदोष काल के बाद शाम को लगभग 6:05 मिनट के बाद है।ऐसे करें पूजा
दशहरा का त्योहार तभी शुभ माना जाता है जब इसको सही मुहूर्त में मनाया जाए। इस दौरान आप शस्त्र पूजन, देवी पूजन और रावण दहन कर सकते हैं। इस समय पूजन और दहन करने से व्यक्ति के जीवन में विजय, धन और समृद्धि लेकर आता है। इस दिन पूजा स्थल और जिन शास्त्रों की पूजा करनी है उन्हें अच्छे से साफ कर लें। इसके बाद सभी पूजा करने वाली चीजों को एक साफ लाल कपड़े में रखकर उस पर गंगाजल छिड़क कर उसको शुद्धिकरण करें। शस्त्रों पर हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक लगाएं और फिर उन पर फूल या माला अर्पित करें। उन पर दीए या अगरबत्ती जलाएं। फिर शमी के पत्ते, अक्षत और मिठाई का भोग लगाएं।पर्व का महत्व
दशहरा सिर्फ रावण दहन तक सीमित नहीं है। इससे यह भी सीख मिलती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएं आएं। यदि आप सत्य और धर्म के मार्ग पर चलेंगे तो विजय की प्राप्ति जरुरी होगी। इसी वजह से विजयदशमी का त्योहार हर साल लोगों की नई प्रेरणा देता है। -

इस दिन मनाई जाएगी शरद पूर्णिमा, जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
धर्म: हर साल अश्विन महीने की पूर्णिमा तिथि वाले दिन शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। इसको अश्विन पूर्णिमा, कोजगारी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं की मानें तो यह दिन साल की सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में से एक माना जाता है। शास्त्रों की मानें तो इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होकर आकाश में आते हैं। ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात में चंद्रमा की चांदनी अमृतयमयी होती है और इसमें दिव्य औषधीय गुण समाए होते हैं।6 अक्टूबर को मनाई जाएगी शरद पूर्णिमा
हिंदू पंचागों के अनुसार, अश्विनी महीने की पूर्णिमा तिथि 6 अक्टूबर 2025 को दोपहर 12:23 मिनट पर शुरु होगी और इसका समापन अगले दिन 7 अक्टूबर को सुबह 9:16 पर होगा। द्रिक पंचाग के अनुसार, इस बार शरद पूर्णिमा का त्योहार 6 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन चंद्रोदय का समय शाम 5:27 पर होगा।मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा
इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे पास होते हैं। मान्यताओं के अनुसार, रात के समय यदि चांद की रोशनी में दूध या खीर रखी जाए तो उसमें अमृत के गुण आ जाते हैं और इसको ग्रहण करने से व्यक्ति का शरीर निरोगी रहता है और रोगों से भी मुक्ति मिलती है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करना बहुत ही शुभ माना जाता है। पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि, धन-धान्य और सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।ऐसे करें पूर्णिमा पर पूजा
इस दिन सुबह उठकर नहाएं और घर की साफ-सफाई करें। घर के मंदिर या पूजा स्थान को गंगाजल के साथ शुद्ध करें। फिर पूजा सामग्री तैयार करें। एक चौकी पर लाल या पीला रंग का साफ कपड़ा डालें। इस पर मां लक्ष्मी या भगवान विष्णु की प्रतिमा रखें। धूप-दीप जलाकर पूजा शुरु करें। मां लक्ष्मी को कमल का फूल, सफेद कपड़े और मिठाई अर्पित करें। शरद पूर्णिमा की रात आंगन या छत पर खीर बनाकर रखें। चंद्रमा की चांदनी में रखी हुई यह खीर अमृतयमयी हो जाती है और इसको खाने से कई रोगों से छुटकारा मिलता है। -

नवरात्रि में 9 दिन तक न करें ऐसी गलतियां, पूजा के नियमों का रखें ध्यान
धर्म: शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आज से हुो चुकी है। 2 अक्टूबर को दशहरा के साथ नवरात्रि का समापन होगा। नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है। ऐसे में इन 9 दिनों के दौरान कुछ खास बातों का ध्यान रखना बहुत जरुरी है। इन नियमों को नजरअंदाज करने से मां नाराज हो सकती है।ऐसे मंत्र का न करें जाप
इंटरनेट पर यदि आप कोई भी रील देखते हैं तो उससे प्राप्त वैदिक मंत्रों का जाप न करें। पुष्टि करने के बाद ही मां के किसी भी मंत्र का जाप करें।मां के पंडाल का करें दर्शन
नवरात्रि के दौरान यदि आपको गुरु मंत्र नहीं मिला है तो दुर्गा-दुर्गा नाम का जाप करें। इस दौरान घर के आस-पास यदि कोई माता रानी का पंडाल बना है तो उसमें भी जरुर जाएं और समय पर भगवती मां के रोज दर्शन भी करें।संकल्प लें
नवरात्रि के दौरान आप उतना ही संकल्प लें जितना आप पूरा कर सकते हैं। बाद में यदि आपके द्वारा लिया गया संकल्प पूरा नहीं हुआ तो आप पाप के भागीदार भी बन सकते हैं। ऐसे में नवरात्रि में सामान्य पूजा ही करें और पूजा के आसान से नियम अपनाएं।पुरुष रखें ध्यान
नवरात्रि में जो भी पुरुष मां भगवती के आराधना करते हैं उन्हें धोती पहननी चाहिए। पूजा करने से पहले आसन जरुर बिछाएं और धूप आदि का इस्तेमाल करें।ब्रह्मचर्य का करें पालन
नवरात्रि के नौ दिन तक बाल और नाखून न काटें। इस दौरान ब्रहमचर्य का पालन करें। नवरात्रि से जुड़े इन नियमों का पालन जरुर करें। -

नवरात्रि में मां दुर्गा को अर्पित करें गुड़हल का फूल, पूरी होगी सारी मनोकामनाएं
धर्म: शारदीय नवरात्रि कल से शुरु हो रहे हैं। नवरात्रि के नौ दिनों तक मां के नौ अलग-अलग रुपों की पूजा की जाती है। हर दिन का अपना खास महत्व होता है। नौ दिन का यह त्योहार पूरे भारत में बहुत धूमधाम के साथ मनाया जाता है। शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 22 सितंबर सोमवार से हो रही है। इस बार चतुर्थी तिथि दो दिन है ऐसे में नवरात्रि 10 दिनों तक मनाए जाएंगे।गुड़हल के फूल का खास महत्व
नवरात्रि में मां दुर्गा को लाल गुड़हल का फूल जलाया जाता है। लाल रंग साहस, शक्ति और एनर्जी का प्रतीक माना जाता है जो मां दुर्गा के स्वरुप से भी मिलता है। गुड़हल मां दुर्गा का प्रिय फूल माना जाता है। इसके अलावा यह मनोकामनाओं को पूरा करने, सफलता और समृद्धि दिलवाने वाला भी माना जाता है।इसलिए अर्पित किया जाता है फूल
. गुड़हल का फूल मां दुर्गा को अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। उन्हें जीवन में सफलता भी मिलती है। . मां दुर्गा को यह फूल अर्पित करने से घर में पॉजिटिविटी का संचार होता है और नेगेटिविटी दूर होती है। . यह फूल मां को अर्पित करने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में भक्तों को सफलता भी मिलती है। . गुड़हल का फूल प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता है इसलिए गुड़हल का फूल मां को अर्पित करने से व्यक्ति को सच्चा प्यार और सुख मिलता है। . यह फूल मां को अर्पित करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि, धन-धान्य और सौभाग्य भी बढ़ता है।ऐसे करें पूजा
नवरात्रि के दौरान पूजा का भी खास महत्व होता है। पहले दिन स्नान के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर व्रत-पूजा का संकल्प लें और ईशान कोण में पूजा के लिए चौकी रखें। अस पर पीले रंग का कपड़ा डालें। कपड़े के ऊपर सात तरह का अनाज रखें और कलश स्थापित करें। कलश में रक्षासूत्र बांधे और तिलक लगाएँ। फिर कलश में गंगाजल भरे। कलश में चावल, फूल, हल्दी, चंदन, सुपारी, रोली सिक्का, दूर्वा घास आदि डालें। अब ऊपर से 5 आम या फिर अशोक के पत्ते रखकर कलश को ढक दें। अब ढक्कन को अक्षत के साथ भरें और ऊपर सूखा नारियल रख दें। नारियल में पहले तिलक लगाकर रक्षासूत्र से लपेट लें। फिर कलश के पास अखंड ज्योति जलाएं। यह ध्यान रखें कि ज्योति नवमी तक जलती रहे।