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Operation Sindoor को हुआ एक साल, अब कैसी है भारत की तैयारी?

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Operation Sindoor को हुआ एक साल, अब कैसी है भारत की तैयारी?
नई दिल्ली: आज से ठीक एक साल पहले जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत की थी तो वह सिर्फ एक ही सैन्य जवाबी कार्रवाई नहीं थी बल्कि यह भारत की सुरक्षा नीति में आए एक बड़े बदलाव का प्रतीक था। पहलगाम की दुखद घटना में हमें यह सिखाया कि दुश्मन अब पुराने तरीकों से नहीं बल्कि हाईब्रेड और तकनीक आधारित तरीकों से हमला कर रहा है। पिछले 12 महीनों में भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों को सिर्फ आधुनिक ही नहीं बनाया बल्कि उन्हें पूरी तरह स्वदेशी रंग में रंग दिया है। अभी आज भी भारत की तैयारी पहाड़, बॉर्डर, पानी और हवा इन चारों मोर्चों पर ऐसी है कि दुश्मन के लिए सेंध लगाना अब लगभग नामुमिकन हो गया है। इस बदलाव का सबसे बड़ा आधार मेक इन इंडिया और युद्ध मैदान से मिली लर्निंग हैं जिन्होंने हमारी सेना को एक नई धार दी है। पहाड़ी युद्ध और सीमा सुरक्षा के मामले में पिछले एक साल ने जो सबसे सुधार हुआ है। वह स्वदेशी तकनीक का एकीकरण यानी इंटीग्रेशन ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने महसूस किया कि ऊंचे और कठिन इलाकों में इंसानी नजरों के साथ डिजिटल आंखों की जरुरत है। आज हमारी सीमाओं पर भारत में ही बने हुई तपस और आर्चर जैसे सशस्त्र ड्रोन चौबीसों घंटे निगरानी कर रहे हैं। दुगर्म चोटियों पर तैनात जवानों के लिए स्वदेशी इन्फैंट्री प्रोटेक्ट मोबिलिट व्हीकल बड़ी संख्या में भेजे गए हैं जो न सिर्फ बारुदी सुरंगों से सुरक्षित हैं बल्कि कठिन रास्तों पर भी तेजी से हमला करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा सेना ने अपनी तोपखाने को पूरी तरह बदल दिया है। अब हमारे पास K9-व्रज और धनुष जैसी स्वदेशी तोपें हैं जो ऊंचे पहाड़ों पर स्टीक निशाना लगाने में माहिर है। अब हमारी तैयारी केवल घुसपैठ रोकने की नहीं बल्कि दुश्मन की हरकत शुरु होने से पहले ही उसे खत्म करने में है।

वायु सेना

आस-मान में भारत की ताकत अब विदेशी विमानों के कलपुर्जों की मोहताज नहीं रही। ऑपरेशन सिंदूर से मिली सबसे बड़ी सीख यह थी कि युद्ध के समय अपने स्वदेशी हथियारों का स्टॉक होना कितना जरुरी है। पिछले एक साल में वायु सेना ने LCA तेजस और प्रचंड लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर के उत्पादन में रिकॉर्ड तेजी दिखाई है।

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