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Jalandhar News: श्रद्धालुओं ने दी अग्नि परीक्षा, 67 सालों से चल रही परम्परा, देखें वीडियो

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Jalandhar News: श्रद्धालुओं ने दी अग्नि परीक्षा, 67 सालों से चल रही परम्परा, देखें वीडियो

जालंधर, ENS: धार्मिक आस्था और भक्ति के संगम के साथ जालंधर के काजी मंडी इलाके में साउथ इंडियन वेलफेयर सोसायटी का 67वां वार्षिक अग्नि परीक्षा महोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया गया। इस उपलक्ष्य में बीते दिन मंदिर परिसर से विशाल और भव्य शोभायात्रा निकाली गई। वहीं रविवार को श्रद्धालुओं ने अंगारों पर चलकर अग्नि परीक्षा दी। इस दौरान मंदिर के आसपास मेले जैसा दृश्य बना रहा, जहां रंग-बिरंगी दुकानें सजी हुई देखने को मिली। 38 वर्षों से यहां सेवा कर रहे मंदिर के पुजारी कानाड़ी ने बताया कि मंदिर उनके बुजुर्गों के समय का है। मंदिर में स्थापित मां मारी अम्मा की दिव्य मूर्ति तमिलनाडु से लाई गई थी।

मंदिर की एक खास परंपरा है कि सुबह और शाम के समय जितने भी श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, उतनी ही बार मां की भव्य आरती की जाती है। प्रबंधक पलनी स्वामी के मुताबिक महोत्सव का मुख्य आकर्षण 10 मई को देखने को मिला। दरअसल, आज वार्षिक मेला और अग्नि परीक्षा हुई। यह अग्नि परीक्षा शाम 6 बजे से शुरू की गई। इस रोमांचक और आध्यात्मिक अनुष्ठान में श्रद्धालु नंगे पांव धधकते अंगारों पर चलते दिखें। इस दौरान श्रद्धालु सिद्धि विनायक गणपति मंदिर में नतमस्तक होकर दंडवत करते हुए अग्निकुंड की ओर बढ़ रहे थे। जैसे ही अग्निपरीक्षा का क्षण आया, कोई नाचते-गाते हुए उन अंगारों को पार कर गया, तो कोई अपने कलेजे के टुकड़े (बच्चे) को गोद में लेकर मां के आशीर्वाद की आस में धधकते पथ पर निकल पड़ा।

बता दें कि मारी अम्मा मेले के दौरान अग्निपरीक्षा देने वाले भक्तों के लिए कड़े नियम होते हैं। शरीर और मन की शुद्धि के लिए श्रद्धालु केवल सादा भोजन, फल या दूध का सेवन करते हैं। व्रत की शुरुआत में भक्तों के हाथ में पीला धागा या कंगन बांधा जाता है। अंगारों पर चलने से पहले पैरों पर हल्दी का पानी छिड़का जाता है, जो धार्मिक और वैज्ञानिक (एंटीसेप्टिक) दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। विद्वानों के अनुसार, इस दौरान दूध पिलाने का गहरा आध्यात्मिक महत्व है। दूध को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। भक्त अग्नि पर चलने से पहले या बाद में देवी को दूध अर्पित करते हैं, जो आत्मा की शुद्धि और समर्पण को दर्शाता है। धधकते अंगारों की ‘गर्मी’ को शांत करने के लिए दूध की ‘शीतलता’ का उपयोग प्रतीकात्मक और शारीरिक दोनों रूपों में किया जाता है।

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