रामलला मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी की जांच ने कई परतें खोल दी हैं। सूत्र बताते हैं कि दान की गिनती करने वाले कर्मचारी बेहद सुनियोजित तरीके से काम करते थे। गणना कक्ष में वे न तो बातचीत करते थे और न ही एक-दूसरे की ओर देखते थे, ताकि किसी को शक न हो। बाहर भी उनका व्यवहार ऐसा होता था मानो वे एक-दूसरे को जानते ही न हों।
जांच में सामने आया कि चोरी की प्रक्रिया पहले से तय रहती थी। नकदी निकालकर उसे बाथरूम या अन्य जगहों पर छिपाया जाता और बाद में सुरक्षा से बचाकर बाहर ले जाया जाता था। केवल पार्टी के मौकों पर ही उनके बीच घनिष्ठता दिखाई देती थी।
एक पूर्व बैंक कैशियर ने एसआईटी को बताया कि पहले सुरक्षा बेहद सख्त थी, गहन तलाशी, विशेष ड्रेस और कई स्तर की जांच के बाद ही गणना कक्ष में प्रवेश मिलता था। लेकिन बाद में इन व्यवस्थाओं में ढील दी गई। कैशियर ने यह भी दावा किया कि मंदिर परिसर में चार लोगों का विशेष प्रभाव था, चंपत राय, अनिल मिश्र, गोपाल राव और टिन्नू यादव। खासकर टिन्नू यादव का नाम लेने पर किसी भी जगह आने-जाने में रोक-टोक नहीं होती थी।
करीब 10×15 फीट के गणना कक्ष में 10 सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में नकदी और सिक्कों की गिनती होती थी। नकदी की छंटनी, गिनती और बंडलिंग की जाती थी, जबकि सिक्कों को अलग झोलों में रखा जाता था। कर्मचारियों को कई स्तर की सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता था, पुलिस तलाशी, हुंडी कार्यालय में जांच, उपस्थिति दर्ज कराना, मोबाइल और निजी सामान लॉकर में जमा करना और विशेष ड्रेस पहनना। इसके बाद ही प्रवेश मिलता था। पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी निगरानी में होती थी। गिनती पूरी होने के बाद नकदी का रिकॉर्ड दर्ज कर वाउचर तैयार किया जाता और फिर लोहे के कंटेनर में बैंक भेजा जाता था।

रामलला मंदिर केस: SIT ने खोले सुरक्षा ढील और अंदरूनी नेटवर्क के राज़
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