Category: Lifestyle

  • World Nature Conservation Day: प्रकृति को बचाना है तो इन बातों पर जरुर करें गौर

    World Nature Conservation Day: प्रकृति को बचाना है तो इन बातों पर जरुर करें गौर

    लाइफस्टाइल: अब के समय में पर्यावरण को बचाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रकृति का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। इससे पर्यावरण संकट में पड़ चुका है। ऐसे में सभी लोगों को अपनी आदतें सुधारने की जरुरत हैं ताकि इससे न हमारा लाइफस्टाइल बेहतर हो बल्कि प्रकृति को राहत भी मिले। आज वर्ल्ड नेचर कंर्सवेशन डे के मौके पर आपको 7 ऐसी आसान और असरदार आदतें बताते हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी में भी बदलाव लाएगी और धरती के लिए तोहफा बन जाएगी।

    बिजली बचाएं

    फोन, टीवी और लैपटॉप सभी की आदत बन चुकी है परंतु आज के समय में आपको यह संकल्प लेना पड़ेगा कि इसका जरुरत भर ही इस्तेमाल करें। ऐसा इसलिए क्योंकि इन सभी चीजों को चलाने के लिए बिजली का इस्तेमाल करना पड़ता है। हमारा जरुरत से ज्यादा इन चीजों को इस्तेमाल करने से ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ती है और बिजली का बिल भी बढ़ता है।

    लोकल और सीजनल फल ही खाएं

    सीजनल फल-सब्जी खाना सिर्फ सेहत के लिए ही अच्छा नहीं है बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी बेहद फायदेमंद है। लोकल प्रोड्यूस को ट्रांसपोर्ट करने में कार्बन उत्सर्जन कम होता है।

    टूथब्रश, स्ट्रॉ और शेविंग ऐसी करें इस्तेमाल

    बांस का टूथब्रश, स्टील का स्ट्रॉ और रेजर की रीफिल जैसे छोटे-छोटे बदलावों के जरिए हम बदलाव ला सकते हैं। इससे प्लास्टिक कचरा 50 फीसदी तक कम होगा।

    ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाएं

    इन दिनों लोग घरों में पौधे तो लगा लेते हैं लेकिन उनका ध्यान नहीं रख पाते। ऐसे में इस प्रयास के साथ की पौधों की देखभाल करनी है रोज एक पेड़ का ख्याल रखें। साल में कम से कम एक पौधा जरुर लगाएं। इससे हवा शुद्ध होगी और मानसिक स्वास्थ्य भी सुधरेगा।

    कपड़े का बैग करें इस्तेमाल

    हर बार जब आप सब्जी या ग्रॉसरी खरीदने के लिए जाएं तो एक कपड़े का बैग अपने साथ जरुर रखें। एक अनुमान के अनुसार, हर साल 5 ट्रिलियन प्लास्टिक बैग इस्तेमाल होते हैं। इससे नदियों, जंगलों और समुद्रों को नुकसान हो रहा है।

    पानी न करें बर्बाद

    5 मिनट से ज्यादा यदि आप नहाएंगे तो इसका अर्थ है कि करीबन 50 लीटर पानी बर्बाद हो रहा है। ऐसे में यदि आप शॉवर टाइम कम करेंगे तो हर महीने तक सैंकड़ों लीटर पानी बचेगा।

    ऐसे ब्रांड्स का करें चयन

    फास्ट फैशन का चलन इन दिनों पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन गया है। हर सैकेंड दुनियाभर में एक ट्रक कपड़ा कचरे में चला जाता है। ऐसे में कोशिश करें कि इस तरह के ब्रांड चुनें जो रिसायकल फैब्रिक इस्तेमाल करें या इनका उत्पादन कम करें।  
  • APJ Abdul Kalam: Missile Man के नाम से मशहूर हुए थे देश के पूर्व राष्ट्रपति, पुण्यतिथि पर PM ने दी श्रद्धांजलि

    APJ Abdul Kalam: Missile Man के नाम से मशहूर हुए थे देश के पूर्व राष्ट्रपति, पुण्यतिथि पर PM ने दी श्रद्धांजलि

    नई दिल्ली: भारत में मिसाइल मैन के नाम से पहचाने जाने वाले और देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दूल कलाम की आज पुण्यतिथि है। उनका निधन 27 जुलाई 2015 को मेघालय में हुआ था। जब वो भारती प्रबंधन संस्थान में छात्रों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान व्याख्यान देते समय उन्हें दिल का दौरा पड़ गया और उनका निधन हो गया। आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर आपको उनका बचपन का एक ऐसा सपना बताते हैं जिसके बारे में शायद बहुत से कम लोग जानते हैं।

    पायलट बनना चाहते थे पूर्व राष्ट्रपति

    डॉ. कलाम का बचपन से ही यह सपना था कि वो एक पायलट बनें और आसमान की बुलंदियों को छू लें परंतु उनका यह सपना अधूरा ही रह गया। अपने इस ख्वाब को पूरा करने के लिए उन्होंने देहरादून में वायुसेना की प्रवेश परीक्षा भी दी थी। परीक्षा तो उन्होंने अच्छे अंकों से पास कर ली लेकिन 25 उम्मीदवारों में से सिर्फ 8 को ही चुना जाना था और कलाम साहब का 9वां स्थान था। ऐसे में उनका सेलेक्शन ही नहीं हुआ। इस नाकामी ने उन्हें बहुत ही मायूस कर दिया था। उन्होंने अपनी किताब My Journey: Transforming Dreams into Actions में इसका जिक्र भी किया है। अपनी मायूसी के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और वो देहरादून से ऋषिकेश गए और स्वामी शिवानंद से मिले। उन्होंने उन्हें यह समझने में मदद की कि नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा है। स्वामी शिवानंद ने उन्हें बताया कि तुमने अनपी नियति को स्वीकार नहीं किया है इसलिए तुम इतने दुखी हो। अपने वर्तमान को स्वीकार करो और बिना किसी डर के अपने जीवन को जियो। जब तुम अपनी नियति को स्वीकार करते हो तो तुम एक नई ताकत पाते हो।

    फिर शुरु हुई मिसाइल मैन बनने की यात्रा

    इस मुलाकात के बाद अब्दुल कलाम को एक नई दिशा मिली। उन्हें समझ आ गया कि भले ही वे फाइटर पायलट नहीं बन पाए पर विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वे देश के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। बस यही से उनके मिसाइल मैन बनने की यात्रा शुरु हो गई। वे भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में शामिल हुए। बाद में भारत के मिसाइल कार्यक्रमों और परमाणु परीक्षणों में भी अहम भूमिका निभाई।

    2002 से 2007 तक रहे भारत के राष्ट्रपति

    डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम साल 2002 से 2007 तक भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे हैं। वो देश के उन गिने-चुने राष्ट्रपतियों में से एक रहे हैं जिन्हें राजनीतिक दलों और आम जनता दोनों का ही पूरा सम्मान मिला। उनका जीवन सादगीपूर्ण था और उन्होंने कभी किसी राजनीतिक मतभेज को अपने व्यवहार में नहीं आने दिया। बतौर वैज्ञानिक उन्होंने भारत के रक्षा अनुसंधान और मिसाइल कार्यक्रम को नई ऊंचाईयों पर पहुंचाया।

    युवाओं के लिए बने प्रेरणा

    पीएम नरेंद्र मोदी ने डॉ. कलाम की सोच को युवाओं के लिए मार्गदर्शक बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. कलाम के विचार और जीवन दर्शन देश के युवाओं को अच्छा नागरिक बनने और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी निभाने के लिए लगातार प्रेरित करता रहेगा। मोदी ने यह भी कहा है कि कलाम का सपना था कि भारत 2020 तक एक विकसित राष्ट्र बन जाए और उसी दिशा में आगे बढ़ने का हमारा कर्तव्य है।

    पीएम मोदी ने अर्पित की श्रद्धांजलि

    भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन के नाम से मशहूर है। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि पर पीएम मोदी ने रविवार को श्रद्धांजलि अर्पित की। पीएम ने कहा कि – डॉ. कलाम को एक प्रेरणादायक विचारक, महान वैज्ञानिक, मार्गदर्शक और सच्चे देशभक्त के तौर पर याद किया। उन्होंने कहा कि डॉ. कलाम के विचार आज भी देश के युवाओं को प्रेरित करते हैं और उन्हें मजबूत और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। एक्स पर पोस्ट शेयर करते हुए पीएम ने कहा कि – हमारे प्रिय पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि। उन्हें एक प्रेरणादायक दूरदर्शी, उत्कृष्ट वैज्ञानिक, मार्गदर्शक और महान देशभक्त के रुप में याद किया जाता है। राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा अनुकरणीय थी।  
  • Kargil Vijay Diwas: पाकिस्तान की घुसपैठ का भारत ने दिया था करारा जवाब

    Kargil Vijay Diwas: पाकिस्तान की घुसपैठ का भारत ने दिया था करारा जवाब

    जानें कारगिल युद्ध की पूरी कहानी

    नई दिल्ली: 26 जुलाई को कारगिल युद्ध को 26 साल पूरे हो गए हैं। इस दिन भारत को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में विजय मिली थी। आपको बता दें कि यहां पर कारगिल युद्ध लड़ा गया था वहां सर्दियों में तापमान माइनस 30 से माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है। सर्दियों के मौसम में यह इलाके खाली कर दिए जाते थे।

    इसका ही फायदा उठाकर पाकिस्तान ने घुसपैठ कर दी। इस घुसपैठ में पाकिस्तान की सेना ने भी मदद की थी। 3 मई को घुसपैठियों के दिखने की सूचना मिली जिसके बाद 5 मई 1999 को भारतीय सेना ने पेट्रोलिंग पार्टी को घुसपैठ वाले इलाके में भेज दिया। पेट्रोलिंग पार्टी जब घुसपैठ वाले इलाके में गई तो घुसपैठियों ने पांचों जवानों को मार दिया।

    सर्वोच्च बलिदान देने वाले जवानों के शव से बर्बरता भी की गई। घुसपैठिए लेह-श्रीनगर हाईवे पर कब्जा कर लेना चाहते थे ऐसे में वह लेह को बाकी हिंदूस्तान से काट देना चाहते थे। ऐसे में 9 मई को कारगिल जिले में पाकिस्तानी सेना का तोप का गोला गिरा और भारत के गोला बारुद डीपो को उड़ा दिया।

    इसके बाद 10 मई 1999 को द्रास, काकसर, बटालिक सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों को देखा गया। उस दौरान ये अंदाजा भी लगाया गया कि करीब 600 से लेकर 800 घुसपैठिए भारतीय चौंकियों पर कब्जा कर चुके हैं। 15 मई 1999 के बाद कश्मीर के अलग-अलग इलाकों से सेना को भेजने की शुरुआत हुई।

    26 मई को भारतीय वायुसेना ने घुसपैठियों पर जमकर बर्फबारी की थी। इसके बाद 27 मई को दो भारतीय लड़ाकू विमानों को पाकिस्तान की सेना ने मार गिराया। फ्लाइट लेफ्टिनेट के. नचिकेता को पाकिस्तान ने युद्धबंदी बना दिया।

    इसके बाद स्कवॉड्रन लीडर अजय अहूजा ने सर्वोच्च बलिदान दे दिया। 31 मई 1999 को पीएम अटल बिहारी वाजपेयी का बयान आया। इसमें उन्होंने कहा कि कश्मीर में युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। इसके बाद 4 जुलाई को भारतीय सेना ने टाइगर हिल्स पर तिरंगा फहराया।

    11 घंटे तक लगातार चली इस लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने इस अहम पोस्ट पर अपना कब्जा जमा लिया। 5 जुलाई को बाटलिक सेक्टर में जुबर पहाड़ी पर भारतीय सेना ने फिर से कब्जा जमाया। 7 जुलाई को ही एक अन्य ऑपरेशन के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने सर्वोच्च बलिदान दिया।

    11 जुलाई को भारतीय सेना ने बाटलिक सेक्टर की लगभग सभी पहाड़ियों की चोटियों को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। 12 जुलाई को युद्ध हारते पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ ने भारत के सामने बात की। 14 जुलाई को युद्ध हारते हुए पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ ने भारत के सामने बात करने की मांग रखी।

    इसके बाद 14 जुलाई को भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को भारती क्षेत्र से पूरी तरह से खदेड़ दिया। भारत ने अपने सभी इलाकों को वापिस से हासिल कर लिया। 26 जुलाई को भारत ने कारगिल युद्ध को जीतने की घोषणा कर दी। आपको बता दें कि 18 हजार फीट की ऊंचाई से लड़ा गया युद्ध भारतीय सेनाओं की पराक्रम की गाथा कहता है।

     

     

  • जिनका नाम सुनकर अंग्रेज भी डरते थे आखिर कौन थे वो चंद्रशेखर आजाद?

    जिनका नाम सुनकर अंग्रेज भी डरते थे आखिर कौन थे वो चंद्रशेखर आजाद?

    नई दिल्ली: चंद्रशेखर आजाद यह नाम नहीं इतिहास के पन्नो मे दर्ज एक महान क्रांतिकारी का प्रतीक है। देश की आजादी से पहले अंग्रेजों के लिए यह नाम डर और नौजवानों के लिए यह नाम जोश बन चुका था। स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी के तौर पर पहचाने जाने वाले चंद्रशेखर आजाद आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है। परंतु आज की युवा पीढ़ी उनके बारे में इतना कुछ नहीं जानती। आज का दिन उनकी जयंती के दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

    इस मौके पर आपको बताते हैं कि वह कौन थे और दुनिया उन्हें कैसे याद रखती है। भारत को आजाद करवाने के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी थी। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका नाम चंद्रशेखर तिवारी था, लेकिन आजाद इनकी पहचान कैसे बना इसके पीछे भी एक लंबी कहानी है। आजाद का कहना था कि दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, हम आजाद हैं और आजाद ही रहेंगे।

    हंसते-हंसते दी थी अपनी जान

     चंद्रशेखर आजाद एक ऐसे युवा क्रांतिकारी थे जिन्होने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपनी जान दे दी थी। उन्होंने यह ठान लिया था कि वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे। उन्होंने कम उम्र में ही अपनी जिंदगी को देश के नाम कर दिया था।

    मध्यप्रदेश के गांव भाबरा के रहने वाले थे चंद्रशेखर आजाद

    चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के भाबरा गांव में हुआ था। मूल रुप से उनका परिवार उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गांव से था। पिता सीताराम तिवारी की नौकरी चले जान के कारण उनको अपने पैतृक गांव को छोड़कर मध्यप्रदेश के भाबरा में जाना पड़ा था। चंद्रशेखर तिवारी बचपन से ही काफी जिद्दी और विद्रोही स्वभाव के थे। उनका पूरा बचपन आदिवासी बहुमूल्य क्षेत्र के झाबरा में बीता था। यहां पर उन्होंने बचपन से ही निशानेबाजी और धनुर्विद्या सिखी। लगातार मौके मिलते ही वो इसका अभ्यास करने लग गए। इसके बाद धीरे-धीरे उनका यह शौक बन गया।

    15 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन में लिया हिस्सा

    1922 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत आंदोलन से युवा पीढ़ी हिल गई तो महज 15 साल की उम्र में वह चंद्रशेखर आजाद ही थे जिन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। जब उसको अंग्रेजों ने पकड़ लिया तो वह बोला मेरा नाम आजाद है पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेलखाना। इसके बाद उन्होंने हिंदूस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का नेतृत्व संभाला है। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला है।

    ऐसे कई मिशन थे जिसमें चंद्रशेखर आजाद हमेशा ही आगे रहे काकोरी कांड, लाला लाजपत राय की मौत का बदला, ब्रिटिश ठिकानों पर हमले। इन सभी मिशन में उन्होंने भारत के लिए बढ़ चढ़कर काम किया।

    1931 में जब इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में उन्हें अंग्रेजों ने घेर लिया, तो अपनी बंदूक की आखिरी गोली उन्होंने खुद को मार ली । क्योंकि उन्होंने कसम खाई थी कि वो कभी जिंदा पकड़े नहीं जाएंगे। उनकी शहादत ने  पूरे देश में आजादी की ज्वाला भड़का दिया था। चंद्र शेखर सिर्फ नाम से नहीं विचारों से भी आजाद थे।

  • इस इंसान को मिला बदकिस्मत का Tag, मरने के बाद भी नहीं छुटा पीछा, देखें वीडियो

    इस इंसान को मिला बदकिस्मत का Tag, मरने के बाद भी नहीं छुटा पीछा, देखें वीडियो

    नई दिल्ली: किस्मत – सब किस्मत का खेल है” ये वाक्य तो अपने कई बार सुना होगा। लेकिन क्या आप ये जानते है कि दुनिया में एक ऐसा शख्स भी था जिसे इतिहास का सबसे बदकिस्मत इंसान का Tag मिला। यह इंसान ब्रिटेन का रहने वाला वाल्टर समरफोर्ड था। जिसके साथ एक जैसी तीन ऐसी घटनाए घटी जिससे इसकी बदकिस्मती आराम से साबित हो गई।

    पहली घटना 1918 में घटी जब वाल्टर की तैनाती बेल्जियम में थी। एक दिन घुड़सवारी करते वक्त उनके ऊपर आकाशीय बिजली गिर गई। ऐसी ही घटना एक बार फिर 6 साल बाद घटी। उस समय वह कनाडा में थे। जहा पर एक दफा फिर इनके ऊपर आकाशीय बिजली गिर गई। बिजली की दुश्मनी यहां पर भी नहीं रुकी और 6 साल बाद एक बार फिर तीसरी बार इनके ऊपर आकाशीय बिजली गिर गई।

    सबसे हैरानी की बात तो ये है कि आकाशीय बिजली ने इनके मरने के बाद भी इनका पीछा नहीं छोड़ा और साल 1936 में उनकी कब्र के ऊपर एक बार फिर बिजली गिरी। यह घटना भी तीसरी घटना के ठीक छह साल बाद घटी थी। इस इंसान के साथ लगातार हुए हादसे से लोगों ने इन्हें बदकिस्मत करार दिया।

  • इस खूबसूरत Country में मिलती है किराए पर पत्नियां, Wife वाले सभी फर्ज भी निभाती है

    इस खूबसूरत Country में मिलती है किराए पर पत्नियां, Wife वाले सभी फर्ज भी निभाती है

    लाइफ स्टाइसलः खूबसूरत देशों में थाईलैंड भी हैं। जहां हर साल लाखों टूरिस्ट घूमने आते हैं। यहां के बीच, खाना और नाइट लाइफ पूरी दुनिया में मशहूर हैं। लेकिन इन सबसे अलग क्या आप जानते हैं कि थाईलैंड में लोग सिर्फ कमरे, होटल या ऑफिस ही नहीं, बल्कि पत्नी भी किराए पर खरीद सकते हैं? इस प्रचलन को यहां ‘वाइफ ऑन हायर’ और ‘ब्लैक पर्ल’ कहा जाता है। यह एक तरह का अस्थाई विवाह होता है, जिसमें किसी युवती को पैसे देकर कुछ समय के लिए पत्नी बनाया जा सकता है। तय समय तक वह युवती वाइफ के सारे फर्ज अदा करती है।

    जानकारी के अनुसार, रेंटल वाइफ का चलन सबसे पहले पटाया और बैंकॉक जैसे शहरों में शुरू हुआ था। बताया जाता है कि इन शहरों में दूर देशों से टूरिस्ट आते थे, उस वक्त वे अपना अकेलापन दूर करने के लिए किसी साथी की तलाश में होते थे। तब लोकल महिलाएं सीमित समय के लिए साथी की भूमिका निभाती थीं, जैसे साथ समय बिताना, बातचीत करना, आसपास घूमना और घरेलू कामों में मदद करना। यह आपसी सहमति पर आधारित रिश्ता होता था। धीरे-धीरे यह एक ट्रेंड बन गया, जिसे अब ‘वाइफ ऑन हायर’, ‘ब्लैक पर्ल’ या सीधे शब्दों में ‘रेंटल वाइफ’ कहा जाता है।

    बताया जाता है कि रेंटल वाइफ आमतौर पर गरीब ग्रामीण महिलाएं होती हैं। वे बार, मसाज सेंटर या क्लब में काम करती हैं। यहीं से उनकी मुलाकात विदेशी टूरिस्ट से होती है। ज्यादातर महिलाएं आर्थिक कारणों से इस काम को चुनती हैं। उनके लिए यह एक तरीका होता है जिससे वे अपनी रोजी-रोटी चला सकें। हालांकि, इसे लेकर उनपर किसी तरह का कोई दवाब नहीं होता है। वहीं, कई बार ऐसे रिश्तों में आपसी समझ इतनी अच्छी हो जाती है कि दोनों व्यक्ति एक-दूसरे के साथ लंबे समय तक जुड़े रहते हैं। कुछ मामलों में यह दोस्ती आगे चलकर स्थायी रिश्ते में भी बदल जाती है।

    कैसे तय होते हैं रेट?
    किराए की रकम महिला की उम्र, सुंदरता, शिक्षा और समय के अनुसार तय होती है। रेट आमतौर पर 1600 डॉलर यानी 1.3 लाख रुपये से शुरू होकर 70-80 लाख रुपये तक भी जा सकता है। कुछ महिलाएं हफ्ते भर के पैकेज देती हैं, तो कुछ महीनों के लिए हायर होती हैं। यह प्रथा इतनी प्रचलित है कि इस विषय पर यहां एक किताब भी छप चुकी है। हालांकि, थाईलैंड में रेंटल वाइफ को लेकर फिलहाल कोई खास कानून नहीं है।

    जापान और कोरिया से आया आइडिया
    कहा जाता है कि थाईलैंड से अलग जापान और कोरिया जैसे देशों में ये प्रथा पहले से चली आ रही है। वहीं, इसके तेजी से बढ़ने के कई कारण हैं। शहरीकरण और बिजी लाइफ में लोगों का अकेलापन बढ़ रहा है। ऐसे में लोग स्थाई रिश्ते की जगह अस्थाई रिश्ता बनाना पसंद करने लगे हैं। थाईलैंड की सरकार का भी मानना है कि रेंटल वाइफ की प्रथा देश में मौजूद है और पर्यटकों के कारण यह व्यवसाय का रूप ले चुकी है। सरकार अब इस पर कानूनी नियंत्रण लाने की बातें कर रही है, ताकि महिलाओं का शोषण न हो और सब कुछ एक दायरे में रहे।

  • इस तरीके से तैयार करें Sabudana Khichdi, नहीं बनेगी चिपचिपी

    इस तरीके से तैयार करें Sabudana Khichdi, नहीं बनेगी चिपचिपी

    लाइफस्टाइलः वैसे तो साबूदाना को ज्यादातर व्रत में खाया जाता है, सबको इसका स्वाद इतना ज्यादा पसंद आता है कि लोग इसे अक्सर बनाना पसंद करते हैं। साबूदाना से बहुत से व्यंजन बनाए जाते हैं, लेकिन साबूदाना खिचड़ी सबकी फेवरेट है। इसे लोग हल्के-फुल्के नाश्ते के रूप में खाना भी बहुत पसंद करते हैं और जल्दी-जल्दी बनाते हैं। कई बार इसे ब बनाते समय यह साबूदाना चिपकने के कारण खिचड़ी में लंप्स पड़ जाते हैं, जो इसके स्वाद को खराब कर देते हैं। अगर आप भी अब तक चिपचिपी साबूदाना खिचड़ी बना रहे हैं, तो कुछ आसान टिप्स से अब यह ऐसी नहीं बनेगी।

    बनाने के लिए सामग्री
    – 1 कप साबूदाना
    – ¼ कप मूंगफली
    – 1 उबला हुआ कटा आलू
    – 2 बारीक कटी हरी मिर्च
    – 5-6 करी पत्ते
    – 1 छोटा चम्मच नींबू का रस
    – स्वादानुसार सेंधा नमक
    – 2 छोटे चम्मच घी या तेल
    – सजावट के लिए कटा हरा धनिया

    ऐसे तैयार करें
    – साबुदाना खिचड़ी को नॉन-स्टिकी बनाने के लिए साबूदाने को सही तरह से भिनोगा सबसे जरूरी है। साबूदाना को 2-3 बार अच्छी तरह धोएं जब तक कि पानी साफ ना हो जाए और सारा एक्सट्रा स्टार्च निकल ना जाए। अब इस साबूदाने को लगभग 5-6 घंटे के लिए पानी में भिगोएं।

    – साबूदाने के भिगने के बाद वो सॉफ्ट हो जाता है। इसमें पिसी हुई भुनी हुई मूंगफली का पाउडर (लगभग 1 छोटा चम्मच) और सेंधा नमक मिलाएं। ये नमी सोखने में मदद करता है और चिपचिपाहट को रोकता है।
    – एक कड़ाही में घी/तेल गरम करें। उसमें मूंगफली डालें और उसे सुनहरा होने तक भूनें। फिर कटे हुए आलू डालें और हल्का सा भूनें। कटी हुई हरी मिर्च और करी पत्ता डालें और एक मिनट तक पकाएं।

    – अब पैन में भीगा हुआ साबूदाना को पैन में डालें। इसे धीमी आंच पर 4-5 मिनट तक हल्के हाथों से चलाते रहें, जब तक कि ये ट्रांसपेरेंट ना हो जाए। हालांकि, इस स्टेज पर इसे ज्यादा पकाने की गलती बिल्कुल भी ना करें नहीं तो ये चिपचिपा हो जाएगा।

    – अब इसमें नींबू का रस और हरा धनिया डालकर चलाएं। गैस बंद कर दें। आपकी नॉन-स्टिकी और टेस्टी साबूदाना खिचड़ी बनकर तैयार है। गरमागरम परोसें।

  • World Emoji Day पर जानें इससे जुड़ी खास बातें, देखें वीडियो

    World Emoji Day पर जानें इससे जुड़ी खास बातें, देखें वीडियो

    नई दिल्ली: व्हाट्सएप्प से लेकर फेसबुक इंस्टाग्राम की चैट बिना इमोजीस के अधूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि आज के इस मॉर्डन युग में यूथ अपनी फीलिंग्स इन इमोजी के जरिए ही शेयर करती है। चाहे खुशी हो या दुख हो सभी फीलिंग्स का इजहार इमोजीस के जरिए ही बयान करते हैं, लेकिन कभी यह सोचा है कि शब्दों को एक इमोजीस के जरिए बयान करने का सिलसिला कैसे शुरु हुआ।

    क्या आप जानते है कि इन इमोजी की खोज कैसे हुई। आज वर्ल्ड इमोजी डे है इसकी शुरुआत 1999 में जापान में हुई थी जिसे Shigetaka Kurita ने बनाया था, जो कि एक जैपनीज डिजाइनर थे और मोबाइल इंटरनेट प्लेटफॉर्म के लिए काम करते थे। शुरुआत में इन्होंने 176 इमोजी बनाए, जिनका मकसद बातचीत को और ज्यादा एक्सप्रेसिव बनाना था। इसके बाद jeremy burge नाम के व्यक्ति ने Emojipedia को इवेंट किया। जहां आप इमोजी से जुड़े इनफॉर्मेशन ले सकते है। इन्होंने ही वर्ल्ड इमोजी डे मनाने का प्रस्ताव रखा जिसके बाद हर साल 17 जुलाई को इसे सेलिब्रेट किया जाता है।

    जानिए कुछ इमोजीस जो Feelings बयान करती हैं

    Smiling Face with Smiling Eyes इस इमोजी का इस्तेमाल थोड़ी खुशी दिखाने के लिए किया जाता है। (Face with Tears of Joy)– कुछ बहुत ज्यादा मजेदार लगने पर लोग ये इमोजी शेयर करते हैं। इस इमोजी का इस्तेमाल किसी को धन्यवाद करने, माफी मांगने या किसी से प्रार्थना करने के लिए किया जाता है। (Heart Eyes) – किसी चीज से बहुत ज्यादा प्यार या आकर्षण जताने के लिए। (Crying Face) – उदासी या निराशा दिखाने के लिए। (Smiling Face with Sunglasses) – कूलनेस या कॉन्फिडेंस दिखाने के लिए ये इमोजी शेयर की जाती है। (100) – परफेक्ट, या किसी बात से पूरी तरह से सहमती जताने के लिए। (Fire) – कोई चीज ट्रेंडिंग है या बहुत शानदार है, तो उसे बताने के लिए फायर इमोजी शेयर की जाती है। (Broken Heart) – दिल टूटना या किसी बात से गहरा दुख जताने के लिए लोग इस इमोजी का इस्तेमाल करते है।

     
  • मानसून में पकोड़े की जगह बनाए ये हेल्दी स्नैक, जाने आसान रेसिपी

    मानसून में पकोड़े की जगह बनाए ये हेल्दी स्नैक, जाने आसान रेसिपी

    लाइफस्टाइलः मानसून में हर किसी के घर में कुछ न कुछ जरूर बनता है। बरसात और पकोड़े का रिश्ता तो वैसे ही बड़ा गहरा है, लेकिन अरबी के पत्ते के पकोड़े यानी पतोड़ कुछ खास होते हैं क्योंकि ये केवल स्वाद नहीं, भावनाएं भी परोसते हैं। अरबी के पत्ते के पकोड़े मानसून के मौसम में बेहद पसंद किए जाने वाले पारंपरिक स्नैक हैं। कुरकुरी परत और अंदर से मसालेदार पत्तों की लेयर इसे और भी खास बना देती है।

    अरबी के पत्ते के पकोड़े बनाने के लिए मुख्य सामग्री
    – अरबी के पत्ते (बड़े और ताजे): 5-6
    – बेसन (चना आटा): 1 कप
    – चावल का आटा: 2 टेबलस्पून (क्रिस्पीनेस के लिए)
    – इमली का गूदा: 2 टेबलस्पून (या नींबू का रस – 1 टेबलस्पून)
    – अदरक-लहसुन का पेस्ट: 1 टीस्पून
    – लाल मिर्च पाउडर: 1 टीस्पून
    – हल्दी पाउडर: 1/2 टीस्पून
    – गरम मसाला: 1/2 टीस्पून
    – अजवाइन: 1/2 टीस्पून
    – नमक: स्वादानुसार
    – तेल: तलने के लिए

    अरबी के पत्ते के पकोड़े बनाने की विधि
    सबसे पहले अरबी के पत्तों को पानी से धो लें। उनकी मोटी डंठल को चाकू से सावधानीपूर्वक छील लें, ताकि पत्ते आसानी से मुड़ सकें. इसके बाद एक बर्तन में बेसन, चावल का आटा, इमली का गूदा, अदरक-लहसुन का पेस्ट, मसाले और नमक मिलाएं। थोड़ा पानी डालकर गाढ़ा पेस्ट तैयार करें।

    पत्तों की परतें चढ़ाना
    एक बड़ा अरबी का पत्ता लें, उसकी चिकनी साइड नीचे रखें. इस पर बेसन का पेस्ट समान रूप से लगाएं। अब दूसरा पत्ता इस पर रखें और फिर से पेस्ट लगाएं। ऐसा 4-5 परतों तक करें, फिर इसे रोल की तरह कसकर मोड़ें। इस रोल को स्टीमर या इडली कुकर में 15-20 मिनट तक भाप में पकाएं। ठंडा होने पर इसके 1-1 इंच के टुकड़े काट लें। एक कढ़ाही में तेल गरम करें। इन टुकड़ों को मध्यम आंच पर गोल्डन और क्रिस्पी होने तक तलें।

    परोसने का तरीकाः धनिया-पुदीना या इमली की चटनी के साथ गर्मागर्म परोसें। चाहें तो ऊपर से चाट मसाला और नींबू रस छिड़क सकते हैं।

  • बरसात में स्वाद बन सकता है बीमारी की वजह – इन 5 चीजों से बचें

    बरसात में स्वाद बन सकता है बीमारी की वजह – इन 5 चीजों से बचें

    Lifestyle: मानसून का मौसम आते ही हर गली-नुक्कड़ पर स्ट्रीट-फूड की दुकानों पर भीड़ बढ़ जाती है। ठंडी हवा, हल्की बूँदें और कुछ चटपटा खाने का मन – ये सब मिलकर लोगों को पकोड़े, चाट और गोलगप्पों की ओर खींचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही स्वादिष्ट दिखने वाले स्नैक्स मानसून में आपकी सेहत बिगाड़ सकते हैं?

    सबसे पहले बात करते हैं गोलगप्पे या पानीपूरी की। बरसात में इस्तेमाल किया जाने वाला पानी साफ नहीं होता और स्टॉल्स पर साफ-सफाई का अभाव रहता है। इससे पेट की गंभीर समस्याएं जैसे डायरिया, फूड पॉइज़निंग और हैजा का खतरा होता है।

    दूसरे नंबर पर है कटे हुए फल या चाट। खुले में रखे ये फलों के टुकड़े नमी और गंदगी की वजह से जल्दी खराब हो जाते हैं, जिससे उनमें बैक्टीरिया पनप सकते हैं। चाट भी खुले मसालों और दही के कारण इस मौसम में जल्दी खराब हो सकती है।

    समोसे और पकोड़े भी अगर बार-बार तेल में तले गए हों, तो वो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। मानसून में नमी के कारण तेल में जल्दी गंध और हानिकारक तत्व बन जाते हैं।

    दूध से बने आइटम जैसे स्ट्रीट पर मिलने वाली चाय, मलाईदार मिठाइयाँ या कस्टर्ड — ये भी नमी और गर्मी के कारण जल्दी खराब हो सकते हैं। इससे पेट की गड़बड़ी या उल्टी-दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

    अंत में बात करें क्रीम वाले केक या पेस्ट्रीज़ की, तो मानसून के मौसम में फ्रेश दिखने वाली इन चीजों के खराब होने की संभावना ज़्यादा होती है, खासकर जब इन्हें खुले में बेचा जा रहा हो।

    इसलिए मानसून में थोड़ा संयम बरतें। स्वाद की जगह सेहत को प्राथमिकता दें। घर का बना गरम खाना और साफ-सुथरी जगह से लिया गया भोजन ही इस मौसम में सबसे सुरक्षित विकल्प है।