Category: Spiritual

  • सज रही है अवधनगरी, देखिए श्री राम मंदिर की भव्यता की तस्वीरें

     नई दिल्ली: भारत समेत दुनियाभर के राम भक्त 22 जनवरी के ऐतिहासिक दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जब उनके रामलला अपने भव्य मंदिर के गर्भगृह में प्राण प्रतिष्ठित किए जाएंगे उससे पहले राम मंदिर समेत पूरी अयोध्या नगरी को दुल्हन की तरह सजाया-संवारा गया है फूलों की खुशबू में लिपटे और रंग बिरंगी लाइटों की रोशनी में नहाए राम मंदिर की भव्यता देखते ही बन रही है

    राम मंदिर के अंदर और बाहर तरह-तरह के फूलों से सजावट की गई है मंदिर के मुख्य द्वार को भी अलग-अलग तरह के फूलों से सुसज्जित किया गया है

    इसके अलावा पूरे श्रीराम जन्मभूमि परिसर को एक अलग रूप दे दिया गया हैपरिसर के मुख्य द्वार पर गेंदे के फूलों से वेलकम नोट लिखा गया है, ’प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में आए हुए सभी भक्तों का श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट स्वागत करता है

    बता दें कि राम मंदिर का निर्माण मशहूर वास्तुकार चंद्रकांत सोमपुरा की देखरेख में शास्त्रीय परंपरा के अनुसार नागर शैली में हुआ है इसकी लंबाई पूर्व से पश्चिम की ओर 380 फीट, जबकि चौड़ा उत्तर से दक्षिण की ओर 250 फीट है. फिलहाल प्रथम तल बनकर तैयार हुआ है

    निर्माण पूरा होने के बाद राम मंदिर की नींव से शिखर तक की ऊंचाई 161 फीट होगी राम मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर देवी.देवताओं के चित्र उकेरे गए है पूरी तरह बनने के बाद मंदिर में कुल तीन मंजिल होंगे हर मंजिल की ऊंचाई 20 फीट रखी जाएगी।  इसमें कुल 392 स्तंभ और 44 दरवाजे होंगे

  • मकर संक्रांति को देश के अन्य-अन्य हिस्सों में इन नामों से जाना जाता है, इस तरह मनाया जाता है यह त्योहार 

    मकर संक्रांति: यह का पर्व भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, साथ ही इसके मनाने का तरीका भी हर राज्य में थोड़ा अलग होता है. आज हम आपको मकर संक्रांति का पर्व किस राज्य में कौन से नाम से जाना जाता है और कैसे मनाया जाता है,उस बारे में बताएंगे. तो आइए जानते हैं 

    मकर संक्रांति पर्व इस राज्य में इस नाम से जाना जाता है

    पंजाब, दिल्ली और हरियाणा में इसे मकर संक्रांति के रूप में जाना जाता है. इस दिन लोग तिल गुड़ का दान करते हैं ।

    उत्तर भारत में तो इसे खिचड़ी  के नाम से जाना जाता है. इस दिन लोग उड़द और दाल की खिचड़ी बनाते हैं. इसके अलावा ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके सूर्य को अर्ध्य देकर, तिल गुड़ और उड़द का दान करते हैं। वहीं, पोंगल तमिलनाडु में मकर संक्रांति को के रूप में जाना जाता है. इस राज्य में यह पर्व पूरे 4 दिन मनाया जाता है. जिसमें पहले दिन भोगी

    पोंगल, दूसरे दिन सूर्य पोंगल, तीसरे दिन मट्टू पोंगल और चौथे दिन कन्या पोंगल शामिल है. इस दिन चावल को गुड़ के साथ उबालकर डिश तैयार की जाती है. 


    गुजरात में इस पर्व को उत्तरायण के नाम से जाना जाता है. इस दिन मनाया जाने वाला ‘काइट फेस्टिवल’ पूरे दुनिया में प्रसिद्ध है. इस दिन लोग अपने-अपने छतों पर रंग-बिरंगी पतंग उड़ाकर इस त्यौहार का आनंद लेते हैं.


    माघ साजी के नाम से जाना जाता है. इस दिन लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और भगवान का आशीर्वाद लेते हैं. इस दिन लोग स्नान करके पूजा पाठ करते हैं फिर रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाकर उन्हें खिचड़ी, घी और मिठाईयां उपहार में देते हैं।

    पूर्वात्तर राज्य में इसे बिहू के नाम से जाना जाता है. इस दिन से असम में सारे शुभ कार्यो की शुरूआत हो जाती है. 

  • जाने क्यों मनाया जाता है लोहड़ी का पर्व और इससे जुड़ी मान्यता

    नई दिल्ली : लोहड़ी पर्व को लेकर मूंगफली, रेवड़ी और गजक की ज्यादा मांग रहती है। इसे लेकर शहर के बाजारों में कई जगह दुकानें सज गई हैं। लोग इनकी खरीदारी कर रहे हैं। वैसे लोहड़ी का त्योहार भगवान कृष्ण से भी जुड़ा है और इस दिन उन्होंने लोहिता नाम की राक्षसी का वध किया था। उसी समय से चली आ रही लोहड़ी पर्व को मनाने की परंपरा आज तक गतिमान है। लोहड़ी से जुड़ी प्रमुख लोककथा दुल्ला भट्टी की है जो मुगलों के समय का एक बहादुर योद्धा था। जिसने मुगलों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ कदम उठाया था।

    एक ब्राह्मण की 2 लड़कियों सुंदरी मुंदरी के साथ इलाके का मुगल शासक जबरन शादी करना चाहता था। इस मुसीबत की घड़ी में दुल्ला भट्टी ने ब्राह्मण की मदद की और लड़के वालों को मना कर एक जंगल में आग जला कर सुंदरी मुंदरी का ब्याह कराया। दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। इसी कथा की हिमायत करता लोहड़ी का यह गीत है, जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है सुंदर, मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले धी (लड़की) व्याही हो, सेर शक्कर पाई हो।

  • राम मंदिर के नाम पर हो रहा बड़ा स्कैम, जाने मामला

    नई दिल्ली : अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बन रहा है। 22 जनवरी को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद वहां मौजूद रहेंगे। देशभर की बड़ी हस्तियां, साधु-संतों का भी अयोध्या आना होगा। इस बीच लोगों के साथ भगवान राम के नाम पर ठगी और स्कैम भी किया जा रहा है। बीते दिनों हमने अपनी एक खबर में बताया था कि सोशल मीडिया पर कैसे कुछ लोग क्यूआर कोड शेयर कर रहे हैं। साथ ही वो क्यूआर शेयर करने के साथ राममंदिर के चंदा मांग रहे हैं और यह कहते दिख रहे हैं कि भगवान राम के लिए मंदिर निर्माण में योगदान करें। विश्व हिंदू परिषद ने इसपर आपत्ति जताई थी। ऐसे में एक बार फिर एक नया स्कैम सामने आया है। इस स्कैम के तहत व्हाट्सऐप पर लोगों को एक मैसेज भेजा जा रहा है। इस मैसेज में लोगों को यह लिखकर भेजा जा रहा है कि उन्हें राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में वीआईपी एंट्री दी जा रही है।

    इस मैसेज में एक मोबाइल ऐप का लिंक भी भेजा जा रहा है। दरअसल यह एक तरह का स्कैम है, जो लोगों को भेजा जा रहा है। ऐसे में अगर आप इस एप्लीकेशन को अपने फोन में इंस्टॉल करते हैं तो आपको भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल मोबाइल में ऐप्लिकेशन इंस्टॉल करते ही मोबाइल फोन ऑफ हो जाएगा। इसके बाद आपका बैंक डेटा हैकर के पास चला जाएगा। ऐसे में बहुत ज्यादा ही संभावना है कि आपके बैंक खाते से पैसे निकाल लिया जाए या उसका कुछ गलत इस्तेमाल किया जाए। ऐसे में हर किसी को सावधान रहने की जरूरत है। जानकारी के लिए बता दें कि राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में केवल वो लोग ही शामिल होंगे जिन्हें राम मंदिर ट्रस्ट की तरफ से निमंत्रण भेजा जा रहा है। हर कोई उस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकेगा।

  • 16 दिसंबर से लगने जा रहा है खरमास, अब नहीं होगा काई भी मांगलिक कार्य

    नई दिल्ली : हिंदू धर्म में प्रत्येक रीति-रीवाजों पर संपूर्ण ध्यान दिया जाता है। हर पूजा पद्धति को पूरे विधि-विधान से निभाया जाता है। अब 16 दिसंबर 2023 दिन शनिवार यानी कल सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करते ही खरमास लग जाएगा और इस दिन से सारे मांगलिक कार्य रोक दिए जाएंगे। सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने को धनु संक्रांति भी कहा जाता है। ऐसे में कोई भी शुभ कार्य करना हिंदू धर्म के अनुसार शुभ फलदायक नहीं माना जाता है। खासकर विवाह जैसे शुभ कार्यक्रमों पर तो पूर्ण रूप से विराम लगता ही है इसी के साथ अन्य शुभ कार्यों पर भी रोक लग जाती है। आइए जानते हैं खरमास कितने बजे से लगने जा रहा है और इस दौरान क्या करें और क्या नहीं।

    कब से कब तक रहेगा खरमास

    खरमास 16 दिसंबर 2023 दिन शनिवार को शाम 3 बजकर 59 मिनट पर सूर्य के धनु राशि में आते ही लग जाएगा और 15 जनवरी 2024 में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे तब खरमास का समापन हो जाएगा। खरमास की इस लिहाज से कुल अवधि 1 महीने की रहेगी। इस दौरान सारे मांगलिक कार्य हिंदू रीति-रीवाज के अनुसार नहीं किए जाते हैं।

    खरमास में क्या नहीं करें

    खरमास के दौरान सारे मांगलिक कार्य करने की मनाही है तो ऐसे में आप कोई भी शुभ कार्य न करें। इस दौरान विवाह पर तो पूर्ण विराम लग ही जाता है साथ ही विवाह से जुड़ा कोई भी शुभ कार्य भी न करें, जैसे की शादी के लिए वर-वधु ढूंढना, रिश्ता तय करना इत्यादि।खरमास में कोई भी कार्य जो पूजा अनुष्ठान और संकल्प से जुड़ा हो उसे न करें।इस दौरान मुंडन, नाम करण संस्कार, ग्रह प्रवेश करना, कोई नया वाहन घर लाना या खरीदना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिए।

    खरमास में क्या करें

    मान्यता है कि खरमास के दिन रोज प्रातः स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए। अर्घ्य देने से पहले तांबे के पात्र में कुमकुम, लाल गुलहड़ का फूल, अक्षत डाल कर तभी भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित करें। सूर्य अर्घ्य देने के बाद सूर्य भगवान के मंत्रों का जाप करें। मंत्र इस प्रकार से ऊं घृणिः सूर्याय नमः। खरमास में रविवार के दिन सूर्य भगवान के निमित्त व्रत करने और सूर्य चालीसा का पाठ करने से उनकी असीम कृपा प्राप्त होती है।मंदिरों में दान-पुण्य करें और शाम को सूर्यास्त के बाद दीपदान करें ऐसा करने से आपके जीवन में सुख-समृद्धि आएगी। इस दौरान आप गुरु बृहस्पति की पूजा भी कर सकते हैं क्योंकि धनु राशि के स्वामी देव गुरु बृहस्पति ही हैं। इसी के साथ आप भगवान नारायण की उपासना नित्य कर सकते हैं। ऐसा करने से आपके जीवन में चल रहे समस्त कष्ट मिट जाएंगे। गुरु बृहस्पति के मंत्र का जाप करना खरमास के दौरान आपके लिए लाभदायक होगा। मंत्र इस प्रकार से ऊँ ब्रं बृहस्पति नमः खरमास के दौरान जितना हो सके भगवान सत्यनारायण का भजन और उनकी कथा का श्रवण करें। खरमास के दौरान सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए।

  • इस निशान से पता चलता है किस बिमारी के होंगे शिकार

    हस्‍तरेखा शास्‍त्रों में हाथ में काला धब्‍बा होना अशुभ माना गया है। यह धब्‍बा बताता है कि जातक किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो सकता है। हथेली में काला धब्‍बा किस जगह पर है, उससे पता चलता है कि जातक को कौनसी बीमारी हो सकती है। 

    यदि जातक की मस्तिष्‍क रेखा पर एक काला धब्‍बा या कई धब्‍बे हों तो जातक को माइग्रेन की समस्‍या हो सकती है। या फिर जातक हमेशा ही किसी ना किसी मानसिक समस्‍या से परेशान रहता है। व्‍यापार में हानि होती है। जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है।

    यदि जातक के हाथ में जीवन रेखा पर काले धब्‍बे या काला निशान हो तो इसे भी अच्‍छा नहीं माना जाता है। ऐसा जातक हमेशा किसी ना किसी बीमारी का शिकार रहता है। वह किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो सकता है, जो उसके जीवन पर संकट ला सकती है। ऐसे जातकों को जीवन में सुख ना के बराबर ही मिलता है। वे नौकरी-व्‍यापार में तरक्‍की नहीं कर पाते हैं। 

    यदि गुरु पर्वत पर काला धब्‍बा हो तो जातक को जीवन में कभी सम्‍मान नहीं मिलता है। उसे वह दर्जा नहीं मिलता है, जिसका वो हकदार हो। इन जातकों को वैवाहिक सुख भी नहीं मिलता, विवाह में देरी या अन्‍य कोई समस्‍या झेलनी पड़ती है। प्‍यार पाने में असफलता मिलती है।

    शनि पर्वत पर तिल, काला धब्‍बा होना बताता है कि ऐसे जातक के साथ कोई दुर्घटना हो सकती है। बार-बार जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं। उन्‍हें जीवन में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और ज्‍यादातर समय दुख में गुजरता है। 

    हाथ में काले धब्‍बों की तरह सफेद धब्‍बों का होना भी अहम संकेत देता है। यदि महिलाओं के हाथ में अचानक सफेद धब्‍बे दिखने लगें तो इसका मतलब है कि उसका गर्भधारण होने वाला है। वहीं पुरुष के हाथ में सफेद धब्‍बे हों तो यह धन लाभ का संकेत होता है।

    जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। इस की पु्ष्टी हमारा चैनल नहीं करता।

  • धनतेरस पर सामान लेने का जानें शुभ मुहूर्त

    नई दिल्ली :  धनतेरस से दीपावली का पर्व आज से शुरू हो रहा है।  धनतेरस से इन त्योहारों की शुरुआत होती है हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। धनतेरस इस बार 10 नवंबर यानी आज मनाई जाएगी इस दिन धन की देवी मां लक्ष्‍मी और धन के देवता कुबेरजी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन कुबेर जी और देवी लक्ष्मी की पूजा करने से घर में कभी भी घर में धन की कमी नहीं होती है। वहीं इस दिन सोने-चांदी के अलावा बर्तनों की खरीद करते है। ऐसी मान्‍यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्‍तुओं में 13 गुना वृ‍द्धि होती है। पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्‍ण त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 10 नवंबर को दोपहर 12.35 मिनट से होगा वहीं य‍ह तिथि अगले दिन 11 नवंबर को दोपहर में 1.57 मिनट तक रहेगी हालांकि धनतेरस का त्‍योहार प्रदोष काल में मनाने की परंपरा है। इसलिए यह शु्क्रवार को 10 नवंबर को मनाई जाएगी  

    जानें धनतेरस का शुभ मुहूर्त

    पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्‍ण त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 10 नवंबर को दोपहर 12.35 मिनट से होगा। वहीं य‍ह तिथि अगले दिन 11 नवंबर को दोपहर में 1.57 मिनट तक रहेगी. हालांकि, धनतेरस का त्‍योहार प्रदोष काल में मनाने की परंपरा है, इसलिए यह शु्क्रवार को 10 नवंबर को मनाई जाएगी  वहीं धनतेरस पर लक्ष्‍मी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम को 5.47 बजे से शुरू होगा और यह यह शाम को 7.47 मिनट तक रहेगा वहीं इस दौरान यमदीप भी जलाना शुभ होगा मां लक्ष्मी की पूजा करने के लिए आपको सबसे पहले एक पीढ़ा पर लाल कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी की प्रतिमा रखनी चाहिए, फिर माला, फल, सोना-चांदी प्रसाद चढ़ाकर दीया और अगरबत्ती जलाना चाहिए फिर आखिरी में आरती करनी चाहिए  

  • इस मंदिर के पुजारियों की शुरू हुई ट्रेनिंग

    नई दिल्ली : जम्मू-कश्मीर के कटड़ा में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने पुजारियों के लिए 11 दिवसीय पुनश्चर्या पाठ्यक्रम की शुरुआत की। इस मौके पर श्री लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति डॉ. मुरली मनोहर ने उमेश शर्मा, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट भवन, प्रमुख पुजारी और गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में पाठ्यक्रम का उद्घाटन किया। जानकारी के मुताबिक चूड़ामणि संस्कृत संस्थान, बसोहली, कठुआ के सहयोग से केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, काशी, वाराणसी के संस्थानों के विशेषज्ञों ने कर्मकांड कौशल पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में दो बैचों में 31 पुजारियों को शामिल किया जाएगा। इसमें विशिष्ट अनुष्ठानों, मंत्रों और प्रथाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। बता दें कि एक पुजारी को अपनी पूजन विधि के बारे में अत्यधिक विशिष्ट और पेशेवर दृष्टिकोण के अलावा महारत हासिल करने की आवश्यकता होती है। मुख्य प्रशिक्षण सामग्री में कर्म कांड, उपासना कांड, ज्ञान कांड, सूक्त, स्तोत्र और संध्या वंदन शामिल है।

    जानकारी के अनुसार निरंतर सीखने की संस्कृति को बढ़ावा देने वाले ये पुनश्चर्या कार्यक्रम पुजारियों के कौशल को बढ़ाने और उनके बौद्धिक विकास के लिए सहायक होंगे। एसएमवीडीएसबी के संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. सुनील शर्मा ने पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श करते हुए आशा व्यक्त की कि यह प्रतिभागियों के मौजूदा ज्ञान और धार्मिक कौशल को सुदृढ़ और उन्नत करेगा। इस मौके पर प्रो. रजनीश कुमार शुक्ला, कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा, कुलपति, प्रो. राम राज उपाध्याय, प्रोफेसर डॉ. संजय तिवारी, ज्योतिषाचार्य डॉ. चंद्रेश उपाध्याय, वेदाचार्य डॉ. अभिषेक उपाध्याय और डॉ. भारत भूषण पांडे आदि मौजूद थे।

  • करवा चौथ : यहां की महिलाएं चाहकर भी नही रखती व्रत, जाने मामला

    नई दिल्ली :  करवा चौथ मंगलवार 31 अक्टूबर को मनाया जाएगा। देश भर में शादीशुदा महिलाओं के लिए करवा चौथ का खास महत्व है। महिलाएं व्रत को लेकर काफी पहले से तैयारी करती हैं। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में एक तहसील ऐसी भी है जहां की विवाहिता चाहकर भी इस व्रत को नहीं करती हैं।  मथुरा में मांट तहसील के सुरीर बिजउ गांव के बधा क्षेत्र की विवाहित महिलाएं नहीं रखती हैं। इसका मुख्य कारण एक सती का इस क्षेत्र के लोगों को दिया गया श्राप है। गांव के बड़े बुजुुर्ग बताते हैं कि लगभग ढाई सौ वर्ष पहले घटी घटना के बाद शुरुआत में जिस महिला ने गांव में आठ नौ लोगों की मौत और महिलाओं के विधवा होने के बाद से इस क्षेत्र में इस त्योहार को मनाना बन्द हो गया। गांव की 102 वर्षीय सुनहरी देवी ने बताया कि लगभग ढाई सौ वर्ष पहले एक ब्राह्मण पति अपनी पत्नी को ससुराल से विदा कराकर बैलगाड़ी से जब अपने गांव राम नगला जा रहा था तो रास्ते में बघा क्षेत्र में उसका विवाद एक बैल को लेकर हो गया। 

    गांव में आठ नौ लोगों की मौत और महिलाओं के विधवा होने के बाद से इस क्षेत्र में इस त्योहार को मनाना बन्द हो गया। जानकारी के अनुसार लगभग ढाई सौ वर्ष पहले एक ब्राह्मण पति अपनी पत्नी को ससुराल से विदा कराकर बैलगाड़ी से जब अपने गांव राम नगला जा रहा था तो रास्ते में बघा क्षेत्र में उसका विवाद एक बैल को लेकर हो गया। जहां बघा क्षेत्र के एक व्यक्ति का कहना था कि उसका यह वही बैल है जो हाल में चोरी हो गया था। वहीं ब्राह्मण कह रहा था कि यह बैल उसे ससुराल से मिला है। विवाद इतना बढ़ा कि ब्राह्मण की हत्या कर दी गई। इसके बाद उसकी पत्नी न केवल सती हो गई बल्कि सती होने के पहले उसने श्राप दिया था कि बघा क्षेत्र की जो भी महिलाएं करवा चौथ का व्रत करेंगी उसके पति की मृत्यु हो जाएगी।

    जिस दिन उक्त घटना घटी  उस दिन करवा चौथ का पर्व था।  उन्होंने बताया कि यद्यपि ब्राह्मण की मृत्यु के बाद गांव में ही सती का मन्दिर बनाया गया था और विवाह के पूर्व और अन्य पर्वों पर सातों जाति इसकी पूजा करती हैं किंतु करवा चौथ मनाने एवं कुछ विवाहित युवकों की मृत्यु के कारण यह व्रत रखने की प्रथा इस गांव से स्वतः समाप्त हो गई। समाजसेवी ने बताया कि राम नगला गांव के लोग तो बघा का पानी पीने से भी परहेज करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि बघा में सती की पूजा देवी की तरह की जाती है। देश के कम्प्यूटर युग में पहुंच जाने के बावजूद किसी में इस प्रथा को तोड़ने की हिम्मत नहीं है क्योंकि लोग सती के श्राप को एक प्रकार से देवी का आदेश मानते हैं।

  • जानिए कैसे शुरू हुई थी करवा चौथ का व्रत रखने की परंपरा

    नई दिल्ली : करवा चौथ का हिंदू धर्म में काफी महत्व है। महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के साथ इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं जिससे उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है व्रत रखने की ये परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है. इस साल ये तिथि एक नवंबर को पड़ रही है। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 31 अक्टूबर को रात 9 बजकर 30 मिनट पर शुरू होगी और एक नवंबर को रात 9 बजकर 19 मिनट पर खत्म होगी। ऐसे में करवा चौथ का व्रत एक नवंबर को रखा जाएगा। सालों से सुहागिन महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती आ रही है।

    लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये परंपरा कब से और कैसे शुरू हुई? आइए जानते हैं सबसे पहले किसने रखा था करवा चौथ का व्रत। मान्यताओं के मुताबिक सबसे पहले करवा चौथ का व्रत माता पार्वती ने भगवान शंकर के लिए रखा था। तभी से इस व्रत को रखने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि कहा ये भी जाता था कि एक बार ब्रह्मदेव ने सभी देवियों को अपने पतियों के लिए करवा चौथ का व्रत रखने के लिए कहा था जिसके बाद से ये परंपरा शुरू हुई। इससे जुड़ी पौराणिक कथा भी प्रचलित है। वहीं महाभारत में भी करवा चौथ से जुड़ी कथा का वर्णन मिलता है।

    कहा जाता है कि द्रौपदी ने भी पांडवों की रक्षा के लिए इस व्रत को रखा था। उन्हें ये व्रत रखने की सलाह श्री कृष्ण ने दी थी। पौराणिक कथा के मुताबिक जब देवताओं और राक्षसों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया और पूरी ताकत लगा देने के बावजूद जब देवताओं को हार का सामना करना पड़ रहा था तब ब्रह्मदेव ने देवियों से अपने पति की रक्षा के लिए कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का व्रत रखने के लिए कहा था। माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से ही देवता असुरों पर विजय प्राप्त कर सके थे। इस खबर को सुनकर देवियां काफी प्रसन्न हुई और उन्होंने अपना व्रत खोला। तभी से पतियों की सलामती के लिए इस व्रत को रखा जाने लगा।