Category: Spiritual

  • आज साल का आखिरी सूर्य ग्रहण, जानें कौन सी राशियां होंगी प्रभावित

    आज साल का आखिरी सूर्य ग्रहण, जानें कौन सी राशियां होंगी प्रभावित

    धर्मः ब्लड मून चंद्र ग्रहण के बाद, एक और खगोलीय घटना आज घटित होने वाली है। दरअसल, आज रात साल का दूसरा और आखिरी सूर्य ग्रहण लगने जा रहा है। यह ग्रहण कन्या राशि में लगेगा। साथ ही, आज ग्रहण के साथ साथ सर्वपितृ अमावस्या का संयोग भी बन रहा है। वैदिक पंचांग और भारतीय तिथि अनुसार यह आंशिक ग्रहण होगा, जो भारत में नजर नहीं आएगा। इसलिए यहां धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक काल लागू नहीं होगा। ऐसे में सभी धार्मिक कार्य अपने समयानुसार होंगे। ग्रहण का आरंभ आज रात 11 बजे होगा और यह कल यानी 22 सितंबर की सुबह 3 बजकर 23 मिनट तक चलेगा। इस दिन पितृ विसर्जनी अमावस्या, जिसे सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या भी कहा जाता है, का विशेष संयोग बन रहा है। खगोलिए वैज्ञानिकों अनुसार, पृथ्वी और सूर्य के बीच में चंद्रमा कहीं न कहीं जरूर आएगा। कई बार उसका एंगल महासागर से निकल जाता है। इसलिए वो कई बार नजर नहीं आता। चूंकी वहां मानव मौजूद नहीं होते हैं। इसलिए वो नजर नहीं आता। ग्रहण का खेल एंगल और शैडो का होता है। यदि उस एंगल पर कोई आता है तो चंद्रमा सूर्य के उतने भाग को ढक लेगा। जब तक चंद्रमा क्रॉस नहीं होता तब तक सूर्य उतने एंगल पर नजर नहीं आएगा। चंद्रमा के निकलते से ही सूर्य हमें दिखने लग जाएगा। यह सूर्य ग्रहण आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को कन्या राशि और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में लगेगा। सूर्य ग्रहण भारत में न दिखने के कारण इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा। ऐसे में सभी धार्मिक कार्य अपने समयानुसार होंगे। इस बार ग्रहण और सर्वपितृ अमावस्या का संयोग बन रहा है। हालांकि भारत में यह ग्रहण दिखाई नहीं देगा, लेकिन ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार इसका असर प्रकृति और जीवन पर अवश्य पड़ सकता है।

    कहां दिखेगा सूर्य ग्रहण

    सितंबर का यह आंशिक सूर्य ग्रहण दक्षिणी प्रशांत महासागर, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, अटलांटिक महासागर, हिंद महासागर, दक्षिण महासागर, पोलिनेशिया, मेलानेशिया, नॉरफॉक द्वीप, आइलैंड, क्राइस्टचर्च और वेलिंग्टन सहित कई देशों में नजर आएगा।

    इस समय होगा प्रभाव

    सर्वपितृ अमावस्या की तिथि 21 सितंबर की रात 12 बजकर 17 मिनट से शुरू होकर 22 सितंबर की रात 1 बजकर 23 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार यह पर्व 21 सितंबर को ही मनाया जाएगा। इस बार पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के साथ चतुष्पद करण का विशेष योग भी बन रहा है।

    इन राशियों पर पड़ सकता है असर

    कन्या राशि: यह ग्रहण इसी राशि में लग रहा है, इसलिए जातकों को सेहत और निर्णय लेने में सावधानी रखनी होगी। मीन राशि: इस राशि वालों के लिए आर्थिक मामलों और रिश्तों में उतार-चढ़ाव आ सकता है। मिथुन राशि: कामकाज में अड़चनें आ सकती हैं, तनाव बढ़ सकता है। धनु राशि: यात्रा और खर्चों में सतर्क रहना होगा। शुभ प्रभाव वाली राशियां वृषभ राशि: रुके हुए काम पूरे होने की संभावना है। सिंह राशि: करियर और मान-सम्मान में वृद्धि के योग बन रहे हैं। मकर राशि: पारिवारिक जीवन में सुधार और लाभ की स्थिति बनेगी।
  • सर्वपितृ अमावस्या पर लग रहा है साल का आखिरी सूर्य ग्रहण, जानें कैसे करें इस दिन श्राद्ध-तर्पण

    सर्वपितृ अमावस्या पर लग रहा है साल का आखिरी सूर्य ग्रहण, जानें कैसे करें इस दिन श्राद्ध-तर्पण

    धर्म: इस साल पितृ पक्ष की समाप्ति के साथ सूर्य ग्रहण भी लग रहा है। 21 सितंबर को सर्व पितृ अमावस्या पड़ रही है। इस दिन सभी पितरों को श्रद्धांजलि दी जाएगी परंतु इस दिन ग्रहण का साया भी मंडरा रहा है। सूर्य ग्रहण भारतीय समय के अनुसार, रात 10:59 से लेकर देर रात 3:23 तक रहेगा। यह ग्रहण रात में लग रहा है इसलिए भारत में नजर नहीं आएगा और न ही यहां पर इसका सूतक काल मान्य होगा।

    श्राद्ध कर्म पर नहीं होगा ग्रहण का असर

    भारत में ग्रहण नहीं लगेगा तो इसका अर्थ है कि सर्व पितृ अमावस्या पर भारत में श्राद्ध कर्म करने वालों पर भी ग्रहण का कोई प्रभाव नहीं होगा। सूतक न होने के कारण आप सारा दिन अमावस्या से जुड़े हुए धर्म-कर्म के काम कर सकते हैं। इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए सुबह 11:50 से लेकर दोपहर 1:27 तक का मुहूर्त रहेगा। इस दौरान आप पूर्वजों की बिना रुकावट के पूजा कर सकते हैं। ब्राह्राणों को भोजन करवा सकते हैं। दोपहर के समय के स्वामी पितर माने जाते हैं। ऐसे में गाय के गोबर से बने हुए कंडे जलाएं और पितरों का ध्यान करते हुए अंगारों पर गुड़-घी अर्पित करें। इसके बात हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों की तर्पण दें।

    पीपल की करें पूजा

    अमावस्या वाले दिन शाम को पीपल के पेड़ की पूजा जरुर करें। इसके नीचे सरसों के तेल का दीया जलाएं और सरोवर में दीपदान करें। इससे पितरों को अपने लोक में लौटने में आसानी होगी।

    इसलिए खास है सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध

    गरुड़ पुराण की मानें तो अमावस्या तिथि श्राद्ध परिवार के उन पूर्वजों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु अमावस्या, पूर्णिमा और चतुर्दशी तिथि वाले दिन हुई हो। यदि कोई सभी तिथियों पर श्राद्ध न कर पाए तो वह अमावस्या तिथि पर श्राद्ध कर सकता है। यह श्राद्ध परिवार के पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए बेहद जरुरी माना जाता है।  
  • बोधगया में भगवान बुद्ध को मिला था ज्ञान, बौद्ध धर्म की धरोहर माना जाता है Bihar

    बोधगया में भगवान बुद्ध को मिला था ज्ञान, बौद्ध धर्म की धरोहर माना जाता है Bihar

    धर्म: बिहार को बौद्ध धर्म की कर्मभूमि कहते हैं। बोधगया में भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था और यहीं से उनके धर्म प्रचार की शुरुआत हुई थी। इतिहासकारों की मानें तो उस दौरा में यह इलाका मगध सम्राज्य का हिस्सा था। ऐसे में शिक्षा और संस्कृति का भी यह एक बड़ा केंद्र था। आज के समय में भी बोधगया का महाबोधि मंदिर और बोधि वृक्ष पूरी दुनिया भर के बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख स्थान है। हर साल हजारों लोग यहां पर पहुंचकर भगवान बुद्ध से जुड़ा इतिहास और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं। इसी कारण से बिहार को बौद्ध धर्म की धरोहर माना जाता है।

    बौद्ध धर्म का जन्मस्थान कहलाता है बोधगया

    बिहार का बोधगया बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र तीर्थस्थान माना जाता है। गया जिले में स्थित महाबोधि मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। आज भी वहां पर करोड़ों श्रद्धालु और पर्यटको दर्शन के लिए जाते हैं। मान्यता यह है कि करीबन 25,000 साल पहले यहां बोधिवृक्ष के नीचे राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने गहन साधना के जरिए ज्ञान की प्राप्ति की थी और बुद्ध बने। मंदिर परिसर में स्थित बोधवृक्ष आज भी बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए आस्था का केंद्र माना जाता है। खासकर इसी कारण बोधगया को बौद्ध धर्म का जन्मस्थान कहते हैं।

    मगध में धर्म और शिक्षा का केंद्र

    बिहार का मग्ध क्षेत्र भी भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के बाद बौद्ध धर्म का मुख्य केंद्र बना था। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद में यहीं से धर्म के प्रसार की शुरुआत की थी और इसको अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। नालंदा और विक्रमशीला विश्वविद्यालयों ने मगध को शिक्षा का केंद्र बनाया और जहां पर एशिया और दुनिया के कई देशों से बच्चे पढ़ाई के लिए आते थे। इस संस्थानों ने ही बौद्ध दर्शन, साहित्य और संस्कृति को एक नई ऊंचाई दी थी। आज भी इनका अवशेष बिहार की गौरवशाली विरासत और बौद्ध धर्म की शक्ति का प्रतीक माने जाते हैं।

    महिलाओं को संघ में प्रवेश की मिली थी अनुमति

    बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार पूरी दुनिया में बिहार से ही शुरु हुआ था। भगवान बुद्ध ने यही से अपने प्रथम शिष्यों को शिक्षा दी और धर्म चक्र प्रवर्तन की शुरुआत की थी। राजगीर, वैशाली और पावापुरी जैसे स्थान इसी ऐतिहासिक यात्रा के साक्षी थे। वैशाली में बुद्ध ने महिलाओं को संघ में प्रवेश करने की अनुमति दी थी। यह पहल समाज सुधार के लिए अहम मानी जाती है। बिहार से उठी यह शिक्षा सीमाओं को पार करके नेपाल, श्रीलंका, तिब्बत, चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंची। ऐसे में आज भी ये स्थान बौद्ध धर्म की आस्था और ऐतिहासिक धरोहर का प्रतीक माने जाते हैं।

    बौद्ध संस्कृति की धरोहर है बिहार

    बिहार आज भी बौद्ध धर्म का मुख्य केंद्र माना जाता है। बोधगया, राजगीर, वैशाली और नालंदा धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही जरुरी माने जाते हैं। बोधगया अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन और ध्यान शिविरों के लिए भी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। राजगीर और वेशाली अपनी प्राचीन बौद्ध स्थानों के लिए श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। वहीं नालंदा यूनिवर्सिटी की विरासत अब भी शोध और पर्यटन का मुख्य केंद्र मानी जाती है।  
  • इस दिन लगेगा साल का आखिरी सूर्यग्रहण, भारत में कितना दिखेगा असर जानें?

    इस दिन लगेगा साल का आखिरी सूर्यग्रहण, भारत में कितना दिखेगा असर जानें?

    धर्म: 21 सितंबर को ज्योतिषीय घटना होने वाली है। ऐसे में इस दिन साल का आखिरी सूर्यग्रहण लगने वाला है। यह सूर्यग्रहण भारत में नहीं दिखेगा परंतु खास बात यह है कि साल का आखिरी सूर्य ग्रहण के दिन पितृ पक्ष खत्म हो जाएगा और सर्वपितृ अमावस्या का संयोग भी बन रहा है। इस दिन अश्विन महीने की शुक्ल पक्ष की अमावस्या तिथि लगने वाली है। सूर्यग्रहण कन्या और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में लगेगा। खगोलविदों की मानें तो सूर्य ग्रहण उस समय लगता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आता है। इससे सूर्य की रोशनी आंशिक या फिर पूरी तरह से छिप जाती है। इससे पृथ्वी पर एक छाया बनती है जो पूरी, आंशिक या वलयाकर ग्रहण के तौर पर दिखाई देगी। भारतीय समय के अनुसार, 21 सितंबर को लगने वाला यह सूर्यग्रहण रात में 11 बजे शुरु होगा और इसका समापन देर रात 3:23 पर होगा। इस ग्रहण की कुल अवधि 4 घंटे से ज्यादा होगी।

    भारत में नहीं दिखेगा सूर्यग्रहण

    साल का आखिरी सूर्यग्रहण भारत में नजर नहीं आया है। यह दक्षिणी गोलार्ध के कई हिस्सों में दिखेगा जैसे अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी प्रशांत महासागर, न्यूजीलैंड और अफ्रीका के कई हिस्से इस सूर्यग्रहण में शामिल होंगे। ज्योतिष शास्त्रों की मानें तो भारत में ग्रहण नजर नहीं आएगा। ऐसे में इसका धार्मिक और आधात्मिक असर भी यहां नहीं दिखेगा। इसका अर्थ है कि भारत में रहने वाले लोगों के लिए दिन आम ही रहेगा और उनकी डेली रुटीन पर भी कोई असर नहीं होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस ग्रहण का असर सिर्फ वहीं पर होगा जहां पर यह नजर आएगा।

    बरते यह सावधानियां

    सूर्यग्रहण के दौरान कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए। इस दौरान कुछ नहीं खाना चाहिए। प्रेग्नेंट महिलाओं और बुजुर्गों को घर में से बाहर नहीं निकलना चाहिए हालांकि भारत में सूर्यग्रहण नहीं दिखेगा इसलिए इन नियमों का पालन करने की जरुरत नहीं है। इस समय का इस्तेमाल आप भगवान का ध्यान करने में लगाए। ग्रहण खत्म होने के बाद नहाएं और दान का संकल्प लें।

    इस तरह करें ग्रहण के अशुभ प्रभाव से बचाव

    सूर्य ग्रहण के दौरान अपने गुरु मंत्रों और भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें। इसके अलावा इस दिन ग्रहण के मोक्ष काल में दान करें। गुड़, अन्न यानी आटा-गेहूं या फिर तांबे के बर्तनों का दान करें। इस दौरान ये चीजें दान करना बहुत ही शुभ माना जाता है।    
  • इस दिन से शुरु होंगे शारदीय नवरात्रि, जानें घट स्थापना का शुभ मुहूर्त

    इस दिन से शुरु होंगे शारदीय नवरात्रि, जानें घट स्थापना का शुभ मुहूर्त

    धर्म: हर साल पूरे उत्साह और उमंग के साथ नवरात्रि का पावन त्योहार मनाया जाता है। पितृपक्ष खत्म होने के बाद शारदीय नवरात्रि शुरु होते हैं। इस साल नौ नहीं 10 दिन के शारदीय नवरात्रि होंगे। इस बार एक तिथि में बढ़ोतरी हो रही है। नवरात्रि में एक दिन बढ़ना शुभ माना जाता है। शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रुपों की विधि विधान के साथ अराधना की जाती है। नौ दिन नवरात्रि का व्रत करने के बाद नवमी वाले दिन कन्या पूजन और दशमी तिथि पर व्रत का पारण किया जाता है।

    22 सितंबर से शुरु होगी नवरात्रि

    इस बार शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर से शुरु हो रहे हैं। अश्विन महीने की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत इस बार 22 सितंबर को रात 01:23 मिनट पर होगी ऐसे में नवरात्रि का पहला दिन 22 सितंबर को पड़ेगा। इसी दिन कलश भी स्थापित किया जाएगा।

    कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

    इस बार कलश स्थापना के लिए सुबह 6:09 बजे से लेकर 8:09 बजे तक होगा। यदि दोपहर में घट स्थापना कर रहे हैं तो अभिजीत मुहूर्त 11:49 से लेकर 12:38 तक रहेगा। यह समय घट स्थापना के लिए शुभ माना जाता है।

    इसलिए खास होते हैं शारदीय नवरात्रि

    पंचाग के अनुसार, इस साल श्राद्ध पक्ष में एक तिथि कम हो रही है और नवरात्रि में एक तिथि बढ़ रही है। ऐसे में इस साल नौ दिन नहीं 10 दिन के लिए नवरात्रि होगी। ऐसे में शारदीय नवरात्रि में चतुर्थी तिथि की वृद्धि हो रही है। नवरात्रि में तिथि बढ़ना शुभ माना जाता है। इस बार माता का आगमन बहुत शुभ होने वाला है। 22 सितंबर को कलश स्थापना होगी।

    हाथी पर सवार होकर आ रही मां दुर्गा

    मां दुर्गा का आगमन और प्रस्थान हफ्ते के दिन के मुताबिक होता है। इस बार नवरात्रि की शुरुआत 22 सितंबर सोमवार हो रही है। यदि नवरात्रि की प्रतिपदा सोमवार या रविवार को हो तो मां दुर्गा हाथी पर आती हैं। हाथी पर सवार होकर आना शुभ लक्षण का प्रतीक है। ऐसे में पूरे साल सुख-समृद्धि और सौभाग्य का संचार होगा।  
  • अहोई अष्टमी के व्रत पर इस विधि से करें पूजा, संतान को मिलेगा लंबी उम्र का आशीर्वाद

    अहोई अष्टमी के व्रत पर इस विधि से करें पूजा, संतान को मिलेगा लंबी उम्र का आशीर्वाद

    धर्म: कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि वाले दिन अहोई का व्रत रखा जाता है। यह व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद आता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और अच्छे भविष्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं। व्रत का पारण शाम को तारों को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है।

    13 अक्टूबर को रखा जाएगा व्रत

    कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 13 अक्टूबर को रात 12:24 पर शुरु होगी। इस तिथि का समापन 14 अक्टूबर को सुबह 11:09 मिनट पर होगा। ऐसे में इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 13 अक्टूबर को रखा जाएगा। द्रिक पंचागों के अनुसार, अहोई अष्टमी की पूजा का समय शाम 5:53 मिनट से शुरु होगा और 07:08 पर खत्म होगा। इस दिन तारों को अर्घ्य देने का समय शाम 06:17 पर होगा। वहीं चंद्रोदय का समय रात 11:20 मिनट है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से अहोई माता संतान को लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद देती हैं। ऐसा माना जाता है कि यदि निसंतान महिलाएं यह व्रत रखती हैं तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति मिलती है। यह व्रत कठिन होता है और इसे निर्जला रखा जाता है।

    ऐसे करें पूजा

    इस दिन सबसे पहले पूरे शिव परिवार की विधि के साथ पूजा करें। इसके बाद अहोई अष्टमी की व्रत कथा का पाठ या फिर श्रवण करें। कथा सुनते समय अपने हाथ में सात तरह के अनाज रखें और कथा पूरी होने के बाद इसको गाय को खिला दें। इसके अलावा व्रत कथा का पाठ करते हुए अपने बच्चों को भी साथ बिठाएं। पूजा के बाद सबसे पहले अपने बच्चों को प्रसाद दें।

    इस बात का भी रखें ध्यान

    मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत के दौरान कुछ खास सावधानी बरतनी चाहिए। इस दिन कोई भी मिट्टी से जुड़ा या फिर नुकीली वस्तुएं इस्तेमाल न करें। तारों को अर्घ्य देते समय स्टील के लौटे का इस्तेमाल करें। व्रत के दौरान किसी का अपमान न करें और न ही अपने दिमाग में कोई नेगेटिव विचार लेकर आएं। ऐसा करने से आपको पूजा का पूरा फल नहीं मिलेगा।  
  • इंदिरा एकादशी पर भगवान विष्णु की मिलेगी कृपा, इस विधि से करें श्रीहरि को प्रसन्न

    इंदिरा एकादशी पर भगवान विष्णु की मिलेगी कृपा, इस विधि से करें श्रीहरि को प्रसन्न

    धर्म: हिंदू धर्म में एकादशी का खास महत्व बताया गया है। सालभर में कुल 24 एकादशियां आती है और हर एकादशी की अपनी धार्मिक मान्यता होती है। पितृपक्ष में पड़ने वाली एकादशी बहुत ही पवित्र मानी जाती है। इस एकादशी को इंदिरा एकादशी कहते हैं। मान्यताओं के अनुसार, इश दिन किया गया व्रत और पूजा पितरों को समर्पित होती है और उन्हें मोक्ष मिलता है।

    17 सितंबर को रखा जाएगा व्रत

    द्रिक पंचागों के अनुसार, इस साल इंदिरा एकादशी का व्रत 17 सितंबर बुधवार को रखा जाएगा। एकादशी तिथि की शुरुआत सुबह 12:21 पर होगी और इसका समापन रात 11:39 पर होगा। इसी दिन एकादशी का व्रत रखा जाएगा। व्रत का पारण अगले दिन 18 सितंबर को होगा। पंचाग के अनुसार, 18 सितंबर को सुबह 6:07 से लेकर 8:34 बचे के बीच स्नान-ध्यान करके पूजा-पाठ के बाद व्रत खोल सकते हैं।

    इसलिए खास है इंदिरा एकादशी

    इस एकादशी को श्राद्ध एकादशी भी कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और तर्पण करने से जातक के पापों का नाश होता है और उनके पूर्वजों को मोक्ष मिलता है। ऐसा करने से साधक को सुख-समृद्धि और शांति मिलती है। माना जाता है कि इस व्रत को करने वाला जातक सांसारिक सुखों का आनंद लेने के बाद अंत में बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।

    इस व्रत की पूजा विधि भी बहुत ही खास होती है। सुबह उठकर नहाने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर व्रत का संकल्प लें। पितरों को याद करके उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें। इसके बाद पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा रखकर दीपक जलाएं। उन्हें पीले फूल और मिठाई चढ़ाएं क्योंकि पीला रंग श्रीहरि को बहुत ही प्रिय होता है। इसके बाद पूजा सामग्री चढ़ाकर व्रत की कथा सुनें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करके सबको प्रसाद बांटें।

    इन चीजों का करें दान

    इस दिन पितरों की शांति और संतुष्टि के लिए इस दिन दान करना बहुत ही शुभ माना जाता है। घी, दूध, दही और अन्न का दान करें। इससे घर में सुख-समृद्धि और धन की बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा जरुरतमंदों को खाना खिलाएं इससे पितृ प्रसन्न होंगे और परिवार पर उनका आशीर्वाद भी बना रहेगा।

     

  • बेहद खास है आज की तारीख, मंगल ग्रह ने बनाया महासंयोग

    बेहद खास है आज की तारीख, मंगल ग्रह ने बनाया महासंयोग

    धर्म: आज 9 तारीख है। अंक ज्योतिष के अनुसार, यह तारीख बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस तारीख का मूलांक 9 है और यह बहुत ही दुर्लभ संयोग लेकर आई है। इस तिथि पर मंगलवार का दिन आया है और मंगल का मूलांक भी 9 होता है। वर्ष 2025 का मूंलाक भी 9 है और इसके स्वामी भी मंगल है। ऐसे में ज्योतिष शास्त्र के अनुसार आज 999 का महासंयोग बन रहा है। 9 सितंबर को मंगल ग्रह की एनर्जी काफी होगी ऐसे में जिन जातकों की कुंडली में मंगल कमजोर है या अशुभ स्थिति में है तो उनको शारीरिक, मानसिक या आर्थिक दिक्कतों से जूझना पड़ सकता है। 2025 मंगल का ही साल है ऐसे में इस साल सेहत, कामकाज, करियर और रिश्तों में कुछ उतार-चढ़ाव की दिक्कत हो सकती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मंगल को ऊर्जा, साहस, शक्ति, युद्ध, रक्त और भूमि के साथ जुड़ा होता है। इसी कारण से इस साल में कई देशों और क्षेत्रों में लड़ाई-झगड़े, प्राकृतिक आपदाओं या अनहोनी की खबरें सुनने को मिल रही है।

    इन बातों का रखें ध्यान

    . जल्दबाजी में कोई फैसला न लें। जल्दबाजी में किया गया काम आपके लिए बड़ी मुश्किल खड़ी करेगा। . किसी से भी पैसे का उधार न लें। उधार और कर्ज से दूरी बनाएं। . घर में नुकीली या फिर धारदार चीजें खरीदकर लाने से भी बचें। .ऐसे लोग जिनकी कुंडली में मंगल कमजोर है वो खास तौर पर सावधानी बरतें। . घर में से अकेले बाहर न जाएं। कोई जोखिमभरा काम न करें। . निवेश या बड़ा आर्थिक फैसला अभी के लिए न लें। प्रॉपर्टी के मामले में भी कोई बड़ी यदि डील करने वाले हैं तो बचें। . ज्यादा तामसिक या भारी खाना न खाएं। . सेहत और खान-पान का खास ध्यान रखें। . यदि आपकी कुंडली में मंगल कमजोर है तो खासतौर पर सावधानी बरतें।

    ये उपाय करेंगे मंगल का ग्रह कम

    . लाल कपड़ा, फल या फिर कोई लाल वस्तु गरीबों को दान करें। . अगर आपकी जन्मकुंडली में मंगल अशुभ है और आपका मूलांक 9, 18 या 27 है तो मंदिर में लाल फूल दान करें। . मंगलवार वाले दिन हनुमान जी की पूजा करें।  
  • Pitru Paksha: श्राद्ध पक्ष में इस तरह करें पितरों को प्रसन्न, जानें विधि

    Pitru Paksha: श्राद्ध पक्ष में इस तरह करें पितरों को प्रसन्न, जानें विधि

    धर्म: भारतीय संस्कृति में श्राद्ध कर्म बेहद जरुरी माने गए हैं। यह पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए किए जाते हैं। पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान करते हैं। उनका श्राद्ध करके उन्हें याद करते हैं। इस बाद पितृ पक्ष 7 सितंबर से शुरु हो चुका है और 21 सितंबर तक रहेगा। ऐसा माना जाता है कि श्राद्ध पक्ष में पितरों को तर्पण देने से न सिर्फ वो खुश होते हैं बल्कि घर परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद भी देते हैं। शास्त्रों की मानें तो श्राद्ध कर्म विधि-विधान के साथ करने से पितर सभी गलतियों को माफ कर देते हैं।

    इस तरह करें पितरों को तर्पण

    तर्पण विधि के लिए गंगाजल, लोटे में जल, आधा गिलास कच्चा दूध, चावल (बिना टूटे हुए), कुशा, परात। अब सबसे पहले लोटे में जल लेकर उसमें गंगाजल मिलाएं। इसके बाद लोटे में काले तिल और दूध भी मिलाएं। हाथ के ठीक नीचे परात को लकड़ी की चौकी पर रखें। फिर सबसे पहले कुशा लें और हाथ में अक्षत लेकर जल डालकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश को अर्पित करें। अब जिन भी पितरों को आप तर्पित कर रहे हैं उनको मन ही मन में याद करें। उनका नाम लें और ऊं पितृभ्यो नम: मंत्र का जाप करें। फिर बाएं हाथ से लोट के अंदर ही सामग्री के साथ जल अपने दाएं हाथ पर धीरे-धीरे डालें। इसके बाद परात का जल किसी पौधे में डाल दें। इस विधि को आप दोपहर में 12 बजे के आस-पास करें। यदि इस समय संभव न हो तो जिस समय बनता हो उस समय करें परंतु सूर्यास्त से पहले ही पितरों का तर्पण करें। इसके बाद अपनी श्रद्धा के अनुसार, जितने भी ब्राह्मणों को आप भोजन करवाना चाहते हैं करवा लें। इस बात का ध्यान रखें कि इस दिन गाय, कौए और कुत्ते को जरुर खाना दें।    
  • Lunar Eclipse 2025: शुरु हुआ चंद्रग्रहण का सूतक काल, भूलकर भी न करें ये काम

    Lunar Eclipse 2025: शुरु हुआ चंद्रग्रहण का सूतक काल, भूलकर भी न करें ये काम

    धर्म: वैज्ञानिक ही नहीं धार्मिक दृष्टि से भी चंद्रग्रहण बेहद जरुरी माना जाता है। इसका असर व्यक्ति के जीवन पर भी होता है। ऐसे में ग्रहण के दौरान कुछ काम करना वर्जित माना जाता है। चंद्रग्रहण का सूतक काल दोपहर 12:57 से शुरु हो चुका है। साल का दूसरा चंद्रग्रहण की शुरुआत 7 सितंबर 09:58 पर शुरु होगा और इसका समापन 8 सितंबर को देर रात 01:26 मिनट पर होगा। यह एक पूर्ण चंद्रग्रहण है ऐसे में इसका असर भारत पर भी होगा। चंद्रग्रहण के 9 घंटे पहले ही सूतक काल शुरु हो चुका है जो कि अब ग्रहण के बाद ही खत्म होगा। Read in English:
    Rare ‘Blood Moon’ to Illuminate Night Sky Tonight: India Among Best Viewing Spots

    सूतक काल में न करें ये काम

    . चंद्रग्रहण के दौरान पूजा-पाठ करना या फिर देवी-देवताओं की मूर्तियों को हाथ नहीं लगाना चाहिए। इस अवधि में खाना खाने या फिर सोने से भी बचना चाहिए क्योंकि इससे जीवन में नेगेटिविटी बढ़ सकती है। . इसके अलावा चंद्रग्रहण के दौरान कहीं बाहर भी न जाएं खासतौर पर किसी सूनसान या नकरात्मक जगह पर जाने से बचें। इस दौरान तुल

    तुलसी के पत्ते करें इस्तेमाल 

    ग्रहण के नकरात्मक प्रभाव से बचने के लिए खाने और बाकी पवित्र चीजों में तुलसी के पत्ते डालकर रखें। चंद्रग्रहण के नियमों को सबसे ज्यादा ध्यान प्रेग्नेंट महिलाओं को रखना चाहिए। चंद्र ग्रहण कभी भी नग्न आंखों से नहीं देखना चाहिए और न ही इस दौरान कोई नुकीली चीज का इस्तेमाल न करें।

    प्रेग्नेंट महिलाएं रखें खास ध्यान

    बता दें कि यह विशेष ग्रहण पितृपक्ष में लग रहा है और इस ग्रहण काल में पितृक्रम मान्य है और इसके जाप का फल भी एक लाख गुना ज्यादा मिलता है। ज्योतिष के अनुसार, ग्रहण के स्पर्श, मध्य और मोक्ष काल में स्नान करने के साथ साधना और दान करें। सूतक काल में खाना वर्जित है और इस दौरान प्रेग्नेंट महिलाओं को बाहर नहीं निकलना चाहिए और न ही सोना चाहिए।