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  • इस जगह होती है Ravana की पूजा, वंशज मनाएंगे शोक, जानें इस प्रथा का इतिहास

    इस जगह होती है Ravana की पूजा, वंशज मनाएंगे शोक, जानें इस प्रथा का इतिहास

    धर्मः आज जहां देश भर में लोगों द्वारा दशहरा पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा और भगवान राम की ओर से रावण वध के अवसर पर लोग राम नाम के जयकारें लगाएंगे, लेकिन देश का एक ऐसा भी इलाका है जहां, दशहरा आम तरीके से नहीं मनाया जाएगा और वहां रावण की पूजा होगी। यह जगह है जोधपुर। वहां रावण के पुतलों का दहन होगा, लेकिन जब जोधपुर में दहन होगा तो रावण के चबूतरे से करीब 5 किमी दूर चांदपोल के पास कुछ लोग शोक मना रहे होंगे। यह लोग श्रीमाली ब्राह्मण के दवे गोधा ब्राह्मण, यही गोत्र रावण का है। यह रावण के वंशज के रूप में जाने जाते हैं, इसलिए वे दशहरे के दिन शोक रखते हैं। किला रोड पर रावण का मंदिर बना है। दशहरे के दिन रावण के मंदिर में पूजा-अर्चना भी होती है। इस मंदिर में रावण और मंदोदरी की मूर्ति लगी है। इस मंदिर का निर्माण भी गोधा गौत्र के श्रीमाली ब्राह्मणों की ओर से करवाया गया है। वहीं दहन के बाद स्नान कर अपनी अपनी जनेऊ भी बदलते हैं। जानकारी देते पंडित ने बताया कि हम रावण के वंशज दवे गौधा गोत्र के लोग कभी उनका दहन नहीं देखते हैं, क्योंकि वो हमारे पूर्वज हैं। अश्वनी मास की दशमी को श्री राम ने रावण का वध किया था। इस दिन हम शोक रखते हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में दहन नहीं हुआ था तब भी शोक का क्रम जारी था। हम रावण के गुणों की पूजा करते हैं, रावण बहुत ज्ञानी और कई कलाओं में निपुण और महान शिव भक्त था, इसलिए इनके दर्शन से व्यक्ति की बुद्धि में तीव्रता आती है।

    ये है मान्यता

    मान्यता है कि मायासुर ने ब्रह्मा के आशीर्वाद से अपसरा हेमा के लिए मंडोर शहर का निर्माण किया था। दोनों की संतान का नाम मंदोदरी रखा। पौराणिक कथाओं के अनुसार मंडोर का नाम मंदोदरी के नाम पर रखा गया है। मंदोदरी बहुत सुंदर थी, लेकिन मंदोदरी के योग्य वर नहीं मिला तो अंत में रावण पर मायासुर की खोज समाप्त हुई. लंका के राजा, लंकाधिपति रावण जो स्वयं एक प्रतापी राजा होने के साथ-साथ एक गुणी विद्वान भी था, जिसके साथ मंदोदरी का विवाह हुआ। कहा जाता है कि जब विवाह हुआ था तब लंका से बाराती बन आए दवे गोधा गोत्र के कुछ लोग यहीं रह गए थे, जिनकी पढ़ियां वर्तमान में वंशज के रूप में जानी जाती हैं।

    इस तरीके से होती है पूजा

    पंडित के अनुसार जब पुतला जलाया जाता है, तो दहन के बाद स्नान करना अनिवार्य होता है। पूर्व में जलाशय होते थे तो हम सभी वहां स्नान करते थे, लेकिन आजकल घरों के बाहर स्नान किया जाता है। जनेऊ बदला जाता है। इसके बाद मंदिर में रावण व शिव की पूजा की जाती है। इस दौरान मंदोदरी की भी पूजा होती है। इसके बाद प्रसाद ग्रहण किया जाता है। उनके अनुसार गोधा गोत्र वाले रावण का दहन कभी नहीं देखते हैं। शोक की प्रथा लंबे समय से चली आ रही है।
  • घर से इन चीजों को हटाएं, नकारात्मका ऊर्जा होगी दूर, मां लक्ष्मी की होगी कृपा

    घर से इन चीजों को हटाएं, नकारात्मका ऊर्जा होगी दूर, मां लक्ष्मी की होगी कृपा

    धर्मः वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में रखी हर वस्तु का व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। घर में मौजूद कुछ चीजें सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती हैं तो कुछ नकारात्मक ऊर्जा को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। जब घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ने लगता है, तो इसका असर सीधा-सीधा परिवार के सदस्यों की सेहत, आपसी रिश्तों, मानसिक शांति और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।

    ऐसा भी माना जाता है कि मां लक्ष्मी उन घरों में निवास करती हैं जो स्वच्छ और सकारात्मक ऊर्जा से भरे होते हैं। लेकिन, अगर घर में खराब वस्तुएं पड़ी हों जो वास्तु दोष पैदा करती हैं, तो मां लक्ष्मी की कृपा धीरे-धीरे कम होने लगती है। नतीजनत घर में धन की कमी, आपसी तनाव और तरक्की में रुकावट जैसी परेशानियां आने लगती हैं।

    – बंद घड़ी: घर में खराब या बंद पड़ी हुई घड़ी को रखना अशुभ माना जाता है। वास्तु के अनुसार, रुकी हुई घड़ी जीवन में रुकावट, ठहराव और प्रगति में बाधा लाती है। इससे घर के सदस्यों की तरक्की थम जाती है और आर्थिक समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसलिए, घर में हमेशा चलती हुई घड़ी ही रखें और खराब घड़ी को तुरंत हटा दें।

    – जंग लगा लोहा: टूटा-फूटा और जंग लगा लोहे का सामान घर की ऊर्जा को प्रभावित करता है। यह दरिद्रता और नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। घर में जंग लगे लोहे का जमा होना कार्यक्षेत्र में असफलता, आर्थिक हानि और स्वास्थ्य समस्याओं को भी आमंत्रित करता है। इसलिए इस तरह का सामान तुरंत घर से बाहर कर दें।

    – छत पर कबाड़: कई लोग अपने घर की छत पर पुराने सामान या कबाड़ जमा कर देते हैं। लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार छत पर पड़ा कबाड़ घर की सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को रोक देता है। इससे घर के लोगों में मानसिक तनाव बढ़ता है और लक्ष्मी कृपा भी दूर हो जाती है। छत और घर को हमेशा साफ-सुथरा रखें।

  • इस दिन से शरू होंगे Sharadiya Navratri, अखंड दीप जलाते समय रखे इन बातों का ध्यान

    इस दिन से शरू होंगे Sharadiya Navratri, अखंड दीप जलाते समय रखे इन बातों का ध्यान

    धर्मः इस बार नवरात्र 10 दिनों की होगी और 22 सितंबर से शारदीय नवरात्र प्रारंभ हो रहे है। नवरात्र के पूरे 9 दिनों में मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए विशेष उपाय और पूजा-पाठ किए जाते हैं। इस दौरान घर में अखंड ज्योत जलाना भी अत्यंत शुभ माना गया है। हिंदू धर्म में अखंड ज्योत का विशेष महत्व है क्योंकि यह न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है, बल्कि घर में सकारात्मक वातावरण और सुख-समृद्धि भी लाता है।

    अखंड ज्योत को जलाते समय सिर्फ उसकी साफ-सफाई ही नहीं, बल्कि वास्तु का भी विशेष ध्यान रखना जरूरी है। वास्तुशास्त्र के अनुसार, अखंड ज्योत हमेशा दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए। यही दिशा घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है और देवी की कृपा बनी रहती है। दीया और ज्योत के लिए यह दिशा सबसे उत्तम मानी जाती है।

    अखंड ज्योत को हमेशा साफ स्थान पर रखें। इसे किसी अवरोध या रुकावट के बिना जलाएं। मान्यता है कि यदि ज्योत निरंतर और बिना किसी बाधा के जलती रहे, तो घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। ऐसा घर में कभी भी धन की कमी से नहीं होती। नवरात्र में नियमित रूप से ज्योत जलाना देवी की विशेष कृपा प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय माना गया है।

    शुभ मुहूर्त और तारीख
    अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्र शुरू होती हैं, और नवमी तिथि पर इसका समापन होता है। इसके अगले दिन दशहरा या विजयादशमी पर्व मनाया जाता है। इस साल 22 सितंबर रात 1:23 बजे से प्रतिपदा तिथि प्रारंभ होकर 23 सितंबर को देर रात रात 2:55 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि 22 सितंबर को मानी जाएगी। इसी दिन से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होगी और कलश स्‍थापना भी इसी दिन की जाएगी। वहीं 31 सितंबर को महाअष्‍टमी और 1 अक्‍टूबर को महानवमी मनाई जाएगी। इसके बाद 2 अक्‍टूबर को दशहरा महापर्व मनाया जाएगा।

  • Facebook, Instagram और X समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगा प्रतिबंध

    Facebook, Instagram और X समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगा प्रतिबंध

    काठमांडू: नेपाल ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इन प्लेटफॉर्म को सात दिनों के भीतर नेपाल के सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन कराना था, लेकिन ये ऐसा करने में नाकाम रहे थे। मंत्रालय ने कंपनियों के लिए पंजीकरण पूरा करने के लिए 28 अगस्त से 7 दिनों की समय सीमा तय की थी। रात को यह समय सीमा समाप्त हो गई। अधिकारियों ने बताया कि प्रतिबंध तत्काल प्रभाव से पूरे देश में लागू होंगे और मंत्रालय ने संबंधित कंपनियों को पत्र जारी करना शुरू कर दिया है। सरकार ने पहले ही नियमों का पालन करने वाले प्लेटफॉर्म को निलंबित करने की चेतावनी दी थी।

    अभी तक टिकटॉक, वीटॉक, वाइबर और निबंज जैसे प्लेटफॉर्म नेपाल में पंजीकृत हो चुके हैं। वहीं, टेलीग्राम और ग्लोबल डायरी प्रक्रिया में हैं, लेकिन मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम,वॉट्सएप की पैरैंट कंपनी), अल्फाबेट (यूट्यूब), एक्स, रेडिट या लिंक्डइन समेत किसी भी प्रमुख प्लेटफॉर्म ने अभी आवेदन नहीं भरा था। नेपाली अधिकारियों के अनुसार, प्लेटफॉर्म से पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करने और राष्ट्रीय नियमों का पालन करने के बाद सेवाएं फिर से शुरू हो सकती हैं। मंत्रालय के नोटिस में कहा गया है कि ‘माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अदालत की अवमानना के एक मामले में नेपाल सरकार के नाम एक निर्देशात्मक आदेश जारी किया है, जिसमें घरेलू या विदेशी मूल के ऑनलाइन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को संचालन से पहले संबंधित अधिकारियों के साथ अनिवार्य रूप से सूचीबद्ध करने और अवांछित सामग्री का मूल्यांकन और निगरानी करने का निर्देश दिया गया है।’

    नोटिस में आगे बताया गया है कि आदेश के अनुसार, सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को सूचीबद्ध करने के लिए 7 दिनों की समय सीमा दी गई है। नेपाल दूरसंचार प्राधिकरण को नेपाल के भीतर उन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को निष्क्रिय करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने दी गई समय सीमा के भीतर सूचीबद्ध होने के लिए मंत्रालय से संपर्क नहीं किया है। मंत्रालय ने गुरुवार आधी रात से प्लेटफॉर्मों को बंद करने का निर्देश दिया है। प्रवक्ता गजेंद्र कुमार ठाकुर ने कहा कि पंजीकरण पूरा करने वाले किसी भी प्लेटफॉर्म को उसी दिन शुरू कर दिया जाएगा।

  • AI क्रांति की शुरूआत करेंगा Reliance AGM, भारत बनेगा हब, Google और मेटा के साथ करार

    AI क्रांति की शुरूआत करेंगा Reliance AGM, भारत बनेगा हब, Google और मेटा के साथ करार

    नई दिल्लीः Reliance AGM रिलायंस AI क्रांति की शुरूआत करने जा रहा है। दरअसल, इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी ने आज सालाना आम बैठक (AGM) में रिलायंस इंटेलिजेंस लॉन्च करने का ऐलान किया। जिससे भारत एआई हब बन जाएगा। यह कंपनी पूरी तरह रिलायंस की होगी और इसका मकसद भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में ग्लोबल लीडर बनाना है।

    Read in English:

    Mukesh Ambani Launches Reliance Intelligence to Build India’s AI Future

    रिलायंस ने गूगल क्लाउड के साथ AI पार्टनरशिप का ऐलान किया। इसके तहत जामनगर क्लाउड रीजन बनाया जाएगा, जो रिलायंस की ग्रीन एनर्जी से चलेगा और जियो की हाई-स्पीड नेटवर्किंग से जुड़ा होगा। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने कहा कि यह सहयोग भारत की AI यात्रा को नई ऊंचाई देगा। रिलायंस और मेटा ने मिलकर एक जॉइंट वेंचर (JV) शुरू करने की घोषणा की। इसका मकसद भारतीय कंपनियों और छोटे कारोबारों को रेडी-टू-यूज AI टूल्स देना है। यह प्लेटफॉर्म मेटा के Llama मॉडल पर बेस्ड होगा और सेल्स, कस्टमर सर्विस, आईटी और फाइनेंस जैसे सेक्टरों को कवर करेगा।

    इस जॉइंट वेंचर में 855 करोड़ रुपये (100 मिलियन डॉलर) का शुरुआती निवेश होगा। इसमें रिलायंस की हिस्सेदारी 70 फीसदी और मेटा की 30 फीसदी होगी। इस मौके पर मुकेश अंबानी ने कहा कि जियो ने हर भारतीय तक डिजिटल क्रांति पहुंचाया, अब रिलायंस इंटेलिजेंस हर भारतीय तक AI पहुंचाएगा। रिलायंस इंटेलिजेंस 4 बड़े मिशनों पर काम करेगी। जिसमें AI इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्लोबल पार्टनरशिप, भारत के लिए AI सर्विसेज और टैलेंट इनक्यूबेशन शामिल होंगे।

    जामनगर में ग्रीन एनर्जी से चलने वाले गीगावॉट-स्केल डेटा सेंटर बनेंगे, जो बड़े पैमाने पर AI ट्रेनिंग और इनफरेंस के लिए तैयार होंगे। गूगल और मेटा जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर टेक्नोलॉजी और रिसर्च को भारत-फर्स्ट एप्रोच के साथ बढ़ावा दिया जाएगा। शिक्षा, हेल्थकेयर, कृषि और छोटे कारोबारों के लिए सस्ती और भरोसेमंद AI सॉल्यूशंस उपलब्ध कराए जाएंगे। भारत और दुनिया के रिसर्चर्स और इंजीनियर्स के लिए ऐसा प्लेटफॉर्म बनेगा, जहां आइडियाज को तेजी से प्रैक्टिकल सॉल्यूशन में बदला जा सके।

     

     

  • Ganesh Chaturthi: घर में लाएं विघ्नहर्ता की ऐसी मूर्ति, सुख-समृद्धि का होगा वास

    Ganesh Chaturthi: घर में लाएं विघ्नहर्ता की ऐसी मूर्ति, सुख-समृद्धि का होगा वास

    धर्म: गणेश चतुर्थी का पर्व हर साल भारत में बहुत ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। घर में लोग गणपत्ति बप्पा को विराजमान करवाते हैं और उनकी विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। पूरा वातावरण पॉजिटिविटी से भर जाता है। इस साल यह उत्सव कल यानी की 27 अगस्त से शुरु होगा। गणेश जी की मूर्ति घर में लाते समय आपने यह गौर भी किया होगा कि लोग गणेशोत्सव पर अलग-अलग मुद्रा वाले गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करते हैं। आज आपको बताते हैं कि गणेश जी की अलग-अलग मुद्राओं वाली मूर्ति का क्या महत्व है।

    दाई ओर सूंड वाले गणपति

    दाई ओर सूंड वाले गणपति जी की मूर्ति को सिद्धिविनायक और दक्षिणाभिमुखी कहते हैं। इस रुप की यह खासियत होती है कि भगवान गणेश की सूंड दाई ओर मुड़ी होती है। ऐसा माना जाता है कि यदि घर में दाईं सूंड वाले गणपति जी की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाए तो घर की आर्थिक स्थित मजबूत होती है। ऐसा भी माना जाता है कि इनकी पूजा करने से जीवन में आने वाली कोई भी मुश्किल, ठोकरें और बाधाएं भी दूर होती हैं।

    लेटे हुए गणपति

    जिस मूर्ति में गणपति जी लेटे हो उसको भी बहुत खास माना जाता है। खासतौर पर बिजनेस करने वाले लोगों को ऐसी प्रतिमा की पूजा करते हैं क्योंकि इसको सुख-समृद्धि का कारण माना जाता है। लेटी हुई गणेश जी की मूर्ति घर की तरक्की और आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने वाली भी मानी जाती है।

    नृत्य मुद्रा वाले गणपति

    यदि कोई कला या संगीत में रुचि रखता हो तो उसको नृत्य मुद्रा में बैठे हुए गणेश जी की स्थापना करनी चाहिए। ऐसी मूर्ति उनके लिए बेहद लाभकारी साबित होगी। नृत्य करते हुए या वाद्य यंत्र बजाते हुए गणेश जी की मूर्ति की पूजा करने से घर में खुशियां आती और कला की दुनिया में भी सफलता मिलती है। यह मूर्ति ऊर्जा और आनंद का प्रतीक भी मानी जाती है।

    बाई और सूंड वाले गणेश 

    इस तरह की मूर्ति को वाममुखी और वक्रतुंड गणेश भी कहते हैं। सबसे ज्यादा लोग ऐसी ही मूर्ति पसंद करते हैं। ये गणेश का सबसे आम और लोकप्रिय रुप माना जाता है। इस दिशा का संबंध उत्तर दिशा से होता है और इसे चंद्रमा की खास एनर्जी के साथ जोड़ा जाता है। चंद्रमा की यह ऊर्जा शांति, सुख-शांति और भौतिक समृद्धि को भी दर्शाती है ऐसे में बाई और मुड़ी हुई सूंड वाले गणेश की प्रतिमा को लक्ष्मी का वरदान देने वाली मानी जाती है।

    चूहे पर खड़े हुए गणपति

    जिस मूर्ति में गणपति चूहे पर खड़े हों उसको गणराज कहते हैं। यह मूर्ति हिम्मत और साहस का प्रतीक मानी जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इस मूर्ति की पूजा करने से जीवन में जिम्मेदारी निभाने की ताकत मिलती है और मुश्किलें भी आसान होती हैं।

    सीधी सूंड वाले गणपति

    गणेश जी का ऐसा रुप भी बहुत खास और दुर्लभ माना जाता है। ये रुप इसलिए भी जरुरी होता है क्योंकि इसकी सूंड सीधे ऊपर की ओर होती है जो सुषु्म्ना नाड़ी के खुलने का प्रतीक मानी जाती है। सुषुम्ना नाड़ी हमारे शरीर की मुख्य ऊर्जा नाड़ी होती है जो मन और आत्मा को साथ में जोड़ती है। यह नाड़ी उस समय खुलती है जब व्यक्ति और भगवान के बीच में एक गहरा तालमेल बनता है। मान्यताओं के अनुसार, इस स्थिति में इंसान पूरी तरह से आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ भर जाता है और उसके जीवन में शांति, संतुलन और सफलता आती है।

    बैठे हुए गणेशजी की मूर्ति

    ऐसी मूर्ति घर में रखना और उसकी पूजा करना बहुत ही शुभ माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, जब घर में बैठे हुए गणपति का चित्र स्थापित होता है और उसकी विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है तो घर में शांति, सुख और समृद्धि बनी रहती है। बैठे हुए गणेश जी घर का वातावरण पॉजिटिव एनर्जी के साथ भर देते हैं और परिवार की हर मनोकामना को पूरा करने में मदद करते हैं।
  • Ganesh Chaturthi: इस शुभ मुहूर्त में करें गौरीपुत्र गणेश की पूजा, जानें विधि

    Ganesh Chaturthi: इस शुभ मुहूर्त में करें गौरीपुत्र गणेश की पूजा, जानें विधि

    धर्म: हर साल भादो शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है और चतुर्दशी तिथि वाले दिन गणेश विसर्जन के साथ इसका समापन होता है। यह त्योहार भगवान गणेश को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस पवित्र घड़ी में भगवान गणेश धरती पर आते हैं और भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस साल यह पर्व 27 अगस्त से 6 सितंबर तक मनाया जाएगा।

    गणपति स्थापना का मुहूर्त

    हिंदू पंचागों की मानें तो भादो शुक्ल चतुर्थी 26 अगस्त को दोपहर 1:54 बजे से लेकर 27 अगस्त दोपहर 3:44 तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान गणेश की स्थापना होगी वहीं गणपति स्थापना मध्याह्न काल में शुभ होती है ऐसे में 27 अगस्त को सुबह 11:05 से लेकर दोपहर 1:40 तक गणपति स्थापना आप कर सकते हैं।

    इसलिए अलग-अलग मूर्तियां की जाती है स्थापित

    भगवान गणेश की अलग-अलग मूर्तियां अलग-अलग परिणाम देती है। पीले और लाल रंग की मूर्ति की उपासना शुभ मानी जाती है। नीले रंग के गणेश को उच्छिष्ट गणपति कहते हैं। इनकी उपासना भी विशेष दिशाओं में की जाती है। हल्दी से बनी हुई मूर्ति को हरिद्रा गणपति कहते हैं। यह विशेष मनोकामनाओं के लिए बेहद शुभ मानी जाती है। एकदंत गणपति श्यामवर्ण के होते हैं इनकी उपासना से अद्भूत पराक्रम मिलता है। सफेद गणपति को ऋणमोचन कहते हैं इनकी पूजा करने से व्यक्ति को कर्ज से मुक्ति मिलती है। चार भुजाओं वाले रक्त वर्ण गणपति को संकष्टहरण गणपति कहते हैं। इनकी उपासना करने से संकटों का नाश होता है। त्रिनेत्र धारी रक्तवर्ण और दस भुजाधारी गणेश को महागणपति कहते हैं। इनके अंदर समस्त गणपति समाहित है। वैसे घरों में पीले रंग या रक्त वर्ण के मध्यम आकार वाली प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।

    ऐसे करें स्थापना

    घर की उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या पूर्व दिशा में एक चौकी लगाए। फिर उस पर लाल कपड़ा बिछाएं। चौकी पर हल्दी के साथ स्वास्तिक बनाएं और वहां चावल अर्पित करें। इसके बाद गणपति जी की मूर्ति को दूध, शहद, घी और गंगाजल के साथ स्नान कराएं। फिर चौकी पर भगवान की मूर्ति को स्थापित करें। मूर्ति की स्थापित करते हुए ऊं गं गणपतेय नम: मंत्र का जाप करें। इसके बाद एक कलश में गंगाजल भरकर उसके मुख पर आम के पत्ते और नारियल रख दें। दीपक और अगरबत्ती जलाएं। फिर गणेश जी को दूर्वा, फल, फूल चढ़ाएं। उनको मोदक या लड्डू का भोग लगाएं। इसके बाद भगवान गणेश की आरती करें और उनके मंत्रों का जाप करें। इसके बाद गणपति बप्पा के जयकारे लगाएं।

    गणेश विसर्जन पर ऐसे करें पूजा

    यदि आपने घर में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की है तो नियमित तौर पर दोनों समय उनकी पूजा करें। सुबह और शाम के समय दीप जलाकर बप्पा की पूजा करें। उनको पीले फूल और दूर्वा चढ़ाएं। जब तक महोत्सव चलेगा उतने दिन सात्विक आहार लें। अनंत चतुर्दशी वाले दिन उपवास रखकर विसर्जन कर दें।    
  • गहरे प्रेम के बावजूद आखिर श्री कृष्ण ने क्यों नहीं की थी राधा से शादी, जानें इसके पीछे की कहानी

    गहरे प्रेम के बावजूद आखिर श्री कृष्ण ने क्यों नहीं की थी राधा से शादी, जानें इसके पीछे की कहानी

    धर्मः हमने बचपन से यही सुना है कि राधा बिना श्री कृष्ण के अधूरी हैं और श्री कृष्ण भी राधा के बिना पूरे नहीं होते। फिर सवाल यह उठता है कि इस गहरे प्रेम के बावजूद उन्होंने शादी क्यों नहीं की? ये एक दिलचस्प बात है, जो बहुत कम लोग जानते हैं। दरअसल, राधा और श्री कृष्ण का प्रेम इतना शुद्ध और अनमोल था कि वह शादी जैसे सांसारिक बंधनों में नहीं बंधना चाहता था। उनका प्रेम आत्मा और भावना का मेल था, जो परंपरागत रूप से बिना शादी के भी सबसे खूबसूरत माना जाता है।

    भगवान कृष्ण जब लगभग चार-पांच साल के थे, तब वह अपने पिता के साथ गाय चराने खेतों में जाते थे। उस समय वसंत का मौसम था। श्री कृष्ण ने अपने पिता को चौंकाने के लिए अचानक मौसम बदल दिया। अचानक तेज बारिश शुरू हो गई और श्री कृष्ण ने रोना शुरू कर दिया। पिता ने श्री कृष्ण को देखकर उन्हें प्यार से गले लगा लिया। वे सोच रहे थे कि इस मौसम में श्री कृष्ण का भी ध्यान रखना होगा और गायों की भी देखभाल करनी होगी। तभी वहां एक सुंदर कन्या आ गई। उसे देखकर नंद बाबा का मन शांति से भर गया। उन्होंने उस लड़की से कहा कि वह श्री कृष्ण की देखभाल करें। लड़की ने खुशी-खुशी हां कह दी। इसके बाद नंद बाबा गाय लेकर घर चले गए।

    जब श्री कृष्ण और वह लड़की अकेले थे, तब श्री कृष्ण ने अपनी असली रूप दिखाया। वे एक युवक के रूप में खड़े थे, जिनके कपड़े नारंगी रंग के थे, सिर पर मोर का पंख था और उनके हाथ में बांसुरी थी। श्री कृष्ण ने उस लड़की से पूछा कि क्या वह उस समय को याद करती है जब वे दोनों स्वर्ग में साथ थे। लड़की ने हां कहा, क्योंकि वह राधा थीं। ऐसे ही पहली बार पृथ्वी पर जन्म लेकर कृष्ण और राधा की मुलाकात हुई थी।

    भगवान कृष्ण और राधा रानी की जोड़ी प्रेम की सबसे अनोखी मिसाल मानी जाती है। लेकिन जो बात शायद कम लोग जानते हैं वो ये है कि दोनों ने कभी विवाह करने का फैसला क्यों नहीं किया। उनका मानना था कि प्रेम और विवाह दो अलग-अलग बातें हैं। उन्होंने साबित किया कि सच्चा प्रेम सिर्फ शरीर और रूप तक सीमित नहीं होता, बल्कि वो भक्ति और आत्मा की शुद्धता से जुड़ा होता है।

    कहते हैं कि राधा ने खुद को कृष्ण जी के लायक नहीं समझा क्योंकि वह एक साधारण गाय चराने वाली थीं। इसलिए, उन्होंने विवाह करने से मना कर दिया था। उन्हें लगा कि अगर विवाह होता, तो शायद उनकी भक्ति और प्रेम की वह शुद्धता जो दोनों के बीच थी, कम हो जाती। इसके अलावा एक और बात जो कई मान्यताओं में आती है वो ये है कि राधा रानी और श्री कृष्ण एक ही आत्मा के दो रूप थे। इसलिए, उन्होंने माना कि वे अपनी ही आत्मा से विवाह नहीं कर सकते।

  • कब होगी भगवान गणेश की स्थापना? जानें स्थापना की सही विधि और मुहूर्त

    कब होगी भगवान गणेश की स्थापना? जानें स्थापना की सही विधि और मुहूर्त

    धर्मः देशभर में गणेश महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। खासकर महाराष्ट्र और गुजरात में इस त्योहार की रौनक देखने लायक होती है। इस पर्व पर भक्त रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान गणेश की पूजा करते हैं। घरों, मंदिरों और पंडालों में 10 दिनों तक गणपति की स्थापना कर श्रद्धा-भाव से पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान चारों ओर “गणपति बप्पा मोरिया” की गूंज सुनाई देती है।

    हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की चतुर्थी तिथि 26 अगस्त दोपहर 01 बजकर 54 मिनट से शुरू होगी और इसका समापन 27 अगस्त दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर होगा। ऐसे में इस साल गणेश चतुर्थी का पर्व 27 अगस्त 2025, बुधवार को मनाया जाएगा और इसी दिन गणेश स्थापना की जाएगी। गणेश उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी पर होता है, जो इस साल 6 सितंबर को पड़ रही है। 10 दिन पूजन के बाद भक्त गणपति से अगले वर्ष जल्दी आने की प्रार्थना करते हुए प्रतिमा का विसर्जन करते हैं।

    गणेश स्थापना का शुभ मुहूर्त
    गणेश जी की स्थापना के लिए मध्याह्न काल सबसे उत्तम माना गया है, क्योंकि मान्यता है कि इसी समय गणपति का जन्म हुआ था. 27 अगस्त 2025 को मध्याह्न काल में गणेश पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 40 मिनट तक रहेगा।

    गणेश चतुर्थी 2025 के शुभ योग
    इस बार गणेश चतुर्थी का दिन बेहद खास है। इस साल गणेश चतुर्थी की शुरुआत बुधवार से हो रही है, जिससे बहुत शुभ माना जा रहा है। साथ ही 27 अगस्त को गणेश चतुर्थी पर चार शुभ योग का निर्माण हो रहा है- शुभ योग, शुक्ल योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का संयोग रहेगा। इसके अलावा हस्त नक्षत्र और चित्रा नक्षत्र भी रहेगा।

    गणेश स्थापना विधि
    सबसे पहले एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। हाथ में जल, चावल और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें। इसे बाद’ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करते हुए गणेश जी का स्मरण करें। मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराकर नए वस्त्र और आभूषण पहनाएं। गणेश जी को मोदक, लड्डू, दूर्वा घास, लाल फूल और सिंदूर अर्पित करें। अंत में पूरे परिवार के साथ आरती करें और भक्तिभाव से पूजन संपन्न करें।

  • इस मंदिर में 100 करोड़ के गहनों से होगा राधा-कृष्ण का श्रृंगार, उमड़ेगी श्रद्धालुओं की भीड़

    इस मंदिर में 100 करोड़ के गहनों से होगा राधा-कृष्ण का श्रृंगार, उमड़ेगी श्रद्धालुओं की भीड़

    ग्वालियरः देशभर में आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी भक्ति, संस्कृति और भव्यता के अद्भुत संगम के साथ मनाई जाएगी। देश के कई जिलों तक मंदिरों में विशेष आयोजन होंगे, जिनमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होंगे।

    वहीं भोपाल स्थित पटेल नगर इस्कॉन मंदिर में प्रदेश का सबसे बड़ा जन्माष्टमी महोत्सव होगा। मुख्यमंत्री निवास पर दोपहर 2 बजे मुख्य कार्यक्रम होगा, जिसमें 1000 से अधिक बाल गोपाल श्रीकृष्ण की वेशभूषा में शामिल होंगे। इसके साथ ही ग्वालियर के कृष्ण मंदिर में 100 करोड़ के गहनों से राधा-कृष्ण का श्रृंगार होगा। उज्जैन के सांदीपनी आश्रम में भव्य सजावट की गई है। इंदौर के इस्कॉन मंदिर और यशोदा मंदिर में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचेंगे।

    ग्वालियर के हृदयस्थल स्थित गोपाल मंदिर, सिंधिया राजवंश की ऐतिहासिक धरोहर है। यहां जन्माष्टमी का उत्सव हमेशा ही भव्य होता है, लेकिन इस बार मंदिर प्रबंधन और श्रद्धालुओं ने इसे और विशेष बनाने का निर्णय लिया है। मंदिर के ट्रस्ट के अनुसार, राधा–कृष्ण के श्रृंगार के लिए जिन आभूषणों का प्रयोग होगा, उनमें सोना, हीरा, मोती, पन्ना, माणिक और अन्य बहुमूल्य रत्न जड़े होंगे। इनमें से कई गहने सिंधिया परिवार के ख़ज़ाने का हिस्सा हैं, जो केवल विशेष अवसरों पर ही प्रदर्शित किए जाते हैं।

    श्रृंगार में मोर मुकुट, वैजयंती माला, रत्नजटित हार, कमरबंद, बाजूबंद, पायल और अंगूठियां शामिल होंगी। इन सभी पर बारीक कारीगरी की गई है। मंदिर समिति के सदस्य बताते हैं कि इस पूरे श्रृंगार का मूल्य लगभग 100 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कीमत का कोई मोल नहीं लगाया जा सकता।