पीपलू मेले के दूसरे दिन सांस्कृतिक रंगों की धूम, स्कूली बच्चों और कलाकारों ने मोहा मन

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आर्य पब्लिक स्कूल,धुंधला,हटली कोट स्कूलों के छात्रों ने दी प्रस्तुतियां, गायकों ने भी बांधा समा,

ऊना/सुशील पंडित: उपमंडल बंगाणा में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी पीपलू मेला पूरे जोश और उल्लास के साथ आयोजित किया गया, जिसमें क्षेत्रीय संस्कृति की झलक और देशभक्ति की भावना की सुंदर मिलन देखने को मिली। मेले के दूसरे दिन का आकर्षण रहा झूमा पंडाल जहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झड़ी लग गई। देशभक्ति गीत हर कर्म अपना करेंगे ए वतन तेरे लिये की गूंज के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जिसने श्रोताओं में जोश और ऊर्जा भर दी। खास बात यह रही कि इस आयोजन में स्थानीय स्कूलों के छात्रों ने भी भाग लिया और अपनी प्रतिभा से मंच पर चार चांद लगा दिए। आर्य पब्लिक स्कूल बंगाणा, धुंधला कोट और हटली के छात्रों ने अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लिया। नन्हें कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य, समूह गीत, लघु नाटक और देशभक्ति पर आधारित कार्यक्रमों से ऐसा समा बांधा कि पंडाल तालियों की गूंज से भर उठा। कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल मनोरंजन था, बल्कि बच्चों में सांस्कृतिक मूल्यों को संजोने और मंच पर प्रस्तुति देने का आत्मविश्वास विकसित करना भी था।

आयोजकों ने बताया कि स्कूली बच्चों की तैयारी कड़ी मेहनत और लगन का परिणाम थी, जिसे दर्शकों ने खुले दिल से सराहा। इसके साथ ही, मंच पर पेशेवर गायकों ने भी अपनी उपस्थिति से समां बांध दिया। गायक रवि, सतिंदर, राजीव और जैसल ने अपने सुरों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके गीतों में क्षेत्रीय लोकगीतों से लेकर आधुनिक मेलोडी तक सब कुछ शामिल था, जिसने सभी आयु वर्ग के लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया।लोकप्रिय गायक जैसल की प्रस्तुति पर तो पूरा पंडाल झूम उठा। दर्शक देर रात तक गानों की ताल पर थिरकते रहे। सतिंदर और राजीव की जुगलबंदी ने भी मंच को जीवंत बना दिया और रवि की गायकी ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इन गायकों ने अपनी प्रस्तुतियों से मेले की रौनक को और बढ़ा दिया। पीपलू मेला सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्रीय एकता, भाईचारे और सांझी विरासत का प्रतीक बन चुका है।

यह मेला स्थानीय युवाओं और कलाकारों को मंच प्रदान करता है, साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी मजबूती देता है। कुल मिलाकर, पीपलू मेले का दूसरा दिन पूरी तरह से सांस्कृतिक रंगों में सराबोर रहा। स्कूली बच्चों से लेकर मशहूर गायकों तक, हर किसी ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों के दिलों को छू लिया। ऐसे आयोजनों से न केवल परंपराएं जीवित रहती हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का अवसर भी मिलता है। आयोजकों और प्रतिभागियों की मेहनत ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर भावना सच्ची हो, तो हर आयोजन यादगार बन सकता है।

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