देशभर में आस्था का प्रमुख केंद्र बना ये प्रसिद्ध मंदिर, 225 करोड़ रुपए से पार हुआ चढ़ावा

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चित्तौड़गढ़ः भारतीयों में मंदिरों को लेकर खास आस्था देखी जाती है। लोग दिल खोलकर मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते है और भगवान के प्रति अपनी आस्था का प्रगटावा करते हैं। मंडफिया में एक ऐसा मंदिर है जो अब देशभर में आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है। श्री सांवलियाजी के नाम से मशहूर मंदिर में आने वाले भक्त भगवान को अपना साझेदार मानकर अपनी आय का हिस्सा चढ़ाते हैं। इस श्रद्धा का असर मंदिर के चढ़ावे में साफ दिख रहा है। इस साल वार्षिक चढ़ावा 225 करोड़ रुपए पार कर गया है, जबकि 30 साल पहले यह सिर्फ 65 लाख रुपए था। इस तरह चढ़ावे में 340 गुना से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। अब मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या भी लाखों में पहुंच गई है। विशेष अवसरों पर तो एक दिन में 15 लाख से अधिक भक्त दर्शन के लिए आते हैं। जानकारी मुताबिक, श्री सांवलिया जी मंदिर में पहली बार साल 1991 में जब दान पात्र खोला गया था। साल के अंत में यानी 1991-92 में मंदिर को करीब 65.45 लाख रुपए की आय हुई थी। तब से यह सिलसिला लगातार बढ़ता गया। इसके बाद सांवरा सेठ की ख्याति ऐसी फैली कि अगले ही साल 1992-93 में 1.75 करोड़ का कुल चढ़ावा आया। इसी तरह, यह कारवां 2, 3 करोड़ की राशि से बढ़कर साल 2024–25 तक करीब 225 करोड़ रुपए, यानी लगभग ढाई अरब रुपए तक पहुंच गई। यह वृद्धि सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि भगवान सांवलिया सेठ में बढ़ते विश्वास और भक्तों की अटूट आस्था की कहानी भी बयां करती है। नकदी, आभूषणों के साथ स्टांप पेपर भी चढ़ातें हैं भक्त यहां आने वाले भक्त भगवान को सिर्फ मन्नतें नहीं मांगते, बल्कि अपनी कमाई का एक हिस्सा ‘सांवरा सेठ’ के नाम पर चढ़ाते हैं। कई तो अपने व्यापार या नौकरी की आमदनी में भगवान को “पार्टनर” बनाकर नियमित रूप से हिस्सा अर्पित करते हैं। कुछ भक्त तो इस पार्टनरशिप को स्टांप पेपर पर लिखकर भी मंदिर को सौंपते हैं। मंदिर में हर महीने अमावस्या से पहले चतुर्दशी के दिन दान पात्र खोले जाते हैं। इसमें इतनी बड़ी मात्रा में चढ़ावा आता है कि पूरा गिनने में कम से कम 5 से 10 दिन का समय लग जाता है। भक्त सिर्फ नकद ही नहीं, बल्कि मनी ऑर्डर, चेक और ऑनलाइन के माध्यमों से भी दान करते हैं। इतना ही नहीं, विदेशी पर्यटक भी आते है और वे फॉरेन करेंसी भी चढ़ा कर जाते है। काउंटिंग के दौरान कई फॉरेन करेंसी भी मिलते है। इसके अलावा सोने-चांदी के गहने, सिक्के, ऐंटीक आइटम्स और आभूषणों के रूप में भी चढ़ावा आता है। श्री सांवलिया जी मंदिर की ख्याति अब सिर्फ चित्तौड़गढ़ या मेवाड़ तक सीमित नहीं रही। राजस्थान के हर कोने से लेकर देश-विदेश तक के भक्त यहां आकर दर्शन करते हैं।

ये है मान्यता

करीब 250 से 300 साल पहले जब बागुंड का इलाका जंगलों से घिरा था, तब मंडफिया गांव के एक ग्वाला भोलीराम गुर्जर रोज अपनी गायों को चराने वहां जाया करते थे। एक दिन दोपहर में जब वह एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे, तभी उन्हें सपने में भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप श्री सांवलिया सेठ ने दर्शन दिए और कहा – मैं यहीं दबा हुआ हूं, मुझे बाहर निकालो। भोलीराम ने जब यह बात गांववालों को बताई और खुदाई शुरू की, तो वहां से तीन एक जैसी मूर्तियां निकलीं। ग्रामीणों ने इन मूर्तियों को श्रीकृष्ण का ही रूप माना और उनके श्याम वर्ण के कारण उन्हें ‘सांवलिया सेठ’ नाम दिया गया। तीनों मूर्तियों में से एक मूर्ति भोलीराम अपने घर मंडफिया लेकर आए और उसे घर के परिंडे (मटकी रखने की जगह, जो अभी सांवरा सेठ की मूर्ति स्थापित है) में स्थापित कर पूजा-पाठ शुरू कर दी। धीरे-धीरे इन तीनों स्थानों पर मंदिर बने, लेकिन मंडफिया स्थित मंदिर की ख्याति सबसे ज्यादा बढ़ी। यही वह स्थान है, जिसे आज श्री सांवलिया जी मंदिर के रूप में जाना जाता है।

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