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प्लॉट E-Neelami से पहले बुनियादी सुविधाएं पूरी करना जरूरी : Right To Service Commission

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प्लॉट E-Neelami से पहले बुनियादी सुविधाएं पूरी करना जरूरी : Right To Service Commission

चंडीगढ़: हरियाणा राइट टू सर्विस कमीशन ने एक महत्वपूर्ण मामले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) द्वारा किसी स्थान पर विकास कार्य पूरे किए बिना प्लॉट की ई-नीलामी करना अत्यंत गंभीर प्रशासनिक चूक है। आयोग ने कहा कि किसी भी प्लॉट को ई-नीलामी में डालने से पहले उस क्षेत्र के आवश्यक विकास कार्य पूरे होने चाहिए ताकि आवंटी समय पर निर्माण कार्य शुरू कर सकें।

आयोग के प्रवक्ता ने बताया कि यह मामला फरीदाबाद के सेक्टर-76/77 में ई-नीलामी के माध्यम से खरीदे गए प्लॉट से संबंधित है, जिसमें आवंटी केशव शर्मा ने आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज करवाई थी कि विकास कार्य अधूरे होने के बावजूद उन्हें कब्जे का प्रस्ताव भेज दिया गया। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि यह स्पष्ट है कि एचएसवीपी ने विकास कार्य पूरे किए बिना ही प्लॉट की ई-नीलामी कर दी और बाद में कब्जा देने का प्रस्ताव भी जारी कर दिया, जो कि उचित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

आयोग ने यह भी पाया कि आवंटन पत्र की शर्तों के अनुसार यदि आवेदन प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर कब्जा नहीं दिया जाता है तो एचएसवीपी को आवंटी को ब्याज देना होता है। हालांकि फरीदाबाद में कई मामलों में यह ब्याज नहीं दिया जा रहा था। आयोग के हस्तक्षेप और आदेशों के बाद ही एचएसवीपी ने ऐसे मामलों में ब्याज देना प्रारम्भ किया है।

मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने यह भी कहा कि इस स्थिति के लिए उस समय के एस्टेट ऑफिसर या एचएसवीपी की ई-नीलामी सेल की भूमिका की जांच आवश्यक है, क्योंकि विकास कार्यों की स्थिति स्पष्ट किए बिना ही प्लॉट को नीलामी के लिए स्वीकृति दी गई। आयोग ने यह भी उल्लेख किया कि 12 अगस्त 2022 को तत्कालीन मुख्य प्रशासक, एचएसवीपी द्वारा संबंधित अधिकारियों को विकास कार्य दो माह में पूरा करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद समस्या लंबे समय तक बनी रही, जो गंभीर लापरवाही को दर्शाती है।

आयोग ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि एक अन्य मामले में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एचएसवीपी के कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि एचएसवीपी को “नो प्रॉफिट-नो लॉस” के सिद्धांत पर किफायती आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया है, लेकिन उसका आचरण कई मामलों में लाभ-केन्द्रित प्रतीत होता है, जो मध्यम और निम्न आय वर्ग के हितों के विपरीत है।

मामले में आयोग ने हरियाणा राइट टू सर्विस एक्ट, 2014 के तहत उपलब्ध अधिकारों का प्रयोग करते हुए शिकायतकर्ता केशव शर्मा को 5,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह राशि एचएसवीपी द्वारा 15 दिनों के भीतर अदा की जाएगी तथा इसकी अनुपालन रिपोर्ट 24 मार्च 2026 तक आयोग को भेजनी होगी। आयोग ने यह भी कहा कि प्रारम्भिक रूप से यह राशि एचएसवीपी अपने कोष से दे सकता है और बाद में जिम्मेदार अधिकारियों से इसकी वसूली की जा सकती है।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में कब्जा देने की तिथि वापस लेने, वसूले गए एक्सटेंशन शुल्क की वापसी या विलंबित कब्जे पर ब्याज भुगतान जैसे मामलों में कोई लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध हरियाणा राइट टू सर्विस एक्ट के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी।

साथ ही आयोग ने एचएसवीपी को यह भी सलाह दी है कि ई-नीलामी के माध्यम से प्लॉट खरीदने वाले आवंटियों के मामलों में ब्याज संबंधी नीति की समीक्षा की जाए। वर्तमान में ऐसे आवंटियों को केवल 5.5 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज मिलता है, जबकि ड्रॉ ऑफ लॉट्स के माध्यम से प्लॉट प्राप्त करने वाले आवंटियों को तीन वर्ष बाद 9 प्रतिशत ब्याज मिलता है। आयोग का मानना है कि इस विषय में संतुलित और न्यायसंगत नीति बनाने की आवश्यकता है।

आयोग ने अपने आदेश में यह भी कहा कि एचएसवीपी को विकास कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र पूरा करना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में ई-नीलामी के माध्यम से एचएसवीपी को हजारों करोड़ रुपये की आय प्राप्त हुई है, इसलिए विकास कार्यों में देरी न केवल आर्थिक रूप से हानिकारक है बल्कि इससे आवंटियों में असंतोष और अनावश्यक मुकदमों की स्थिति भी पैदा होती है।

आयोग ने उम्मीद जताई है कि एचएसवीपी शीघ्र विकास कार्य पूर्ण कर आवंटियों को राहत प्रदान करेगा और भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होने देगा।

 

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