आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने डीसी के माध्यम से केंद्रीय महिला समाज कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी को भेजा ज्ञापन

ऊना/सुशील पंडित : आजादी की 75वीं वर्षगांठ को ‘अमृतकाल: रूप में मना रहे हैं। ऐसे में हमारे आधे बच्चे कुपोषित हैं और देश को कुपोषण मुक्त बनाने के लिए निःस्वार्थ भाव से सेवा करने वाली आंगनवाडी कार्यकर्ता व सहायिकाएं घर-घर तक सेवाएं पहुंचा रही है। लेकिन 1975 के बाद से अभी तक हमें श्रमिकों के रूप में मान्यता भी नहीं दी गई है। यह बात मंगलवार को सीटू के जिला प्रधान सुरेंद्र कुमार, सचिव कामरेड़ गुरनाम सिंह, जिला आंगनबाड़ी अध्यक्ष नरेश कुमारी, ब्लाक प्रधान शैलजा सैणी, सचिव अनुराधा, कमलेश व शारदा की अगुवाई में उपायुक्त राघव शर्मा के माध्यम से केंद्रीय महिला समाज कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी को भेजे ज्ञापन में कही हैं।

उन्होंने कहा कि श्रमिकों/कर्मचारियों के रूप में न्यूनतम वेतन या किसी अन्य वैधानिक हकदारी का भुगतान नहीं किया जा रहा। कई सालों तक समर्पित सेवा के बाद, हमें बिना किसी सेवानिवृत्ति लाभ या पेंशन के – सेवानिवृति के नाम पर जबरन सेवा से बाहर कर दिया जाता है। उन्होंंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं को ग्रेच्युटी की पात्रता के मुद्दे पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाए जाने का एक वर्ष पूरा हो रहा है। हालांकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले में कहा कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को श्रमिकों के रूप में माना जाना चाहिए और वे ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम 1972 के तहत ग्रेच्युटी के हकदार हैं।

न्यायालय ने कहा था कि मानदेय के नाम उन्हें भुगतान किए जा रहे पारिश्रमिक को ‘मजदूरी’ के रूप में माना जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य और केंद्र सरकारों को आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को बेहतर सेवा शर्ते प्रदान करने के लिए तौर-तरीके खोजने का भी निर्देश दिया है। पिछले एक साल से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस आदेश की पूरी तरह से अनदेखी की हैं, जिसका सीधा असर हमारे देश की करीब 26 लाख महिला कर्मियों के जीवन पर पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को नियमितीकरण, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा, महिला एवं बाल विकास विभाग सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश का हवाला दे रहा है और सहायिकाओं को वर्तमान स्थिति में सरकारी कर्मचारी नहीं माना जा रहा।

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