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  • Health Tips: गर्मियों में आंखों की देखभाल जरूरी, जानें आई केयर के आसान टिप्स

    Health Tips: गर्मियों में आंखों की देखभाल जरूरी, जानें आई केयर के आसान टिप्स

    Health Tips: गर्मियों का मौसम अपने साथ तेज धूप,  गर्म हवाएं और धूल-मिट्टी लेकर आता है। इनका असर सिर्फ त्वचा पर ही नहीं, बल्कि आंखों पर भी पड़ता है। इस मौसम में कई लोगों को आंखों में जलन, खुजली, लालिमा, सूखापन और पानी आने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

    अक्सर लोग इन परेशानियों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन कई बार ये समस्याएं गंभीर रूप भी ले सकती हैं। यदि आंखों में लगातार परेशानी बनी रहे तो डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। आइए जानते हैं कि गर्मियों में आंखों को स्वस्थ और सुरक्षित रखने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

    तेज धूप से आंखों को बचाएं
    गर्मियों में सूर्य की तेज और हानिकारक यूवी किरणें आंखों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। लंबे समय तक धूप में रहने से आंखों में जलन और थकान महसूस हो सकती है। बाहर निकलते समय अच्छी गुणवत्ता वाले सनग्लासेस पहनें। इसके अलावा छाता या टोपी का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इससे आंखों पर सीधी धूप पड़ने से बचाव होता है और आंखें सुरक्षित रहती हैं।

    गर्म और सूखी हवाओं से करें बचाव
    गर्मी के मौसम में चलने वाली गर्म हवाएं आंखों की नमी को कम कर देती हैं, जिससे आंखों में सूखापन और जलन की समस्या बढ़ सकती है। यदि आप बाइक, स्कूटर या ऑटो में सफर कर रहे हैं तो आंखों को सीधी हवा से बचाने की कोशिश करें। इसके लिए चश्मा पहनना सबसे अच्छा विकल्प है। इससे धूल और गर्म हवा दोनों से सुरक्षा मिलती है।

    आंखों की सफाई का रखें विशेष ध्यान
    गर्मियों में पसीना और धूल आंखों में संक्रमण या एलर्जी का कारण बन सकते हैं। इसलिए आंखों की साफ-सफाई बेहद जरूरी है। दिन में एक या दो बार साफ और ठंडे पानी से आंखों को धोएं। इससे आंखों को ताजगी मिलेगी और गंदगी भी साफ हो जाएगी। साथ ही बार-बार आंखों को हाथ लगाने से बचें, क्योंकि हाथों पर मौजूद बैक्टीरिया आंखों में संक्रमण फैला सकते हैं।

    स्क्रीन टाइम कम करें
    आजकल ज्यादातर लोग मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर का अधिक इस्तेमाल करते हैं। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है और ड्राईनेस की समस्या बढ़ सकती है। काम के दौरान हर कुछ समय बाद आंखों को आराम दें। बीच-बीच में स्क्रीन से नजर हटाकर दूर की चीजों को देखने की आदत डालें।

    भरपूर नींद लेना भी है जरूरी
    आंखों को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त नींद लेना बहुत जरूरी है। नींद पूरी न होने पर आंखों में थकान, भारीपन और जलन महसूस हो सकती है। रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लेने की कोशिश करें ताकि आंखों को पूरा आराम मिल सके।

    ठंडी सिकाई से मिलेगा आराम
    बाहर से घर लौटने के बाद आंखों पर ठंडी पट्टी या ठंडे पानी में भिगोया हुआ साफ कपड़ा कुछ मिनट के लिए रखें। इससे आंखों की थकान कम होती है और काफी राहत महसूस होती है।

    पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं
    गर्मी के मौसम में शरीर में पानी की कमी जल्दी हो जाती है। डिहाइड्रेशन का असर आंखों पर भी पड़ता है और आंखें सूखी महसूस होने लगती हैं। इसलिए पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें। पानी शरीर के साथ-साथ आंखों को भी हाइड्रेट रखने में मदद करता है।

    पौष्टिक भोजन करें
    आंखों की अच्छी सेहत के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार लेना जरूरी है। अपनी डाइट में विटामिन ए, सी, ई और अन्य जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर फल और सब्जियां शामिल करें। हरी सब्जियां, गाजर, संतरा, पपीता और सूखे मेवे आंखों की सेहत के लिए काफी फायदेमंद माने जाते हैं।

     

     

     

  • Gen-Z खुद बदल रहे हैं अपने घूमने का तरीका, लंबी छुट्टियों की जगह प्लान करेंगे Short Trip

    Gen-Z खुद बदल रहे हैं अपने घूमने का तरीका, लंबी छुट्टियों की जगह प्लान करेंगे Short Trip

    लाइफस्टाइल: यदि आप सोचते हैं कि आजकल के युवा घूमने-फिरने में कंजूस हो गए हैं तो शायद आप गलत हैं। वो घूम रहे हैं बस सिर्फ तरीका बदल गया है। अभी हाल ही में Airbnb ने एक नई रिपोर्ट जारी की है जिसका नाम है Never the Same: The New Rules of Gen-Z Travel in India. इस रिपोर्ट में बताया गया कि भारत के Gen-Z यानी तकरीबन 18 से 27 साल के युवा अब साल में एक लॉन्ग ट्रिप लगाने की जगह तीन-तीन शॉर्ट ट्रिप्स करना पसंद करते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, 10 में से सात Gen-Z युवा यही पसंद करते हैं। 87 फीसदी युवाओं की पसंदीदा यात्रा एक हफ्ते से भी कम की होती है। इसका मतलब यह है कि लंबे टूर पैकेज का जमाना जाता दिख रहा है। दिलचस्प बात यह है कि युवा बुकिंग भी बहुत पहले से नहीं करते हैं। 66 फीसदी युवा यात्रा से बस कुछ दिन या कुछ हफ्ते पहले ही टिकट और जगह बुक करते हैं।

    सिर्फ घूमने के लिए ट्रैवल नहीं कर रहे युवा

    गौर करने वाली बात यह है कि जेन-जी का यह यात्रा सिर्फ घूमने के लिए नहीं होती है। रिपोर्ट कहती हैं कि 87 फीसदी युवाओं को लगता है कि वो जैसे घूमते हैं। वह उनकी पहचान की दर्शाता है। ऐसे में 95 फीसदी युवा चाहते हैं कि उनकी यात्रा बाकी सबसे अलग हो और उनकी जापानी हो। इसके अलावा 90 फीसदी ऐसे जगहें ढूंढते हैं जो सोशल मीडिया पर वायरल में हुई है। इंस्टाग्राम पर जिस जगह की पोस्ट ज्यादा ढूंढते हैं जो सोशल मीडिया पर वायरल न हुई हो। इंस्टाग्राम पर जिस जगह की पोस्ट ज्यादा वायरल हो रही है वहां जेन-जी जाना पसंद नहीं करते हैं। यूथ अब होटल की जगह घर जैसी जगह पर रहना ज्यादा पसंद करते हैं। 63 फीसदी ने कहा कि उन्होंने कोई जगह इसलिए चुनी क्योंकि वहां रहने की व्यवस्था उन्हें अच्छी लगी। उससे न कि सिर्फ उस शहर या जगह की वजह से। जब वह दोस्तों के साथ जाते हैं तो आधे से ज्यादा युवा अलग-अलग होटल कमरों की बजाय एक ही घर में साथ रहना पसंद करते हैं। इसके अलावा यात्रा में पार्टनर की भी अहमियत है। चार में से तीन Gen-Z युवाओं के लिए यह ज्यादा जरूरी है कि वे किसके साथ जा रहे हैं।

    हर यात्रा से पता चलता है सोचने का तरीका

    Airbnb के भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कंट्री हेड अमनप्रीत बजाज ने कहा कि Gen-Z के लिए यात्रा जीवन के सबसे निजी फैसलों में से एक बन गई है. वे कहां जाते हैं, किसके साथ जाते हैं और कहां ठहरते हैं, इन सब चीजों से वे खुद को जाहिर करते हैं. Airbnb के आंकड़ों में भी यह बदलाव साफ दिखता है. गर्मियों में भारतीय Gen-Z की सर्च 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है. दो से छह रातों की छोटी यात्राओं की घरेलू बुकिंग में करीब 80 फीसदी की बढ़त हुई है. दोस्तों के साथ ग्रुप ट्रिप में भी 55 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज हुई है.      
  • भारतीय मसाला चाय का पूरी दुनिया में बजा डंका, इन शहरों की चाय हुई List में शामिल

    भारतीय मसाला चाय का पूरी दुनिया में बजा डंका, इन शहरों की चाय हुई List में शामिल

    नई दिल्ली: भारत में यदि किसी एक चीज पर सबसे कम बहस होती है तो वह है चाय का प्यार। शहर कोई भी हो। भाषा भी हो या फिर मौसम कैसा भी हो। एक कप मसाला चाय लोगों के दिन को बेहतर बनाने की ताकत रखती है। अब इस पसंद को दुनिया ने भी मान्यता दे दी है। इंटरनेशनल फूड एंड बेवरेज की रैंकिंग जारी करने वाले टेस्टएटलस ने दुनिया की सर्वश्रेष्ठ चायों की नई सूची जारी की है जिसमें भारतीय मसाला चाय ने पहला स्थान हासिल किया है।

    मसाला चाय के साथ इनको भी किया गया शामिल

    इस उपलब्धि को और खास बनाने वाली बात यह है कि सूची में सिर्फ मसाला चाय ही नहीं बल्कि भारत की कई दूसरी प्रसिद्ध चायों को भी जगह मिली है। दार्जिलिंग चाय छठे स्थान पर रही जबकि असम चाय को तेरहवां स्थान मिला। केरल की लोकप्रिय सुलेमानी चाय भी दुनिया की शीर्ष 50 चायों में शामिल हुई है। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा चाय और कश्मीर की प्रसिद्ध नून चाय ने भी अपनी जगह बनाई है।

    भारत में चाय

    भारत में चाय सिर्फ एक पेय नहीं है। यह बातचीत शुरु करने का बहाना है। काम के बीच मिलने वाला छोटा सा आराम है और मेहमानों के स्वागत का सबसे आसान तरीका भी है। कई बार किसी जरुरी चर्चा की शुरुआत ही इस वाक्य से होती है कि चलो चाय पर बात करते हैं। सड़क किनारे छोटे से ठेले पर मिलने वाली चाय से लेकर घर की रसोई में बनने वाली मसाला चाय तक। हर कप के साथ एक अलग कहानी जुड़ी होती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में चाय का स्वाद और बनाने का तरीका बदल जाता है। कही अदरक और मसालों का तेज स्वाद पसंद किया जाता है तो कहीं हल्की और खुशबूदार चाय को तरजीह दी जाती है। कुछ लोग कड़क चाय के बिना दिन की शुरुआत नहीं कर सकते हैं जबकि कुछ को हल्के स्वाद वाली चाय पसंद होती है। यही विविधता भारतीय चाय संस्कृति को खास बनाती है। इस रैंकिंग में भारतीय चाय बागानों को भी पहचान मिली है। पश्चिम बंगाल का मकाईबाड़ी टी एस्टेट और असम का हलमारी टी एस्टेट भी चर्चा में रहे हैं। वर्षों से ये चाय बागान भारत की चाय को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

    दूसरे और तीसरे रैंक पर इनका दबदबा

    हालांकि इस सूची में जापान की होजिचा चाय दूसरे और श्रीलंका की प्रसिद्ध सीलोन ब्लैक टी तीसरे स्थान पर रही है। जापान की सेंचा और चीन की पु-एर चाय को भी शीर्ष स्थानों में जगह मिला। इसके बावजूद इस बार सबसे ज्यादा चर्चा भारतीय मसाला चाय की रही है। जिसमें दुनिया भर की चायों को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है।

    मसाला चाय क्यों है खास

    मसाला चाय भारत की सबसे फेमस पेयों में से एक है जिसे चायपत्ती, दूध और खुशबूदार मसालों के मिक्स से तैयार किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि हर घर और हर चायवाले की रेसिपी अलग होती है हालांकि अदरक, दालचीनी, काली मिर्च, इलायची और लौंग ऐसे मसाले हैं जो ज्यादातर मसाला चाय में इस्तेमाल किए जाते हैं। माना जाता है कि इसकी जड़ें हजारों साल पुरानी आयुर्वेदिक परंपरा से जुड़ी हैं। उस समय मसालों और दूध से तैयार एक पेय शरीर को ऊर्जा देने के लिए बनाया गया था। समय के साथ इसमें कई बदलाव हुए और आज की मसाला चाय दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना चुकी है।  
  • मरने के बाद कौन चलाएगा आपका Facebook-Instagram-Whatsapp? सरकार ला सकती है नया नियम!

    मरने के बाद कौन चलाएगा आपका Facebook-Instagram-Whatsapp? सरकार ला सकती है नया नियम!

    नई दिल्ली: यदि आपके परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु किसी दुर्घटना में होती है तो उसके फिजिकल एसेट्स जैसे जमीन, पैसे और गहने परिवार के नाम कर दिए जाते हैं लेकिन क्या परिवार वाले उसके डिजिटल एसेट्स भी हासिल कर पाते हैं जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, आईडी या क्रिप्टो एसेट्स? कई मामलों में ऐसा कहा जाता है कि ये डिजिटल एसेट्स प्राइवेसी कानूनों के अंतर्गत आती है। इसके कारण उन्हें परिवार को सौंपना आसान नहीं होता। इसी कारण से परिवार के लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस समस्या को देखते हुए सरकार एक नया कानून लाने की तैयारी कर रही है। इसका नाम डिजिटल वसीयत है। इसके तहत डिजिटल एसेट्स भी परिवार के सदस्यों को सौंपे जा सकेगे।

    आखिर क्या है डिजिटल वसीयत?

    आज का समय पहले जैसा नहीं रहा। पहले लोगों के पास सिर्फ फिजिकल एसेट्स हुआ करते थे लेकिन अब समय बदल गया है। आज की जनरेशन अपने इन्वेस्टमेंट्स से लेकर सोशल मीडिया अकाउंट्स तक कमाई कर रही है। अब हर डिजिटल एसेट की एक वैल्यू है। इसी वजह से लोग डिजिटल वसीयत की मांग कर रहे हैं ताकि उनके डिजिटल एसेट्स भी सुरक्षित रुप से उनके परिवार तक पहुंच सके। डिजिटल एसेट्स हासिल करने के लिए परिवार वालों को कोर्ट से आदेश लेना पड़ता है। तभी वो लैपटॉप और अकाउंट्स तक पहुंच बना पाते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए Ministry Of Electronics And Information Technology इस मुद्दे पर गाइडलाइन्स तैयार कर रही है। इससे यह प्रक्रिया आसान और स्मूथ हो पाए। इन गाइडलाइन्स तैयारी कर रही है। इससे यह प्रक्रिया आसान और स्मूथ हो सके। इन गाइडलाइन्स को डिजिटल वसीयत कहा जा रहा है। इसके जरिए से परिवार वालों को बार-बार कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे और उनकी किसी प्रिय सदस्य के डिजिटल एसेट्स आसानी से उनके नाम ट्रांसफर हो सकेंगे। यह प्रक्रिया कुछ वैसे ही है जैसे आप अपने गहने, घर पैसे और जमीन की वसीयत अपने परिवार के नाम करते हैं। उसी तरह जब आप अपने डिजिटल अकाउंट्स भी अपने परिवार वालों के नाम कर सकते हैं।

    डिजिटल वसीयत क्यों है जरुरी?

    डिजिटल वसीयत एक नया और जरुरी कानून बन गया है। अक्सर लोग अपने किसी करीबी को खोने के बाद परेशान हो जाते हैं कि उनके अकाउंट्स, फोटो या इन्वेस्टमेंट्स का क्या होगा। कई बार यह डर भी रहता है। कही उन्होंने कोई बड़ा डिजिटल निवेश तो नहीं किया था। इसकी जानकारी परिवार को नहीं है। इसी वजह से काफी समस्याएं सामने आती है। इन सभी दिक्कतों को देखते हुए सरकार और मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रोनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी इस पर काम कर रही है ताकि लोगों को अपने परिवार के डिजिटल एसेट्स तक आसानी से पहुंच मिल सके। भविष्य में किसी के साथ अन्याय न हो। इसके अलावा आप अपनी डिजिटल वसीयत खुद भी तैयार कर सकते हैं। आप जरुरी अकाउंट्स के पासवर्ड्स को कहीं सुरक्षित लिखकर किसी भरोसेमंद व्यक्ति को दे सकते हैं। किसी सुरक्षित प्लेटफॉर्म पर स्टोर कर सकते हैं।
  • Word Earth Day पर Experts ने बताया था Future में कैसे बढ़ेगी Skilled Jobs

    Word Earth Day पर Experts ने बताया था Future में कैसे बढ़ेगी Skilled Jobs

    लाइफस्टइल: कुछ दिन पहले वर्ल्ड अर्थ डे मनाया गया है। ऐसे में इस मौके पर धरती से अपनी जमीन से किस को प्यार नहीं होता। यदि आप चाहते हैं कि आप हमेशा इस धरती और पर्यावरण की सेवा करें तो आप करियर बनाकर भी कर सकते हैं।

    ग्रीन जॉब्स

    जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की बढ़ती चुनौती के कारण दुनिया भर में ग्रीन इकोनॉमी की ओर रुख तेज हो रहा है। ऐसे काम जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की जगह उसे बचाने, ऊर्जा बचाने या साफ ऊर्जा पैदा करने में मदद करते हैं। उन्हें ग्रीन जॉब्स कहते हैं।

    2030 तक बढ़ जाएगी नौकरियां

    इसी बदलाव के साथ में नौकरी के भी नए मौके खुल रहे हैं। काउंसिल ऑफ एनर्जी एनवायर्नमेंट एंड वाटर की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक Renewable Energy सेक्टर में करीबन 34 लाख नौकरियां बढ़ेगी।

    बढ़ेगी स्किल्ड जॉब्स

    ग्रीन हाईड्रोजन मिशन से 6 लाख से ज्यादा स्किल्ड जॉब्स आने का अनुमान है। वहीं इलेक्ट्रिक व्हीकल इकोसिस्टम में 10 मिलियन डायरेक्ट और 50 मिलियन इंडायरेक्टर रोजगार बनने की संभावना है। आंकड़ों के अनुसार, ग्रीन सेक्टर सिर्फ पर्यावरण की जरुरत नहीं। आने वाले दशक का बड़ा रोजगार इंजन भी है। ग्रीन जॉब्स में सोलर पैनल इंस्टॉलर, विंड, टरबाइन टेक्नीशियन, EV सर्विस इंजीनियर, बैटरी मैन्युफैक्चरिंग टैक्नीशियन, एनवायरमेंटल कंसल्टेंट, सस्टेनेबिलिटी मैनेजर, वेस्ट मैनेजमेंट एक्सपर्ट और ग्रीन बिल्डिंग डिजाइनर जैसे जॉब शामिल हैं। बता दें कि भारत ही नहीं पूरी दुनिया क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ रही है। सरकार की नीतियां विदेशी निवेश और निजी कंपनियों की बढ़ती हुई भागीदारी इस सेक्टर को मजबूती दे रही है। एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि आने वाले 10-15 सालों में ग्रीन जॉब्स का दायरा फैल जाएगा। ऐसे में 12वीं या ग्रेजुएशन के बाद सही दिशा में पढ़ाई और स्किल डेवलपमेंट करने वाले युवाओं के लिए यह शानदार मौका हो सकता है।    
  • Time 100 Gala 2026 में छाई Nita Ambani, बनारसी सिल्क साड़ी में बिखेरा जलवा

    Time 100 Gala 2026 में छाई Nita Ambani, बनारसी सिल्क साड़ी में बिखेरा जलवा

    लाइफस्टाइल: भारतीय संस्कृति का जादू बिखेरने के लिए नीता अंबानी टाइम 100 गाला 2026 में शामिल हुई। इस दौरान स्टेज पर मिसेज नीता अंबानी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि असली लग्जरी वही है जिसमें अपनी जड़ों की खुशबू महकती हो। न्यूयॉर्क में नीता अंबानी का यह लुक काफी सुर्खियों में रहा है। उनका यह लुक सिर्फ एक आउटफिट नहीं बल्कि भारतीय शिल्प, इतिहास और हाई एंड फैशन का एक पावरफुल स्टेटमेंट था। उन्होंने इस बार सिर्फ साड़ी से नहीं बल्कि अपनी रॉयल ज्यूलरी से भी लोगों को दीवाना कर दिया।

    बनारसी सिल्क साड़ी में दिखी नीता अंबानी

    न्यूयॉर्क में नीता अंबानी ने हैंडवोवन बनारसी साड़ी पहनी थी। आज मॉर्डन वर्ल्ड में उनकी हाथ से बुनी गई है। इस साड़ी से उन्हें यह भी मैसेज मिला है कि हमारी पारंपरिक बुनाई आज भी सबसे ज्यादा वर्सेटाइल और ट्रैंडी थी। नीता अंबानी ने विदेशी जमीन पर स्वदेश की हैंडवोवन बनारसी साड़ी पहनी थी। आज मॉर्डन वर्ल्ड में उनकी हाथ से बुनी हुई है।
     
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    इस साड़ी ने यह मैसेज भी दिया है कि हमारी पारंपरिक बुनाई आज भी सबसे ज्यादा वर्सेटाइल और ट्रैंडी है। साड़ी के ट्रेडिशनल मोटिफ्स और सिल्क की रिच डिजाइन ने उनके लुक में टाइमलेस एलीगेंस भी एड किया था। नीता अंबानी ने हैंडवोवन साड़ी के साथ मशहूर डिजाइनर मनीष मल्होत्रा का हैंडक्राफ्टेड ब्लाउज स्टाइल किया था। उनके इस क्लासिक लुक को मॉर्डन रॉयल्टी में बदलने का काम कर रहा था। साड़ी इतनी पारंपरिक थी कि ब्लाउज का स्टाइल काफी मॉर्डन था। आज की जनरेशन के बीच यह फ्यूजन फेमस हो रहा है। नीता के आउटफिट से ज्यादा से उनके पूरे लुक की सबसे बड़ी हाईलाइट उनकी ज्यूलरी थी। जो किसी अजूबे से कम नहीं थी। उन्होंने एक रेयर 101 कैट का पिंक-ब्राउन ओल्ड माइन रोज-कट डायमंड पहना नेकलेस पहना था।

    आखिर क्या है 101 कैरेट डायमंड की खासियत?

    यह 101 कैरेट का पिंक ब्राउन ओल्ड माइन रोज-कट डायमंड सिर्फ एक कीमती हीरा नहीं बल्कि भारतीय शाही विरासत का हिस्सा है। इसका कनेक्शन हैदराबाद के निजामों की विरासत की उर ग्रैंड दुनिया से हैं जो अपनी दौलत, कला और बेशकीमती ज्यूलरी के लिए मशहूर रही है। 7वें निजाम मीर उस्मान अली खान को दुनिया का सबसे अमीर शासक माना जाता था। मशहूर जेकब डायमंड जैसे की अनमोल रत्न को वह पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करते थे। इसी शाही परंपरा का हिस्सा माना जाता है। यह 101 कैरेट का एंटीक डायमंड है। इस हीरे का गर्म मिट्टी जैसा रंग और पुरानी ओल्ड माइन कटिंग इसको और भी रेयर बनाता है। यही कारण है कि यह नेकलेस सिर्फ ज्यूलरी नहीं बल्कि इतिहास रॉयल्टी और भारतीय विरासत की चमकदार पहचान है।

    आखिर क्या होता है बसर मोती?

    अनमोल हीरे का बसरा मोतियों की छह लाइनों में पिरोया गया था। बसरा मोती बहुत ही रेयर होता है। यह अपनी शाइन के लिए जाने जाते हैं। जो इस नेकपीस को एक शाही टच दे रहे हैं। इतने भारी नेकलेस के साथ लुक को बैलेंस करते हुए नीता अंबानी ने एक पिंक पेयर सॉलिटेयर डायमंड रिंग पहनी थी। यह उनके लुक को एलीगेंट बना रही थी। नीता अंबानी ने ड्यूई और सटल बेस चुना है। उनका मेकअप हैवी या केकी नहीं लग रहा है बल्कि चेहरे पर एक नैचुरल चमक भी दिखती है। उनकी आंखों को सॉफ्ट स्मोकी टच देते हुए काजल और आईलाइनर को हल्का सा स्मज किया गया है। नीता ने साड़ी के ऊपर ब्लैक कलर की जैकेट पहनी है, जो उनके लुक को महारानी वाली वाइब दे रहा है।    
  • Gen-z को Elon Musk ने दी Best Advice, अच्छी नौकरी मिलने के दिए Tips

    Gen-z को Elon Musk ने दी Best Advice, अच्छी नौकरी मिलने के दिए Tips

    लाइफस्टाइल: करियर में सफलता अक्सर नौकरी बदलने, पोस्ट पाने या कुछ नया शुरु करने जैसी बड़ी उपलब्धियों से जुड़ी होती है लेकिन असल में लंबे समय तक सफलता आमतौर पर छोटी-छोटी डेली आदतों पर निर्भर करती है। इसमें से एक सबसे कम आंकी जाने वाली आदत है पढ़ना। टेस्ला और लिफ्ट जैसा कंपनियों का नेतृत्व कर चुके जॉन मैक्नील ने शीर्ष अधिकारियों के साथ काम करते हुए एक आदत देखी है। उनमें से कई लोग पढ़ने को प्राथमिकता देते हैं न कि कभी-कभार बल्कि अपनी रोजाना के दिनचर्या में वो रोजाना पढ़ते हैं। बड़े कंपनियों के लीडरों के लिए पढ़ना सिर्फ एक शौक नहीं बल्कि एक मानसिक जिम की तरह काम करता है। जब हम एलन मस्क या फिर वॉरेन बफेट की बात करें तो वो पढ़ने के लिए एक डेली डिसिप्लिन मानते हैं। इसे प्रभावित होकर मैकनील ने हर दिन रोज 90 मिनट पढ़ने की ठान ली। उनका मकसद सिर्फ जानकारी बढ़ाना नहीं था बल्कि अपने दिमाग को एक्टिव रखना और अपनी सोच को बेहतर बनाना था। लगातार पढ़ने से हमें कई फायदे होते हैं।

    नए विचार

    हमें नई बातों, अलग-अलग बिजनेस और नए नजरियों के बारे में पता चलता है।

    सही फैसले

    यह आदत ऑफिस या काम में सही फैसले लेने और मुश्किलों को सुलझाने में बहुत मदद करती है।

    सफल लोगों में होती है पढ़ने की आदत

    दुनिया के सबसे सफल लोगों में पढ़ने की आदत बहुत कम होती है। साल 2025 में जेपी मॉर्गन के एक सर्वे से पता चलता है कि जितने भी अरबपति हैं। उनमें नियमित रुप से पढ़ना कॉमन आदत हैं। ये लोग अपनी सफलता का श्रेय किताबों को देते हैं। साथ ही मनोरंजन के लिए पढ़ना भी कम आम होता जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, बहुत से लोगों ने पिछले साल पूरे साल में एक भी किताब नहीं पढ़ते हैं। फ्लोरिडा और लंदन की यूनिवर्सिटी के रिसर्च बताते हैं कि खासकर युवा अब पढ़ने में बहुत कम समय बिता रहे हैं। उनके बीच पढ़ने की आदत में लगातार गिरावट देखी जा रही है।

    पढ़ने से मिलेगी करियर को शेप

    पढ़ने से सिर्फ आपको नॉलेज ही नहीं मिलती बल्कि संवाद करने और संबंध बनाने के तरीक भी प्रभावित होते हैं। मैकनील का मानना है कि जो लोग ज्यादा पढ़ते हैं। उनकी सोच गहरी हो जाती है। वह थोड़ा हटकर सवाल करते हैं जो उन्हें दूसरे लोगों से अलग बनाता है। उन्होंने बताया कि एलन मस्क के साथ अपनी शुरुआती बातचीत के दौरान उन्होंने अपने अनुभव के बारे में बात करने की जगह टेस्ला की चुनौतियों को समझने पर ध्यान लगाया। इस दृष्टिकोण ने उन्हें अलग पहचान बनाने में मदद की ओर कंपनी में काम करने का मौका मिला।    
  • इस दिशा में लगाएं ये नीला फूल का पौधा, कामयाबी चूमेगी कदम

    इस दिशा में लगाएं ये नीला फूल का पौधा, कामयाबी चूमेगी कदम

    Aparajita Ka Phool : वास्तु शास्त्र में कई ऐसे पौधों का उल्लेख मिलता है, जो न सिर्फ घर की खूबसूरती बढ़ाते हैं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा भी लाते हैं। इन्हीं में से एक खास पौधा है अपराजिता। इसके नीले और सफेद फूल देखने में बहुत सुंदर होते हैं और माना जाता है कि यह घर के माहौल को शांत और सकारात्मक बनाता है। आइए इसे आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं। अपराजिता का महत्व क्या है? अपराजिता एक शुभ पौधा माना जाता है। वास्तु के अनुसार यह घर में अच्छी ऊर्जा (पॉजिटिव एनर्जी) लाने में मदद करता है। इसके फूल खासतौर पर नीले और सफेद रंग के होते हैं, जो शांति और संतुलन का प्रतीक माने जाते हैं। यह पौधा घर के वातावरण को हल्का और सुकूनभरा बनाता है। अपराजिता लगाने के फायदे अगर इस पौधे को सही तरीके से लगाया जाए, तो इसके कई फायदे मिल सकते हैं
    • घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है
    • आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगता है
    • धन से जुड़ी परेशानियां कम हो सकती हैं
    • घर का माहौल शांत और खुशहाल रहता है
    • नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है
    किस दिशा में लगाएं अपराजिता का पौधा? वास्तु के अनुसार दिशा बहुत मायने रखती है
    • उत्तर-पूर्व (ईशान कोण): इस दिशा में अपराजिता लगाना सबसे शुभ माना जाता है। यह दिशा भगवान की मानी जाती है, इसलिए यहां पौधा लगाने से घर में खुशहाली आती है।
    • पूर्व दिशा: यहां पौधा लगाने से परिवार में शांति और सुख बना रहता है।
    इन दिशाओं में न लगाएं कुछ दिशाओं में इसे लगाना सही नहीं माना जाता।
    • दक्षिण दिशा
    • पश्चिम दिशा
    इन दिशाओं में पौधा लगाने से नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है। कब लगाना होता है शुभ?
    • शनिवार का दिन अपराजिता लगाने के लिए सबसे अच्छा माना जाता है
    • इसके नीले फूल शनि देव को प्रिय होते हैं
    • शनिवार को इसके फूल अर्पित करने से शुभ फल मिलते हैं
    ध्यान रखने वाली जरूरी बातें
    • पौधे की नियमित देखभाल करें
    • सूखे या खराब पत्तों को हटाते रहें
    • साफ-सुथरी जगह पर ही पौधा लगाएं
    • पौधे के पास गंदगी न रखें
         
  • गर्मियों में नहीं खट्टा होगा दही, इन Tips के साथ जमाएं Fresh Curd

    गर्मियों में नहीं खट्टा होगा दही, इन Tips के साथ जमाएं Fresh Curd

    लाइफस्टाइल: गर्मियों के इस मौसम में दही हर घर की रुटीन का हिस्सा होता है। यह शरीर को सिर्फ ठंडक ही नहीं देता बल्कि पाचन को भी दुरुस्त रखता है परंतु जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है एक परेशानी भी बढ़ जाती है और वो परेशानी है दही जल्दी खट्टा हो जाना। कई बार रात में जमाया हुआ दही सुबह तक इतना खट्टा हो जाता है कि खाने का मन ही नहीं करता। ऐसे में आपको कुछ ऐसे ट्रिक्स बताते हैं जिनसे आप दही को ताजा और फ्रेश रख सकते हैं।

    इस बात का रखें ध्यान

    सबसे पहले यहां पर यह समझना जरुरी है कि दही खट्टा होना एक नैचुरल प्रक्रिया होती है। दूध में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया लैक्टोज को लैक्टिक एसिड में बदलते हैं। इससे दही का स्वाद हल्का खट्टा होता है लेकिन ज्यादा गर्मी में यह प्रक्रिया तेज हो जाती है। इससे दही जल्दी खट्टा हो जाता है। दही जमाने के लिए दूध का चुनाव बहुत ही खास होता है। हमेशा ताजा और अच्छे क्वालिटी वाले दूध का इस्तेमाल करें। एक्सपायरी के करीबन दूध में बैक्टीरिया पहले से ज्यादा होते हैं। इससे दही जल्द ही खराब हो सकता है। दूध को अच्छे से उबालकर हल्का गुनगुना होने पर ही उसमें जामन स्टार्टर डालें।

    साफ-सफाई का रखें ध्यान

    साफ-सफाई का भी खास ध्यान रखें। जिन बर्तनों में दही जमा रहे हैं। वो पूरी तरह साफ और सूखे होने चाहिए। थोड़ी सी भी गंदगी या बैक्टीरिया दही के स्वाद और टेक्चर को भी खराब कर सकते हैं। गर्मी में जगह चुनना भी जरुरी है। दही को ऐसी जगह पर रखें जहां बहुत ज्यादा गर्मी या सीधी धूप न हो। बहुत गर्मी में भी दही खट्टा होता है। यदि किचन ज्यादा गर्म है तो घर के किसी ठंडे कोने में दही जमाना बेहतर रहेगा।

    ये तरीका भी आएगा काम

    एक छोटा सा आसान तरीका यह भी होगा कि दूध में दही जमाने से पहले एक चम्मच चीनी मिला दें। इससे अच्छे बैक्टीरिया को संतुलित तरीके से बढ़ने में मदद मिलती है और दही जल्दी खट्टा नहीं होता। इसके साथ ही हमेशा ताजा दही का जामन इस्तेमाल करें। दही जमने के बाद उसको ज्यादा देर तक बाहर न रखें। तुरंत फ्रिज में रख दें। ठंडा तापमान बैक्टीरिया की गति को धीमा कर देता है। इससे दही का स्वाद लंबे समय तक सही रहता है। ध्यान रखें कि दही को हमेशा एयरटाइट डिब्बे में रखें ताकि उसमें बाहर की गंध न जाएं। यदि आप मीठा दही पसंद करते हैं तोदूध में पहले से चीनी मिलाकर भी दही जमा सकते हैं। इससे स्वाद भी अच्छा होगा और खट्टापन भी कम होगा। दही को खट्टा होने से बचाने के लिए सही दूध, साफ बर्तन, संतुलित तापमान और सही स्टोरेज का ध्यान रखें। इन छोटी-छोटी बातों को अपनाकर आप हर बार स्वादिष्ट, गाढ़ा और बिल्कुल सही दही तैयार कर सकते हैं।
  • इस वजह से मशहूर हुआ Momos का Trend, 600 साल पुराना है इतिहास

    इस वजह से मशहूर हुआ Momos का Trend, 600 साल पुराना है इतिहास

    नई दिल्ली: शाम होते ही गली नुक्कड़ पर मोमोज के स्टॉल पर काफी भीड़ होती है। वैसे तो मोमोज को पूरे भारत में खाया जाता है परंतु दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में उसकी ज्यादा दीवानगी देखी जाती है। अब चाहे वो रेहड़ी हो, मेट्रो के बाहर का मार्केट हो या फिर कोई इलाका। हर जगह आपको मोमोज के स्टॉल दिख ही जाएंगे। जहां पर अलग-अलग वैरायटी केे मोमोज खाने को मिलेंगे। अक्सर कुछ लोगों का यह लगता है कि यह कोई मॉर्डन फास्ट फूड है लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे आप सिर्फ एक स्नैक समझ रहे हैं कि वो असल में बहुत मुश्किल समय में पेट भरने की मजबूरी के कारण हुआ था।

    600 साल पहले हुआ था आविष्कार

    मोमोज का आविष्कार करीबन 600 पहले तिब्बत में हुआ था। आज लाल चटनी और मेयोनीज के साथ परोसा जाने वाला यह जायका कभी सर्वाइव करने के लिए खाया जाता था। मोमोज का इतिहास बहुत ही पुराना है और इसका सीधा संबंध तिब्बत की भौगोलिक परिस्थितियों से है। माना जाता है कि मोमोज की शुरुआत 14वीं-15वीं सदी के आस-पास तिब्बत में हुई थी। उस समय ये खासतौर पर ठंडे इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए एनर्जी फूड था। रिपोर्ट्स के अनुसार, तिब्बत में हड्डियां गलाने वाली ठंड पड़ती थी और खेती बाड़ी करना लगभग असंभव हो जाता था और लोगों के पास खाने-पाने के संसाधन काफी कम थे। ऐसे में मैदे की एक पतली परत के अंदर मांस को भरकर भाप में पकाने की तकनीक इजाद की गई। इसे तिब्बती भाषा में मोग-मोग कहते थे। कम संसाधनों में लोगों का पेट भरने और शरीर को गर्मी देने के लिए यह सबसे सुरक्षित और आसान तरीका था। धीरे-धीरे यह तिब्बती संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई और मोमोज का जन्म हो गया था। मोमोज को तिब्बत की सीमाओं से बाहर निकालने का श्रेय नेवारी व्यापारियों को ही जाता है। रिपोर्ट् के अनुसार, 1960 के दशक के आस-पास जब काठमांडू के व्यापारी बिजनेस के सिलसिले में ल्हासा जाते थे और वो इस डिश के फैन हो गए थे। वो व्यापारी इस रेसिपी को नेपाल में लाए और वहां पर इसे ममो के नाम से जाना जाने लगा। इसके बाद वहां के मामलों में अपने सफर दक्षिण एशिया की ओर शुरु किया। धीरे-धीरे पहाड़ी रास्तों में होते हुए भारत में दाखिल हुआ।

    ऐसे पहुंचे मोमोज

    भारत में मोमोज की एंट्री मुख्य तौर पर 1959 के बाद हुई। इस दौरान बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी दलाई लामा के साथ भारत में आए। रिपोर्ट्स के अनुसार, धर्मशाला, दार्जिलिंग, सिक्किम और दिल्ली के मजनू का टीला जैसे इलाकों में बसे लोगों ने इसका खूब इस्तेमाल किया है। शुरुआती दौर में यह सिर्फ तिब्बती समुदायों तक ही सीमित था परंतु 90 के दशक के आखिर में इसने दिल्ली की गलियों में अपनी जगह बनाना शुरु की। भारत के लोगों को इसका स्टीम्ड टेक्सचर और तीखी मिर्च वाली चटनी इतनी अच्छी लगी कि आज यह समोसे की टक्कर देने वाला सबसे बड़ा स्ट्रीट फूड बन गया है।

    मजबूरी से मॉर्डन स्नैक का बना सफर

    आज मोमोज सिर्फ एक स्टीम्ड नहीं रही बल्कि भारतीय स्वाद के अनुसार, इसमें तंदूरी, फ्राइड, कुरकुरे और यहां तक कि पनीर और सोया मोमोज जैसे नगिनत एक्सपेरिमेंट हो गए हैं। जिस खाने को लोग अनाज की कमी के कारण मजबूरी में खाते थे वो आज युवाओं के बीच में कंफर्ट फूड बन चुका है।