Category: Health
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Carrabian Princess Cruise पर फैला Norovirus, जानें इस Virus के लक्षण
नई दिल्ली: कैरिबियन प्रिंसेस क्रूज शिप पर नोरोवायरस का बड़ा संक्रमण फैल गया है। इस जहाज पर कुल 3116 यात्री सवार थे इनमें से 102 यात्रियों और 13 क्रू सदस्यों की बीमारी हो गई है। कुल मिलाकर 115 लोग इस संक्रमण पर चपेट में आए हैं। यह यात्रा 28 अप्रैल से 11 मई तक की थी जो फोर्ट लॉडरेडल से शुरु होकर पोर्ट कैनोवरेल पर खत्म होने वाली है। यात्रा के दौरान जहाज अरुबा, बोनेर, प्यूर्टो रिको और बहामास जैसे सुंदर स्थानों पर रुका था। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, बीमारी के मुख्य लक्षण उल्टी और दस्त था। प्रिंसेस क्रूज कंपनी ने इसे पेट संबंधी बीमारी बताया है। -

Corona से कितना खतरनाक Hanta Virus, क्या छूने से फैलता है Infection? WHO ने जारी किया Alert
नई दिल्ली: इस समय हंता वायरस को लेकर हर ओर चर्चा देखने को मिल रही है। इसका बड़ा सवाल यही है कि क्या यह वायरस भी कोरोना की तरह तेजी से फैल सकता है। क्या छूने भरे से संक्रमण हो जाएगा और क्या दुनिया फिर किसी नई महामारी की ओर बढ़ रही है। इन तमाम सवालों के बीच डब्ल्यूएचओ ने अलर्ट जारी करते हुए स्थिति को लेकर बड़ी जानकारी है।क्या है मामला?
यह मामला डच झंडे वाले लग्जरी क्रूज शिप MV Hondius से जुड़ा है। जहां रहस्यमयी सांस संबंधी बीमारी के बाद अब हंता वायरस इंफेक्शन की पुष्टि हुई है। अब तक इस जहाज से जुड़े आठ मामले सामने आ चुके हैं जिनमें पांच लोगों में हंता वायरस की पुष्टि हुई है जबकि तीन मामले संदिग्ध माने जा रहे हैं। तीन लोगों की मौत भी हो चुकी है। Read in English : https://encounternews.in/latest-news/hantavirus-cases-detected-on-cruise-ship-two-indian-crew-members-among-those-onboard/View this post on Instagramवर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन का कहना
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अधिकारियों के मुताबिक जहाज पर पहला इंफेक्टेड व्यक्ति 6 अप्रैल को बीमार पड़ा था और 11 अप्रैल को उसकी मौत हो गई। शुरुआत में डॉक्टरों को हंता वायरस का शक नहीं हुआ क्योंकि उसके लक्षण सामान्य सांस संबंधी इंफेक्शन जैसे थे। इसी कारण से शुरुआती सैंपल भी नहीं लिए गए। बाद में जब दूसरे यात्री भी बीमार पड़ने लगे तब स्वास्थ्य एजेंसियों से हंता वायरस की जांच शुरु की ।एक्सपर्ट् का कहना है?
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की इंफेक्शन रोग एक्सपर्ट Dr Maria Van Kerkhove ने साफ कहा कि इस वायरस की तुलना कोरोना से नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि – यह SARS-CoV-2 नहीं है और यह उसी तरह नहीं फैलता है। इंफेक्शन सिर्फ बहुत करीबी और लंबे संपर्क में फैलने की आशंका होती है। उन्होंने यह भी बताया कि ज्यादातर हंता वायरस इंसान से इंसान में फैलते ही नहीं है। हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि हंता वायरस आमतौर पर इंफेक्टेड चूहों या उनके मल-मूत्र के संपर्क से फैलता है हालांकि इस मामले में एंडीज स्ट्रेन का शक जताया जा रहा है जो हंता वायरस का ऐसा रेयर प्रकार है। इसमें सीमित स्तर पर इंसान से इंसान में इंफेक्शन फैलने की क्षमता देखी गई है। यही कारण है कि डब्ल्यूएचओ इस मामले पर बेहद करीबी नजर बनाए हुए है। डब्ल्यूएचओ ने यह भी बताया कि हंता वायरस की इन्क्यूबेशन अवधि छह हफ्ते तक हो सकती है। डब्ल्यूएचओ ने उन 12 देशों को अलर्ट भेजा है। यहां के यात्री सेंट हेलेना में जहाज से उतर चुके थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए WHO के एक्सपर्ट्स नीदरलैंड के डॉक्टर और यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड और यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल की टीम जहाज पर पहुंच चुकी है। यह टीम यात्रियों की मेडिकल जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इंफेक्शन जहाज के अंदर फैला या लोग पहले से इंफेक्टेड थे हालांकि डब्ल्यूएचओ फिलहाल दुनियाभर में इसके खतरे को कम बता रहे हैं लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि बंद जगहों जैसे क्रूज शिप में लंबे समय तक साथ रहने से इंफेक्शन फैलने का खतरा बढ़ सकता है। यही वजह है कि दुनिया भर की स्वास्थ्य एजेंसियां इस मामले पर बेहद सतर्क नजर बनाए हुए हैं. -

क्या सिर्फ पानी से हाथ धोना होता है काफी? Doctor से जानें बीमारियों का बड़ा सच
सेहत: हाथ धोना एक बहुत ही साधारण सी आदत लगती है। इसमें न ज्यादा समय लगता है कि न किसी खास साधन की जरुरत होती है फिर भी यही छोटी सी आदत हमें कई तरह के इंफेक्शन से बचा सकती है। यही वजह है कि आधुनिक चिकित्सा के दौर में भी डॉक्टर बार-बार हाथ धोने की सलाह देते हैं। यह सिर्फ व्यक्तिगत सफाई का मामला नहीं है बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कदम है। टीकों और एंटीबायोटिक्स के आने से बहुत पहले भी हाथों की सफाई ने लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। कोविड-19 महामाही के दौरान भी यही बात फिर से सामने आई कि साफ हाथ इंफेक्शन की चेन को तोड़ने का सबसे आसान तरीका है।क्यों हाथ धोना जरुरी?
रोजमर्रा की जिंदगी में कई चीजों को छूते हैं जैसे दरवाजे के हैंडल, मोबाइल फोन, पैसे, रेलिंग या फिर किसी से हाथ मिलना। इस सब पर सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार, बहुत से लोग हाथ धोने को गंभीरता से नहीं लेते जबकि यह आदत कई गंभीर इंफेक्शन से बचाती है और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है। जब गंदे हाथ चेहरे, आंख, नाक या मुंह तक पहुंचते हैं। यह जीव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और बीमारियों की शुरुआत होती है। ऐसे ही हैजा, टाइफाइड, डायरिया और इंफ्लुएंजा जैसी बीमारियां फैलती है। खास बात यह है कि इंजेक्शन सिर्फ गंदे माहौल में ही नहीं बल्कि साफ दिखाने वाली जगहों पर भी हो सकता है ऐसे एक्टिव रहना जरुरी है।रिसर्च में हुआ खुलासा
साइंटिस्ट रिसर्च भी इस बात की पुष्टि करते हैं। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, यही तरीके से हाथ धोने से इंफेक्शन का खतरा करीबन 20 प्रतिशत तक काम हो सकता है। इन देशों में साफ पानी और स्वच्छता की बेहतर सुविधा होती है। इंफेक्शन के मामलों में साफ गिरावट देखी गई है। अक्सर लोग रोजमर्रा के छोटे-छोटे मौकों को नजरअंदाज कर देते हैं। जहां हाथ धोना बहुत जरुरी होता है कि जैसे कि शौचालय इस्तेमाल करने के बाद, खाना बनने या खाना से पहले, कच्चे भोजने को छूने के बाद, खांसने या छींकने के बाद और बाहर से घर आने पर। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह आदत और भी आदत जरुरी है क्योंकि उनकी रोग इम्युन सिस्टम अपेक्षाकृतद कमजोर होती है।हाथ धोने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना
उसे करना, लगभग 20 सैकेंड तक साबुन और पानी से हाथ धोना चाहिए। हथेलियों, हाथों के पीछे, उंगलियों के बीच और नाखूनों के नीचे अच्छे तरह सफाई करनी चाहिए। साबुन गंदगी और कीटाणुओं को हटाने में मदद करता है। जबकि हथेलियों, हाथों के पीछे, उंगलियों के बीच और नाखूनों के नीचे अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए। साबुन गंदगी और कीटाणुओं को हटाने में मदद करता है जबकि सिर्फ पानी से धोना पर्याप्त नहीं होता है। यदि साबुन उपलब्ध न हो तो अल्कोहल-आधारित सैनिटाइजर इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन यह पूरी तरह ऑप्शन न हो। -

क्या Office की चाय-कॉफी और AC की हवा करेगी आपको बीमार, बढ़ जाएगा किडनी खराब होने का खतरा
सेहत: कई बार ऐसा लगता है कि तेज धूप में काम करने वाले लोग ही सबसे ज्यादा डिहाइड्रेशन का शिकार होते होंगे लेकिन असल तस्वीर कुछ अलग है। कई बार पूरे दिन एसी में बैठे ऑफिस जाने वाले लोग दिन के अंत तक ज्यादा डिहाइड्रेटेड मिलते हैं। बस फर्क इतना है कि यह समस्या धीरे-धीरे और चुपचाप बढ़ती है। कपिल शर्मा ने अपने यूट्यूब चैनल पर इसका वीडियो भी शेयर किया। इसमें सभी अपने आने वाली फिल्म पर बात कर रहे हैं। नीतू कपूर ने बताया कि उन्होंने अपनी फिल्म की शूटिंग में कितना मजा आया और पहली नजर में यही लगता है कि तेज धूप में काम करने वाले लोग ही सबसे ज्यादा डिहाइड्रेशन का शिकार होते होंगे लेकिन असल तस्वीर कुछ अलग है। कई बार पूरे दिन एसी में बैठे ऑफिस जाने वाले लोग दिन के अंत तक ज्यादा डिहाइड्रेटेड मिलते हैं। बस फर्क इतना है कि यह समस्या धीरे-धीरे और चुपचाप बढ़ती है। चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं।क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह अब उनके लिए नई बात नहीं रही। उनके अनुसार, ऐसा लगता है कि बाहर काम करने लोग ज्यादा डिहाइड्रेट होंगे लेकिन व्यवहार में अक्सर ऑफिस में बैठे लोग ही कम पानी पीते हैं। इसकी वजह आलस नहीं बल्कि हमारा काम करने का तरीका और माहौल है।एयर कंडीशनर का होता है असर
एयर कंडीशनर में बैठने से शरीर के संकेत कमजोर पड़ जाते हैं। आमतौर पर प्यास हमें पानी पीने का संकेत देती है लेकिन जब न पसीना आता है, न गर्मी लगती है तो यह संकेत धीरे-धीरे नजरअंदाज हो जाता है। ऐसे में घंटों से निकल जाते हैं। हमें एहसास भी नहीं होता कि शरीर पानी खो रहा है। ठंडी हवा आराम जरुर देती है लेकिन वह सूखापन भी बढ़ाती है। शरीर त्वचा और सांस के जरिए लगातार पानी खोता रहता है। बस यह नजर नहीं आता। यही कारण है कि एसी में बैठने वाले लोग बिना महसूस किए डिहाइड्रेशन की ओर बढ़ जाते हैं।चाय और कॉफी भी नुकसानदायक
ऑफिस में चाय और कॉफी का चलन भी इस समस्या को बढ़ाता है। दिनभर लोग कई कप चाय या कॉफी पीते रहते हैं। मान लेते हैं कि उन्होंने पूरे तरल ले लिया है परंतु हकीकत यह है कि ये ड्रिंक्स पानी की जगह ले लेती है। उसे बढ़ाती नहीं है। लोगों को ऐसा लगता है कि वो दिनभर कुछ न कुछ पीते रहे हैं लेकिन असल में उनका शरीर उतना हाइड्रेट नहीं होता जितना होना चाहिए। यही कारण है कि दिन के अंत तक थकान और भारीपन महसूस होता है।डिहाइड्रेशन के लक्षण
डिहाइड्रेशन के लक्षण भी बहुत सामान्य लगते हैं कि जैसे हल्का सिरदर्द, ध्यान में कमी या शाम तक थकावट। लोग इन्हें काम का दबाव या नींद की कमी समझ लेते हैं जबकि कई बार असली कारण पानी की कमी होता है। लंबे समय तक बैठे रहने से यह समस्या और बढ़ जाती है। जब हम घंटों एक जगह बैठकर काम करते हैं शरीर के संकेतों पर ध्यान ही नहीं जाता है और न ही उठने का मौका मिलता है न पानी पीने का ध्यान आता है। यदि लंबे समय तक पानी की कमी बनी रहे। इससे किडनी स्टोन या यूरिन इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है। ये असर तुरंत नहीं दिखते लेकिन धीरे-धीरे गंभीर हो सकते हैं। अच्छी बात यह है कि इसका समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। बस दिनभर थोड़ा-थोड़ा पानी पीने के आदत डालनी होगी। चाय कॉफी पर निर्भरता कम करनी होगी और बीच-बीच में उठकर ब्रेक लेना होगा। -

Delhi में Heat Stroke के मरीजों के लिए बनाई गई Special Unit, जानें कैसे मिलेगा इसका फायदा
नई दिल्ली: उत्तर भारत में बढ़ती भीषण गर्मी और लू के खतरे के बीच दिल्ली के मशहूर डॉक्टर ने गंभीर हीट स्ट्रोक मरीजों के इलाज के लिए खास यूनिट तैयार की है। यहां मरीजों का शरीर का तपामान तेजी से कम करने के लिए कोल्ड वॉटर इमर्शन तकनीक अपनाई जा रही है। माना जा रहा है कि इस भीषण गर्मी पड़ सकती है। ऐसे में यह व्यवस्था गर्मी से जूझ रहे मरीजों के लिए राहत और जीवन बचाने की अहम कोशिश बन रही है।गर्मी के बीच अस्पताल की तैयारी
छोटे गर्मी और लू के बढ़ते असर को देखते हुए अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में खास इंतजाम किए गए हैं। स्पेशल यूनिट में बर्फ से भरे टब, मॉनिटरिंग मशीनें और जरुरी मेडिकल उपकरण मौजूद हैं। हीट स्ट्रोक मरीजों के इलाज के लिए कोल्ड वॉटर इमर्शन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें टब में तेजी से पानी भरा जाता है और करीब 50 किलो बर्फ डाली जाती है। मरीज को ठंडे पानी में रखा जाता है ताकि शरीर का तापमान जल्दी कम किया जा सके। डॉक्टरों के अनुसार, यह तकनीक गंभीर मरीजों के लिए बेहद असरदार मानी जाती है।डेमो और इलाज की प्रक्रिया
इस तकनीक को समझाने के लिए वॉलंटियर के साथ डेमो भी किया गया है। डेमो में दिखाया गया है कि मरीज को किस तरह टब में रखा जाता है। मरीज की गर्दन का हिस्सा बाहर रहता है जबकि शरीर का बाकी हिस्सा पानी के अंदर रखा जाता है। इलाज के दौरान लगातार मॉनिटरिंग की जाती है ताकि मरीज की स्थिति पर नजर रखी जा सके।क्या कहते हैं डॉक्टर?
एक्सपर्ट्स के अनुसार, हीट स्ट्रोक में हर मिनट बेहद जरुरी होता है। मरीज का इलाज घर से शुरु किया जा सकता है लेकिन शरीर का तापमान 104-105 डिग्री फॉरेनहाइट तक पहुंचने पर अस्पताल में इलाज जरुरी हो जाता है। इस स्थिति में शरीर में तापमान नियंत्रित करने की क्षमता खो देता है। मरीज को तेजी से हाइड्रेट किया जाता है और शरीर का तापमान कम करने की कोशिश की जाती है। इलाज में देरी होने पर मल्टी ऑर्गन फेलियर का खतरा बढ़ जाता है।अस्पताल में कैसे किया जाता है इलाज
इलाज के दौरान हार्ट रेट, ऑक्सीजन सैचुरेशन, कोर बॉडी टेम्परेचर और पानी के तापमान पर लगातार नजर रखी जाती है। पानी का तापमान 1 से 5 डिग्री के बीच रखा जाता है। डॉक्टरों के अनुसार, मरीज के शरीर का तापमान 38 डिग्री तक लाना जरुरी होता है। हर मरीज को लगभग 25 से 35 मिनट तक इस थैरेपी में रखा जाता है। डॉक्टरों के अनुसार, मरीज के शरीर का तापमान 38 डिग्री तक लाना जरुरी होता है। हर मरीज को लगभग 25 से 35 मिनट तक इस थैरेपी में रखा जाता है। डॉक्टरों के अनुसार, हीट स्ट्रोक बहुत खतरनाक स्थिति है। यदि समय पर इलाज न मिले तो मृत्यु दर 80 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। अस्पताल में इन्फ्लेटेबल की सुविधा भी मौजूद है। इसमें मौजूद पड़ने पर मरीज का इलाज किया जा सकता है। इसके अलावा तिरपाल के जरिए टाको तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें मरीज को 20-25 किलो बर्फ के साथ रखा जाता है। इस तकनीक का इस्तेमाल एंबुलेंस और फील्ड में भी किया जा सकता है।किन लोगों को ज्यादा खतरा
डॉक्टरों के अनुसार, सिक्योरिटी गार्ड, कंस्ट्रक्शन वर्कर, प्रेग्नेंट महिलाएं, पुलिसकर्मी और मीडिया कर्मी जैसे लोग ज्यादा समय तक धूप में रहते हैं। इस वजह से इन्हें हीट स्ट्रोक का खतरा ज्यादा होता है। -

दिल धड़कने से होगा कैंसर से बचाव, नई Study में Experts ने किया खुलासा
सेहत: दिल को आपने एक पंप के रुप में तो जानते हैं जो कि दिन रात बिना रुके हुए खून को पूरे शरीर में पहुंचाता है। एक आम इंसान का दिल रोज लगभग 1 लाख बार धड़कता है लेकिन अब वैज्ञानिकों की नई खोज में कुछ अलग सामने आया है। नए शोध के अनुसार, दिल की ये लगातार धड़कने सिर्फ जिंदगी को बनाए रखऩे का काम नहीं करती बल्कि यह कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से भी बचाव कर सकती है। यह सुनकर शायद आप हैरान हो लेकिन यह सच है कि दिल में कैंसर होना बहुत ही कम देखने को मिलता है। वहीं शरीर के दूसरे अंगों में कैंसर आम है। दिल किसी तरह इससे बचा रहता है। वैज्ञानिक लंबे समय से इस रहस्य को समझने की कोशिश कर रहे थे और अब उन्हें इसका एक बड़ा कारण मिल गया है।कैंसर से ऐसे होता है दिल सुरक्षित
दिल के सेल्स बहुत कम बनते और बदलते हैं। आमतौर पर जहां सेल्स तेजी से बनते हैं। वहां कैंसर का खतरा ज्यादा होता है लेकिन दिल में ऐसा नहीं होता है। इसके बावजूद दिल में कैंसर न होना एक बड़ा सवाल था। अब वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका कारण दिल की लगातार चलने वाली मेहनत और दबाव हो सकता है। दिल हर समय खून के पंप करता है। जिससे उसमें एक खास तरह का मैकेनिकल दबाव बनता है। यह दबाव कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है। नई स्टडी में यह सामने आया कि दिल की लगातार हरकत कैंसर कोशिकाओं के व्यवहार को बदल देती है जिससे वो तेजी से बढ़ नहीं पाती है। वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को समझने के लिए चूहों पर एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने एक दिल को चूहे को गर्दन में ट्रांसप्लांट किया। इस ट्रांसप्लांट किए गए दिल में खून तो पहुंच रहा था लेकिन वह आमतौर पर दिल की तरह मेहनत नहीं कर रहा था यानी की उसमें धड़कन का दबाव कम था। इसके बाद वैज्ञानिकों ने दोनों दिलों में कैंसर सेल्स डाले। इसमें एक सामान्य धड़कता हुआ दिल था और दूसरा कम दबाव वाला ट्रांसप्लांट किया गया दिल था। इसके परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे। यह दिल सामान्य तरीके से धड़क रहा था। उसमें कैंसर सेल्स नहीं बढ़ पाए लेकिन जो दिल कम दबाव में था। उसमें ट्यूमर आसानी से बनने लगे। इससे साफ हो गया कि दिल की धड़कन खुद कैंसर के खिलाफ एक रक्षा प्रणाली की तरह काम करती है।जीन और प्रोटीन का क्या है रोल
वैज्ञानिकों ने आगे पाया है कि यह सिर्फ बाहर का दबाव नहीं है बल्कि यह कोशिकाओं के अंदर जाकर उनके जीन को भी प्रभावित करता है। इस प्रक्रिया में एक खास प्रोटीन नेसप्रिन-2 जरुरी भूमिका निभाता है। यह प्रोटीन बाहरी दबाव को कोशिका के केंद्र तक पहुंचाता है। वहां यह जीन की गतिविधियों को बदल देता है। जब यह प्रोटीन सही से काम करता है तो कैंसर से जुड़े जीन धीमे पड़ जाते हैं और कोशिकाएं बढ़ नहीं पाती हैं। जब वैज्ञानिकों ने इस प्रोटीन को बंद कर दिया तो उन्होंने देखा कि स्थिति ही बदल गई कैंसर की कोशिकाएं फिर से तेजी से बढ़ने लगी। यहां तक कि धड़कते दिल में भी ट्यूमर बनने लगे। इससे साबित हुआ कि यह पूरा सिस्टम तक एक्टिव रक्षा तंत्र है। -

भारत में बढ़ रहा Metabolic Diseases का खतरा, Study में Experts ने किए खुलासे
सेहत: भारत में मेटाबॉलिक बीमारियों का बोझ तेजी से बढ़ती जा रही हैं। अब यह गंभीर चिंता का विषय बन गया है। हाल में हुई स्टडी के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज से होने वाली मौतों और डिसेबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर सालों के मामले में भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में पहले स्थान पर पहुंच गया है।स्टडी में सामने आई चीजें
11 देशों के एक्सपर्ट्स द्वारा किए गए इस अध्ययन में बताया गया कि वर्ष 1990 में टाइप-2 डायबिटीज के सबसे ज्यादा मामले चीन में थे। इसके बाद भारत, इंडोनेशिया, जापान और पाकिस्तान का स्थान था परंतु साल 2023 तक स्थिति बदल गई और भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए सबसे ज्यादा मामलों वाला देश बन गया है। यह एनालिसिस ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के आंकड़ों पर आधारित है। स्टडी में यह भी सामने आया है कि भारत और चीन एशिया प्रशांत क्षेत्र में पांच प्रमुख मेटाबॉलिक बीमारियों टाइप-2 डायबिटीज, हाई बीपी , बॉडी मास इंडेक्स, खराब कोलेस्ट्रोल और फैटी लिवल से जुड़ी बीमारी का सबसे ज्यादा बोझ उठा रहे हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार अनूप मिश्रा के अनुसार, टाइप 2 डायबिटीज से जुड़े रोग भार और मौतों के मामले में भारत पहले स्थान पर हैं। वहीं बाकी चार बीमारियों में चीन पहले और भारत दूसरे स्थान पर है जो गंभीर चिंता की बात है। उन्होंने कहा कि साल 2023 के आकंड़ों के अनुसार, भारत-एशिया प्रशांत क्षेत्र में 2.1 करोड़ से ज्यादा मामले और करीबन 5.8 लाख मौते दर्ज हुई हैं जो इसके भारी प्रभाव को दिखता है। उन्होंने यह भी बताया कि डायबिटीज, मोटापा, हाईबीपी, असामान्य कोलेस्ट्रॉल और फैटी लिवर आपस में जुड़ी हुई स्थितियां हैं जो मुख्य रुप से खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण बढ़ रही है। यही बीमारियां आगे चलकर किडनी फेल, दिल का दौरा, हार्ट फेलियर, लिवर की गंभीर बीमारी, लकवा और कई तरह के कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं का कारण बनती है।इतने लोग जूझ रहे बीमारी से
स्टडी के अनुसार, साल 2023 में भारत में टाइप-2 डायबिटीज से जुड़े 2,13,45,118 मामले और 5,78,367 मौतें दर्ज हो गई जबकि चीन में यह आंकड़ा 1,04,40,382 मामले और 1,72,911 मौतों का रहा है। पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में साल 2023 में टाइप-2 डायबिटीज के कारण करीबन 4.9 करोड़ मामले दर्ज किए गए है। इसमें 54.1 प्रतिशत हिस्सा पुरुषों का था। वहीं इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा बोझ हाई बीपी की रहा है। इसके कारण करीबन 13.8 करोड़ रोग-भार साल और 62.7 लाख मौतें हुई हैं। इसके बाद अधिक शरीर भार, खराब कोलेस्ट्रॉल, टाइप 2 डायबिटीज और फैटी लिवर से जुड़ी बीमारी का स्थान रहा है। साल 1990 से 2023 के बीच कुल रोग भार में 1.7 से 3.7 गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है। अनुमान है कि साल 2030 तक इन बीमारियों का बोझ और बढ़ेगा जिसमें हाई बीपी का सबसे बड़ा कारण बना रहेगा। -

Health Tips : पानी में नींबू-शहद मिलाकर पिएं, रोज खाली पेट पीने से क्या होता है, जानें एक्सपर्ट की राय
Health Tips : पुराने समय से ही शहद को प्राकृतिक औषधि माना जाता है। जब इसमें नींबू मिलाया जाता है, तो इसके फायदे और भी बढ़ जाते हैं। यह मिश्रण शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है। अगर आप रोज सुबह खाली पेट नींबू और शहद का पानी पीते हैं, तो कुछ ही समय में इसका अच्छा असर देखने को मिल सकता है।- वजन कम करने में मददगार
- शरीर में ऊर्जा बढ़ाए
- पेट और पाचन के लिए फायदेमंद
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क्या सारा दिन Chewing Gum चबाना सही है? Experts ने खुद बताया कारण
सेहत: ऑफिस जाते समय कॉफी लेना, दिनभर च्युइंग गम चबाना या जिम वियर पहनना ये सब हमारी रोजमर्रा की आदतें हैं लेकिन अब एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि ये छोटे-छोटी चीजें आपकी फर्टिलिटी पर असर डाल सकती है। खासतौर पर च्यूइंग गम जो देखने में बिल्कुल आम लगती है पर अंदर ही अंदर बड़ा खतरा बन सकती है।आखिर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
एक्सपर्ट्स के अनुसार, इसके पीछे कारण है माइक्रोप्लास्टिक्स। ये बहुत ही छोटे-छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जो हमारे आस-पास की चीजों जैसे कि पैकेजिंग, कपड़े और यहां तक कि च्युइंग गम से निकलकर शरीर में पहुंच जाते हैं। हाल की रिसर्च में यह सामने आया है कि च्युइंग गम चबाने से सैंकड़ों माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में जा सकते हैं। इसमें से ज्यादातर पहले कुछ मिनटों में ही रिलीज हो जाते हैं। यह कण धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर हार्मोनल सिस्टम को प्रभावित करते हैं।रिसर्च में निकली ये चीजें
यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी में पेश एक 2025 की स्टडी में पाया गया कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट कर रही महिलाओं के 69 प्रतिशत सैंपल और पुरुषों के 55 प्रतिशत सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक्स मौजूद थे। वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मेक्सिको की 2024 की रिसर्च मे मानव टेस्टिकल टिश्यू में माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए।इस वजह से होती है परेशानी
समस्या सिर्फ च्युइंग गम तक सीमित नहीं है। चाय के टी-बैग, टेकअवे कॉफी कप, प्लास्टिक कंटेनर और सिंथेटिक कपड़े, ये सभी माइक्रोप्लास्टिक्स के बड़े स्त्रोत हैं। खासकर गर्म चीजों के संपर्क में आने से इनसे ज्यादा कण निकलते हैं जो सीधे शरीर में पहुंच जाते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि प्लास्टिक को पूरी तरह से जीवन से हटाना संभव नहीं है क्योंकि यह हर जगह मौजूद हैं लेकिन छोटे-छोटे बदलाव करके इसका असर कम किया जा सकता है। जैसे प्लास्टिक की जगह ग्लास या सिरेमिक का इस्तेमाल करना, ढीले-ढीले नैचुरल फैब्रिक पहनना और च्यूइंग गम की जगह नैचुरल ऑप्शन चुनना। बता दें कि फर्टिलिटी सिर्फ उम्र या खान-पान पर निर्भर नहीं करती। बल्कि हमारे आसपास का माहौल है। इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। यदि आप भविष्य में पैरेंट्स बनने की योजना बना रहे हैं। इन छोटी आदतों पर ध्यान देना जरुरी है क्योंकि कई बार जो चीजें हमें सबसे ज्यादा सामान्य लगती है। वहीं लंबे समय में सबसे ज्यादा असर डालती है। -

Health Tips : केमिकल वाले अंगूर की पहचान कैसे करें? जानें एक्सपर्ट की राय
Health Tips : बाजार में मिलने वाले अंगूर अक्सर बहुत ताजे, बड़े और चमकदार दिखते हैं। हम उन्हें देखकर मान लेते हैं कि ये सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होंगे। लेकिन आजकल खेती में बढ़ते केमिकल इस्तेमाल की वजह से ऐसा जरूरी नहीं है कि बाहर से अच्छे दिखने वाले अंगूर अंदर से भी सुरक्षित हों।
क्यों होते हैं अंगूरों में केमिकल?
आजकल अंगूरों को जल्दी पकाने, लंबे समय तक ताजा बनाए रखने और कीड़ों से बचाने के लिए कई तरह के केमिकल इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं।
• मैनकोजेब (Mancozeb) – फफूंद से बचाने के लिए
• साइपरमेथ्रिन (Cypermethrin) – कीड़ों को मारने के लिए
• सल्फर डाइऑक्साइड गैस – लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए
इन केमिकल्स के कारण अंगूर लंबे समय तक खराब नहीं होते, लेकिन ये हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
डॉक्टरों का कहना है कि बाजार में मिलने वाले कुछ अंगूर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। अगर अंगूर को केमिकल से पकाया गया है, तो वह शरीर में धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकता है।
• अंगूर पर कई बार सफेद परत जम जाती है
• यह परत केमिकल का संकेत हो सकती है
• बिना अच्छे से धोए खाने पर यह शरीर में चला जाता हैकेमिकल वाले अंगूर की पहचान कैसे करें?
आप घर पर ही आसानी से पता लगा सकते हैं कि अंगूर सुरक्षित हैं या नहीं:
1. डंठल (तना) देखकर पहचानें
• अगर तना हरा और ताजा है → अंगूर ठीक हैं
• अगर तना सूखा या भूरा है → हो सकता है केमिकल इस्तेमाल हुआ हो
2. सफेद परत पर ध्यान दें
• हल्की सफेद परत सामान्य हो सकती है
• लेकिन अगर परत बहुत मोटी या ज्यादा दिखे, तो सावधान रहें
3. छूकर देखें
• अगर अंगूर बहुत खुरदुरे या अजीब लगें, तो ये केमिकल वाले हो सकते हैंअंगूर को धोने का सही तरीका
सिर्फ पानी से धोना काफी नहीं होता। केमिकल हटाने के लिए ये तरीका अपनाएं:सही तरीका
1. एक बर्तन में पानी लें
2. उसमें थोड़ा बेकिंग सोडा डालें
3. अंगूरों को इसमें 10–15 मिनट तक भिगोकर रखें
4. फिर साफ पानी से अच्छे से धो लें
इससे अंगूर पर लगी केमिकल की परत काफी हद तक हट जाती है।ध्यान रखने वाली बातें
• हमेशा बहुत ज्यादा चमकदार और एकदम परफेक्ट दिखने वाले अंगूर ही न लें
• कोशिश करें कि सीजनल और लोकल फल खरीदें